सामान्य से कम बारिश फिर क्यों पटना में उफनी गंगा?

यह किसी एक नदी या ज्यादा बारिश से आई बाढ़ नहीं थी. कई नदियों का पानी एक साथ गंगा में पहुंचा जबकि आगे का नदी तंत्र पहले से ही भरा हुआ था

पटना में गंगा के जलस्तर ने 10 साल पुराना रिकॉर्ड तोड़ दिया है

पटना किसी एक नदी के शांत हिस्से में नहीं बसा है. यह नदियों के संगम वाले इलाके में है. कुछ ही किलोमीटर के दायरे में गंगा में तीन बड़ी नदियां आकर मिलती हैं. दक्षिण-पश्चिम से सोन नदी आती है और राजधानी से ठीक पश्चिम में मनेर के पास गंगा में मिलती है.

उत्तर से गंडक नदी नेपाल से वाल्मीकिनगर होते हुए आती है और पटना के सामने सोनपुर और हाजीपुर के पास गंगा में मिलती है. दक्षिण-पूर्व से पुनपुन नदी गया-जहानाबाद की तरफ से आती है और शहर से ठीक पूरब फतुहा के पास गंगा में मिल जाती है.

यहां की जमीन लगभग पूरी तरह समतल है. जब कई दिशाओं से एक ही समय में बड़ी मात्रा में पानी आता है तो नदी के लिए उसे आगे ले जाने की क्षमता कम हो जाती है. पहले से ऊंचे स्तर पर बह रही नदी में और पानी समाने की जगह कम होती है. 

साथ ही गंगा की जलधारा को सहायक नदियों से आने वाले पानी को जल्दी आगे ले जाने के लिए कम दबाव मिलता है. ऐसे में संगम के आसपास पानी पीछे की ओर जमा होने लगता है और ऊपर की तरफ नदी का जलस्तर बढ़ जाता है.

इस सप्ताह यही हुआ. यह किसी एक नदी से आई बाढ़ नहीं थी और न ही ज्यादा बारिश वाले मानसून की कहानी थी. यह नदियों के संगम पर आई बाढ़ थी. कई नदियां एक साथ बढ़ रही थीं और गंगा पहले से ही ऊंचे स्तर पर बह रही थी.

पश्चिम से आती गंगा

पटना पहुंचने तक गंगा पहले ही एक विशाल जलग्रहण क्षेत्र का पानी समेट चुकी होती है. प्रयागराज में ऊपर की तरफ यमुना इसमें मिलती है. इसके आगे छपरा के पास घाघरा नदी गंगा में मिलती है. इसके बाद गंगा मुंगेर, भागलपुर और पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ती है.

बिहार में राहत-बचाव कार्य जोरों पर चल रहा है (फाइल फोटो)

सामान्य स्थिति में पटना के आसपास की सहायक नदियां गंगा में पानी पहुंचाती हैं और गंगा उस पानी को आगे ले जाती है. जलस्तर बढ़ता है और फिर कम हो जाता है. लेकिन इस सप्ताह उस समय कहीं ज्यादा पानी आया, जब नीचे की तरफ गंगा पहले से ही ऊंचे स्तर पर थी.

पटना में गंगा का गेज बढ़ने के लिए यह जरूरी नहीं है कि हर जगह नदी खतरे के निशान से ऊपर बहने लगे. बस इतना होना काफी है कि किसी समय किसी हिस्से में जितना पानी आ रहा है, नदी उतना पानी आगे न ले जा पाए. 

पटना से आगे पूर्व की ओर जाने वाला पानी दानापुर से फतुहा तक के हिस्से में जमा होता गया. यही जमा हुआ पानी जलस्तर बढ़ने की वजह बना.

पटना से गंगा पूर्व की ओर बहती है. इसका रास्ता फतुहा से पंडारक, फिर बाढ़, हाथीदह (मोकामा), मुंगेर, सुल्तानगंज, भागलपुर और कहलगांव से होकर गुजरता है. इसके बहुत आगे फरक्का और फिर समुद्र आता है.

