प्रशांत किशोर की बिहार के मुख्य सचिव से मुलाकात पर क्यों हुआ विवाद?

प्रशांत किशोर के मुख्य सचिव से मिलने को नौकरशाही की नजदीकी के तौर पर पेश किया गया जबकि अधिकारियों का कहना है कि मुलाकात में तय प्रोटोकॉल का ही पालन हुआ

मुख्य सचिव से मिलने पहुंचे प्रशांत किशोर

राजनीति में थोड़ा-बहुत विवाद किसे पसंद नहीं, भले ही वह जानबूझकर खड़ा किया जाए. हाल में प्रशांत किशोर की 27 अगस्त को बिहार के मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत से हुई मुलाकात को लेकर ऐसा ही विवाद खड़ा करने की कोशिश हुई. प्रशांत किशोर जन सुराज के संस्थापक और बांकीपुर के विधायक हैं. वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उनकी एक तस्वीर का इस्तेमाल यह बताने के लिए किया गया कि बिहार की नई राजनीतिक ताकत को खुश करने के लिए अधिकारी कुछ ज्यादा ही कोशिश कर रहे हैं.

एक IAS अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, "प्रशांत किशोर को छोड़िए. अगर कोई भी विधायक डीजीपी या मुख्य सचिव से मिलने जाता तो उसका भी अच्छे से स्वागत किया जाता, उसकी बात सुनी जाती और उसकी जायज मांगों को पूरा करने का भरोसा दिया जाता. लिखित नियम भी यही कहते हैं और प्रशांत किशोर के मामले में भी ऐसा ही हुआ. जो लोग इस बात को लेकर जानबूझकर विवाद खड़ा कर रहे हैं, उनका इसमें कोई अपना मतलब है."

इस तरह की बात फैलाने के पीछे शायद एक और वजह है. इसके जरिए यह बताने की कोशिश हो रही है कि बिहार के बड़े अधिकारी प्रशांत किशोर को खुश करने में लगे हैं. प्रशांत किशोर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सबसे बड़े आलोचक रहे हैं. लगता है इसका मकसद चौधरी और उनके भरोसेमंद बड़े अधिकारियों के बीच मतभेद पैदा करना या कम से कम ऐसा दिखाना है कि दोनों के बीच सब कुछ ठीक नहीं है.

लेकिन तथ्य इस तरह की बातों और बनाई जा रही कहानी से मेल नहीं खाते. सच यह है कि सम्राट चौधरी के भरोसेमंद बड़े अधिकारी, जिनमें मुख्य सचिव और डीजीपी भी शामिल हैं, वही कर रहे हैं जो राजनीतिक नेतृत्व उनसे चाहता है.

खुद चौधरी को देखें. 3 अगस्त को किशोर के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव जीतने और इसके बाद BJP नेतृत्व से चौधरी को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग करने के बाद चौधरी ने शालीनता दिखाई. उन्होंने प्रशांत किशोर को जीत की बधाई दी और कहा कि वह जनता के फैसले का सम्मान करते हैं. यह ऐसे राजनीतिक विरोधी के लिए काफी उदार रवैया था, जिसने जीत के तुरंत बाद मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर सवाल उठाना शुरू कर दिया था.

प्रशांत किशोर की यह फोटो सामने आने के बाद विवाद शुरू हुआ

बड़े अधिकारियों ने भी कुछ ऐसा ही रवैया अपनाया और तय नियमों के मुताबिक काम किया. दरअसल, 21 अगस्त को सामान्य प्रशासन विभाग ने जनप्रतिनिधियों से मुलाकात के दौरान अधिकारियों को अपनाए जाने वाले नियमों को लेकर निर्देश जारी किए थे. ये निर्देश बिहार विधानसभा के अध्यक्ष की अध्यक्षता में 17 जुलाई को हुई बैठक के बाद जारी किए गए. इनमें साफ कहा गया कि जब कोई जनप्रतिनिधि किसी अधिकारी से मिलने जाए तो उसके पद और सम्मान के हिसाब से उचित नियमों का पालन किया जाए और उसके साथ सम्मान से पेश आया जाए. अधीनस्थ कार्यालयों को इन निर्देशों का सख्ती से पालन करने को भी कहा गया था.

