प्रयागराज कैसे बन रहा Gen-Z राजनीति का नया रणक्षेत्र?
राहुल गांधी के छात्र संवाद से लेकर BJP और सपा की युवा रणनीति तक, प्रयागराज में रोजगार, पेपर लीक और शिक्षा के मुद्दों पर 2027 से पहले Gen Z को साधने की राजनीतिक होड़ तेज

पेपर लीक के खिलाफ प्रयागराज में छात्रों का प्रदर्शन (फाइल फोटो)
उत्तर प्रदेश की राजनीति लंबे समय से जातीय और सामाजिक समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. चुनावी रणनीतियां भी यादव, दलित, ब्राह्मण, ठाकुर, पिछड़ा और मुस्लिम जैसे पारंपरिक वोट बैंक के इर्द-गिर्द तैयार होती रही हैं. लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस इस स्थापित राजनीतिक ढांचे को चुनौती देने की कोशिश कर रही है.
पार्टी का मानना है कि अगर जाति की जगह रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक, स्टार्टअप, स्किल डेवलपमेंट और भविष्य के अवसर जैसे साझा मुद्दों पर युवाओं को संगठित किया जाए तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया सामाजिक समीकरण तैयार हो सकता है. इसी रणनीति के तहत 8 अगस्त को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी प्रयागराज के केपी ग्राउंड में छात्रों और युवाओं से संवाद करने जा रहे हैं.
कांग्रेस इस कार्यक्रम को महज एक राजनीतिक रैली नहीं बल्कि प्रदेश में नए राजनीतिक नैरेटिव की शुरुआत मान रही है. पार्टी नेताओं के मुताबिक, इसका उद्देश्य युवाओं को जातीय पहचान से ऊपर उठाकर ‘रोजगार और अवसर’ की राजनीति से जोड़ना है.
कांग्रेस का यह दांव आंकड़ों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है. उत्तर प्रदेश में 18 से 30 वर्ष आयु वर्ग के मतदाता करीब 30 प्रतिशत हैं जबकि 18 से 40 वर्ष तक के वोटरों की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर इस वर्ग का एक बड़ा हिस्सा साझा मुद्दों के आधार पर मतदान करता है तो प्रदेश के चुनावी समीकरणों में बड़ा बदलाव संभव है.
यही वजह है कि राहुल गांधी के भाषण में भी रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप, स्किल डेवलपमेंट और सामाजिक न्याय जैसे विषय केंद्र में रहने की संभावना है. कांग्रेस का दावा है कि सम्मेलन के लिए अब तक करीब डेढ़ लाख छात्र-छात्राओं और युवाओं ने रजिस्ट्रेशन कराया है. पार्टी इसे युवाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने की दिशा में पहला बड़ा कदम बता रही है.
क्यों बना प्रयागराज युवाओं की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र
प्रयागराज केवल धार्मिक और न्यायिक पहचान वाला शहर नहीं है बल्कि यह उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है. हर साल उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड और राजस्थान से लाखों छात्र यहां पढ़ाई के लिए आते हैं. सरकारी अनुमानों के अनुसार प्रयागराज जिले की आबादी लगभग 70 लाख है, जिनमें 15 से 35 वर्ष आयु वर्ग के करीब 24 से 28 लाख युवा हैं. इसके अतिरिक्त प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए शहर में बड़ी संख्या में बाहरी छात्र भी रहते हैं.
कटरा, जॉर्ज टाउन, तेलियरगंज, सलोरी, कीडगंज और करेली जैसे इलाके आज कोचिंग, लाइब्रेरी और छात्रावासों के बड़े केंद्र बन चुके हैं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MNNIT), उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय और दर्जनों उच्च शिक्षण संस्थान इस शहर को लगातार युवा ऊर्जा प्रदान करते हैं. यही कारण है कि रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पेपर लीक, आरक्षण और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े आंदोलनों की सबसे तेज आवाज अक्सर प्रयागराज से ही उठती है.
25 जुलाई को NEET पेपर लीक के विरोध में हजारों छात्रों का सड़क पर उतरना इसी राजनीतिक और सामाजिक सक्रियता का ताजा उदाहरण माना जा रहा है. सुबह कलेक्ट्रेट से शुरू हुआ मार्च सुभाष चौराहा होते हुए पत्थर गिरजाघर तक पहुंचा. छात्रों ने संविधान की प्रतियां हाथ में लेकर निष्पक्ष जांच, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग उठाई.