पानी आगे क्यों नहीं निकल सका

इसके पीछे एक साथ दो वजहें थीं. पहली, पटना के आसपास बहुत ज्यादा पानी पहुंच रहा था. मनेर में सोन, हाजीपुर में गंडक और फतुहा में पुनपुन गंगा में मिल रही थीं. वहीं मुख्य गंगा पहले से ही ऊंचे स्तर पर थी. 

दूसरी वजह यह थी कि आगे जाने का रास्ता भी पहले से पानी से भरा हुआ था. उसी सुबह हाथीदह, मुंगेर, भागलपुर और कहलगांव में गंगा खतरे के निशान से ऊपर थी.

इनमें से कुछ जगहों पर जलस्तर अपने पुराने बाढ़ रिकॉर्ड के बराबर या उससे ऊपर पहुंच चुका था. पटना से आने वाले अतिरिक्त पानी के लिए आगे कोई खाली हिस्सा नहीं था. 

ऐसा नहीं था कि पानी पूर्व की ओर आगे नहीं जा रहा था. वहां गंगा का जलस्तर पहले से ही ऊंचा था और पानी जमा था. दो हिस्से पहले से पानी से भरे थे और बीच में नदी का रास्ता भी समतल था. नतीजा यह हुआ कि पटना में गंगा का जलस्तर बढ़ गया.

सबसे ज्यादा पानी कहां से आया

सोन नदी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की सीमा के पास अमरकंटक से निकलती है. यह मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार से होकर गुजरती है और मनेर के पास गंगा में मिलती है. 

बाढ़ से 13 जिलों के करीब 27 लोग प्रभावित हुए हैं

यमुना के बाद यह गंगा की दूसरी सबसे बड़ी दक्षिणी सहायक नदी है. इसका जलग्रहण क्षेत्र करीब 69,000 वर्ग किलोमीटर है. यह हिमालय से आने वाली नदी नहीं, बल्कि पठारी इलाके से आने वाला पानी है.

इसका अहम नियंत्रण बिंदु डेहरी-ऑन-सोन का इंद्रपुरी बैराज है. 2 सितंबर को इस बैराज से 5,63,654 क्यूसेक पानी छोड़ा गया था. यह इस मौसम में सोन नदी का सबसे ज्यादा बहाव था. गांधी घाट और दानापुर में टूटे पुराने रिकॉर्ड के संदर्भ में इस आंकड़े को देखना अहम है. अधिकारियों ने बाद में पटना के गेज में कमी को सोन के बहाव में आई गिरावट से जोड़ा.

7 सितंबर को सुबह 10 बजे तक इसी बैराज से पानी का बहाव घटकर 1,33,134 क्यूसेक रह गया था और इसमें गिरावट जारी थी. इसका मतलब यह नहीं था कि नदी गायब हो गई. पानी का सबसे ऊंचा बहाव अब पूर्व की ओर हाथीदह, मुंगेर और भागलपुर की तरफ बढ़ चुका था. 

सोन में शुरू में आने वाला बहुत ज्यादा बहाव बाद में नीचे की ओर नदी पर दबाव बनाता है. बैराज का आंकड़ा किसी टैंक में जमा पानी की मात्रा नहीं, बल्कि पानी के बहने की दर बताता है. एक लाख क्यूसेक का मतलब है कि हर सेकंड एक लाख घन फुट पानी किसी बिंदु से गुजर रहा है.

दक्षिण-पूर्व से आती पुनपुन

पुनपुन नदी झारखंड के पलामू इलाके से निकलती है, दक्षिण बिहार के कुछ हिस्सों से होकर गुजरती है और फतुहा में गंगा में मिलती है. यह मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर नदी है. सूखे महीनों में इसका बहाव कम रहता है, लेकिन तेज बारिश के बाद यह तेजी से बढ़ती है. 

दरधा और मोरहर जैसी छोटी नदियां इसमें पानी पहुंचाती हैं. गया से होकर बहने वाली फल्गु नदी भी इसी दक्षिणी नदी तंत्र का हिस्सा है.

पटना का एरियल व्यू

इस सप्ताह पुनपुन श्रीपालपुर में खतरे के निशान से ऊपर थी और उसने पटना के दक्षिण में निचले इलाकों पर दबाव बढ़ाया. यह फतुहा में तभी गंगा में अपना पानी छोड़ सकती है, जब सामने वाली नदी उसे उतनी तेजी से आगे ले जाने की स्थिति में हो. 