इसके छह दिन बाद प्रशांत किशोर ने मुख्य सचिव से मुलाकात की. उन्होंने शहर और आम लोगों से जुड़े कई मुद्दे उठाए. इनमें हर महीने मिलने वाला 5 किलो मुफ्त अनाज, ट्रैफिक व्यवस्था, दुकानदारों के लिए जगह, नालियों की व्यवस्था, सड़कें, स्ट्रीट लाइट और सड़कों पर कब्जे जैसे मुद्दे शामिल थे. किशोर ने बाद में बताया कि यह मुलाकात डीजीपी के साथ ट्रैफिक और दुकानदारों से जुड़े मुद्दों पर हुई उनकी पिछली बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए थी.

प्रशांत किशोर के मुताबिक, मुख्य सचिव ने भरोसा दिया कि प्रशासन जरूरी कदम उठाएगा. अगर कोई दूसरा विधायक भी यही मुद्दे लेकर आता तो उसे भी यही भरोसा दिया जाता लेकिन इस मामले में जिस चीज को ज्यादा प्रचारित किया गया, वह थी प्रशांत किशोर की बड़े अधिकारियों के साथ खिंचवाई गई तस्वीर. इसमें मुख्य सचिव और डीजीपी समेत कई वरिष्ठ अधिकारी उनके साथ दिखाई दे रहे थे.

हालांकि, मुख्य सचिव के कार्यालय ने तुरंत इसकी वजह साफ कर दी. किशोर ने 20 अगस्त को मुख्य सचिव से मिलने का समय मांगा था और उन्हें 27 अगस्त शाम 5 बजे का समय दिया गया था. जब वे पहुंचे, तब मुख्य सचिव की कमरे में कई वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक बैठक चल रही थी. इसके बाद प्रशांत किशोर ने आगंतुक कक्ष में मुख्य सचिव से मुलाकात की. वहां कुछ बड़े अधिकारी पहले से मौजूद थे जिनमें डीजीपी भी शामिल थे. सरकार ने यह भी बताया कि जनप्रतिनिधियों के साथ इस तरह की बैठकें आम तौर पर आगंतुक कक्ष में ही होती हैं.

इसके बाद प्रशांत किशोर की अधिकारियों के साथ एक तस्वीर ली गई. इसी तस्वीर के जरिए अब एक खास कहानी बनाने की कोशिश की जा रही है लेकिन ऐसा कोई सबूत नहीं है कि अधिकारियों का कोई हिस्सा किशोर को खुश करने के लिए कुछ अलग या असाधारण काम कर रहा है.

इस पूरे मामले को देखने का एक आसान तरीका भी है. चौधरी ने किशोर के साथ राजनीतिक शालीनता दिखाई और उनके अधिकारियों ने उन्हें सरकारी नियमों के मुताबिक सम्मान दिया. इसके पीछे किसी साजिश की जरूरत नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर सभी लोग तय नियमों के मुताबिक ही काम कर रहे थे तो आखिर इस विवाद को कौन आगे बढ़ा रहा है और क्यों?

राजनीति में हर किसी को थोड़ा विवाद पसंद आता है और जब तथ्य कोई विवाद पैदा नहीं करते तो उसे खुद खड़ा करने की कोशिश की जाती है. दिलचस्प बात यह है कि अधिकारियों के एक छोटे से हिस्से पर सम्राट चौधरी और उनके अधिकारियों के बीच दूरी पैदा करने की कोशिश करने का शक जताया जा रहा है. यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि अधिकारी प्रशांत किशोर के सामने झुक रहे हैं और मुख्यमंत्री से अलग होकर काम कर रहे हैं लेकिन ऐसी बनाई हुई कहानियों के पीछे तथ्यात्मक आधार बहुत कम हैं.

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