आंदोलन के दौरान ‘भारत माता की जय’, ‘वंदे मातरम्’ और ‘छात्र एकता जिंदाबाद’ जैसे नारे गूंजते रहे. प्रदर्शनकारियों का कहना था कि उनका संघर्ष केवल किसी परीक्षा तक सीमित नहीं बल्कि देश के युवाओं के भविष्य और पारदर्शी भर्ती व्यवस्था के लिए है. कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत का मानना है कि जंतर-मंतर और प्रयागराज जैसे आंदोलनों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युवाओं के भीतर रोजगार और शिक्षा को लेकर व्यापक असंतोष मौजूद है. पार्टी अब इसी असंतोष को राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश कर रही है.
BJP और सपा भी समझ रहीं युवाओं की राजनीतिक ताकत
कांग्रेस अकेली ऐसी पार्टी नहीं है जिसने युवाओं की बढ़ती राजनीतिक ताकत को पहचाना हो. इससे पहले समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) भी प्रयागराज के जरिए पूरे उत्तर प्रदेश के युवा मतदाताओं तक पहुंचने की रणनीति पर काम कर रही हैं. 29 जून को प्रयागराज पहुंचे सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रयागराज में आयोजित पार्टी के विजन इंडिया कार्यक्रम में भर्ती परीक्षाओं में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और पेपर लीक के मुद्दे पर प्रदेश सरकार को घेरा था.
सपा लगातार युवाओं के बीच यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि प्रदेश सरकार रोजगार और भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने में विफल रही है. दूसरी ओर BJP विपक्ष के आरोपों का जवाब संगठनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर देने में जुटी है. BJP यह याद दिला रही है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में उसने भर्तियों में भ्रष्टाचार को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था और सत्ता में आने के बाद उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की भर्ती परीक्षाओं में धांधली के आरोपों की सीबीआई जांच भी शुरू कराई थी. अब पार्टी प्रयागराज के युवाओं को नेतृत्व का चेहरा भी बना रही है.
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े रहे इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष रोहित मिश्रा को भारतीय जनता युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाना इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. BJP का संदेश साफ है कि संगठन में युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया जा रहा है.
इसी तरह BJP की प्रदेश कार्यकारिणी में प्रयागराज की युवा महिला नेता डॉ. कीर्तिका अग्रवाल को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाकर भी पार्टी ने संकेत दिया है कि आने वाले चुनावों में युवा चेहरों की भूमिका और बढ़ेगी. BJP नेताओं का तर्क है कि संगठन में युवाओं को जिम्मेदारी देकर पार्टी भविष्य के नेतृत्व की तैयारी कर रही है.
क्या बदल सकती है यूपी की चुनावी राजनीति?
राजनीतिक विश्लेषक आशुतोष गौतम का मानना है कि प्रयागराज आज उत्तर प्रदेश की युवा राजनीति का सबसे प्रभावशाली प्रयोगशाला बन चुका है. यहां रहने वाले प्रतियोगी छात्र किसी एक जिले के मतदाता नहीं हैं बल्कि वे पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्यों तक सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव रखते हैं. सोशल मीडिया के दौर में यहां बनने वाला नैरेटिव तेजी से पूरे प्रदेश में फैलता है.
आशुतोष कहते हैं कि अगर बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में पारदर्शिता, पेपर लीक, स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था और स्किल डेवलपमेंट जैसे मुद्दे युवाओं के बीच साझा राजनीतिक एजेंडा बनते हैं तो इससे पारंपरिक जातीय गोलबंदी का असर कुछ हद तक कमजोर पड़ सकता है. हालांकि वे यह भी मानते हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में जातीय पहचान अभी भी चुनावी राजनीति की सबसे मजबूत वास्तविकता है और केवल युवा विमर्श के सहारे उसे पूरी तरह प्रतिस्थापित करना आसान नहीं होगा.
यही कारण है कि सभी प्रमुख दल दोहरी रणनीति पर काम कर रहे हैं. एक ओर जातीय और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश जारी है, वहीं दूसरी ओर रोजगार और शिक्षा जैसे मुद्दों पर युवाओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का अभियान भी चल रहा है.
इस पूरी राजनीतिक कवायद का केंद्र प्रयागराज इसलिए बना है क्योंकि यहां शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएं, छात्र राजनीति और सामाजिक आंदोलनों का ऐसा संगम है, जो पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीतिक दिशा को प्रभावित करने की क्षमता रखता है. 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह शहर केवल संगम की नगरी नहीं, बल्कि प्रदेश की युवा राजनीति का सबसे बड़ा रणक्षेत्र बन चुका है.