जब गंगा पहले से ऊंचे स्तर पर हो तो पानी निकलने का यह रास्ता ज्यादा मुश्किल हो जाता है.

गंडक, कोसी और दूसरी नदियां

गंडक नदी नेपाल से निकलती है और पटना के सामने सोनपुर-हाजीपुर में गंगा से मिलती है. इसके जलग्रहण क्षेत्र का ज्यादातर हिस्सा नेपाल में है. 7 सितंबर को सुबह 10 बजे वाल्मीकिनगर बैराज से 1,21,500 क्यूसेक पानी छोड़ा जा रहा था. 

यह इस मौसम के 14 जुलाई के 2,24,000 क्यूसेक के सबसे ज्यादा बहाव से काफी कम था. इसके बावजूद डुमरियाघाट और हाजीपुर में नदी खतरे के निशान से ऊपर थी. पटना के आसपास गंगा पर बढ़े दबाव में इसका भी योगदान था. हालांकि इस सप्ताह यह सबसे ज्यादा पानी बढ़ाने वाली नदी नहीं थी.

7 सितंबर की सुबह वीरपुर में कोसी का बहाव 1,98,150 क्यूसेक था. यह जुलाई में दर्ज 2,55,425 क्यूसेक के उच्चतम स्तर से कम था. बागमती, बूढ़ी गंडक और घाघरा भी कई जगहों पर खतरे के निशान से ऊपर थीं.

ये सभी गांधी घाट पर सीधे नहीं पहुंचतीं. लेकिन उत्तर और पूर्वी बिहार को लगातार पानी से भरा रखती हैं और पूरे गंगा तंत्र का जलस्तर ऊंचा बनाए रखती हैं. इसलिए पटना से पानी तेजी से आगे नहीं निकल पाता.

सितंबर ने पूरा समीकरण बदल दिया. 2 सितंबर को इंद्रपुरी में सोन का बहाव 5.64 लाख क्यूसेक तक पहुंच गया. इसके बाद बड़ी मात्रा में पानी मनेर में गंगा से मिलने की ओर बढ़ा. उसी समय हाजीपुर में गंडक, फतुहा में पुनपुन और खुद गंगा में भी पानी का स्तर काफी ऊंचा था.

6 सितंबर तक पटना के चार गेज अपने पिछले सबसे ऊंचे बाढ़ स्तर को पार कर चुके थे. गांधी घाट पर जलस्तर 50.57 मीटर पहुंच गया, जो 2016 के रिकॉर्ड से पांच सेंटीमीटर ज्यादा था. 7 सितंबर तक सोन का बहाव तेजी से घट गया था. इससे राजधानी में राहत मिलती है. लेकिन इसका मतलब यह भी है कि वही पानी अब नीचे की ओर बढ़ रहा है.

गंगा के उत्तर की कहानी हिमालय से जुड़ी है. गंडक और कोसी नेपाल से पानी लेकर आती हैं. यही वजह है कि उत्तर बिहार में अक्सर बाढ़ आती है. गंगा के दक्षिण की भौगोलिक स्थिति अलग है. सोन और पुनपुन पठारी इलाके और दक्षिणी बिहार का पानी निकालती हैं.

इस सप्ताह दोनों तरफ की नदियां पहले से ऊंचे स्तर पर बह रही गंगा में पानी जोड़ रही थीं. यही वजह है कि पूरे राज्य में मानसून सामान्य से 27 फीसदी कम रहने के बावजूद राजधानी में गंगा का जलस्तर 10 साल पुराने रिकॉर्ड से ऊपर पहुंच गया. 

इस बार हालात इसलिए बदले क्योंकि कई नदियों से पानी एक साथ गंगा में पहुंचा, जबकि गंगा पहले से ही ऊंचे स्तर पर बह रही थी. नदियां नहीं बदली हैं. बदला है तो पानी आने का समय और उसकी मात्रा. इनमें से कोई भी नदी गंगा में मिलने से पहले दूसरी नदी के अपना पानी खत्म करने का इंतजार नहीं करती.

सरकार ने क्या कहा

आपदा प्रबंधन विभाग के 7 सितंबर के बुलेटिन के मुताबिक, मानसून के ज्यादातर हिस्से में बिहार में बारिश सामान्य से कम रही थी. जून में 103.8 मिलीमीटर बारिश हुई जो सामान्य से 36 फीसदी कम थी. जुलाई में 227.2 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 33 फीसदी कम थी. 

अगस्त में 190.4 मिलीमीटर बारिश हुई जो सामान्य से 29 फीसदी कम थी. 1 जून से 7 सितंबर तक राज्य में 597.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई जो अभी भी सामान्य से 27 फीसदी कम थी. हालांकि सितंबर में अब तक 75.9 मिलीमीटर बारिश हो चुकी थी जो महीने के इस समय तक के सामान्य आंकड़े से 45 फीसदी ज्यादा थी.

तीन अपेक्षाकृत सूखे महीनों के बाद बारिश का दौर आया. पानी का संतुलन तेजी से बदल गया. 6 सितंबर को केंद्रीय जल आयोग ने पाया कि पटना में चार जगहों पर गंगा का जलस्तर पिछले सबसे ऊंचे बाढ़ स्तर से ऊपर पहुंच गया था. 

गांधी घाट पर जलस्तर 50.57 मीटर था. यह 21 अगस्त 2016 को दर्ज पिछले रिकॉर्ड 50.52 मीटर से पांच सेंटीमीटर ज्यादा था. पंडारक में जलस्तर 43.92 मीटर था, जो 16 अगस्त 2021 के रिकॉर्ड से 19 सेंटीमीटर ज्यादा था. 

दानापुर में यह 52.63 मीटर था, जो 15 अगस्त 2021 के रिकॉर्ड से दो सेंटीमीटर ज्यादा था. बांका घाट पर जलस्तर 49.47 मीटर था, जो 16 अगस्त 2021 के रिकॉर्ड से तीन सेंटीमीटर ज्यादा था. चारों गेज पर जलस्तर का रुझान स्थिर बताया गया था. गंगा दीघा, हाथीदह, बक्सर, मुंगेर, भागलपुर और कहलगांव में भी खतरे के निशान से ऊपर थी.

उसी सुबह दूसरी नदियां भी कई जगहों पर खतरे के निशान से ऊपर थीं. गंडक डुमरियाघाट और हाजीपुर में, कोसी बलतारा और कुरसेला में, बूढ़ी गंडक खगड़िया में, पुनपुन श्रीपालपुर में, बागमती बेनीबाद में और घाघरा दरौली और गंगपुर में खतरे के निशान से ऊपर थी.

सरकार के मुताबिक 13 जिलों में करीब 27 लाख लोग प्रभावित हुए थे. इनमें पटना, भोजपुर, सारण, वैशाली, भागलपुर, बेगूसराय, बक्सर, समस्तीपुर, मुंगेर, कटिहार, लखीसराय, खगड़िया और अरवल शामिल हैं. बाढ़ का असर 74 प्रखंडों और 423 ग्राम पंचायतों तक पहुंचा था.

अच्छी खबर यह है कि राजधानी में जलस्तर अब घटने लगा है. 7 सितंबर को इंद्रपुरी में सोन का बहाव घटकर 1.33 लाख क्यूसेक रह गया था और इसमें गिरावट जारी थी. 

यह 2 सितंबर को मनेर में पहुंचे 5.64 लाख क्यूसेक के मुकाबले काफी कम था. पटना के गेज पुराने रिकॉर्ड तोड़ने के बाद अब तेजी से ऊपर नहीं बढ़ रहे थे.

हालांकि चिंता अभी खत्म नहीं हुई है. बाढ़ ने बस अपना स्थान बदल लिया है. वही पानी अब पूर्व की ओर उन हिस्सों में जा रहा है, जहां हाथीदह, मुंगेर, भागलपुर और कहलगांव में जलस्तर पहले से ही खतरे के निशान से ऊपर था. 

शहर के दक्षिण में पुनपुन अब भी फतुहा में अपना पानी तेजी से नहीं छोड़ पा रही है. अगर फिर से तेज बारिश होती है तो वह उस नदी में और पानी भर सकती है जो अभी पिछले उफान को पार कर आगे बढ़ना शुरू ही कर पाई है.

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