बांकीपुर उपचुनाव: नितिन नवीन की सीट पर होगा BJP की रणनीति का इम्तिहान

BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन करीब 20 वर्षों तक बांकीपुर के विधायक रहे लेकिन इस बार वह खुद इस सीट से चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. ऐसे में अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या उपचुनाव में भी BJP अपनी जीत बरकरार रख पाएगी

बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन (Photo- @NitinNabin)
बीजेपी अध्यक्ष नितिन नवीन (Photo- @NitinNabin)

हर चुनाव अपने पीछे कोई न कोई राजनीतिक विरासत छोड़ता है लेकिन बहुत कम चुनाव ऐसे होते हैं, जो किसी बड़े राजनीतिक खालीपन की पृष्ठभूमि में लड़े जाते हैं. कभी पटना पश्चिम और परिसीमन के बाद बांकीपुर कहलाने वाली यह विधानसभा सीट लंबे समय तक एक ही राजनीतिक परिवार की पहचान रही है.

नितिन नवीन से पहले उनके पिता और BJP के वरिष्ठ नेता स्वर्गीय नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा लगातार चार बार पटना पश्चिम (वर्तमान में बांकीपुर) से विधायक चुने गए थे. साल 2006 में पिता के निधन के बाद हुए उपचुनाव में नितिन नवीन पहली बार विधायक बने. इसके बाद उन्होंने हर चुनाव में बांकीपुर से जीत दर्ज की.

अब 30 जुलाई को करीब दो दशक में पहली बार ऐसा होगा, जब बांकीपुर के मतदाताओं को EVM पर 'नितिन नवीन' का नाम नहीं दिखेगा. इसके बावजूद यहां की जनता अपना नया विधायक चुनेंगे. 30 मार्च को राज्यसभा सदस्य चुने जाने के बाद नितिन नवीन ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था, जिसके कारण यह सीट खाली हुई थी.

पिछले दिसंबर में उनके BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद यह सामान्य उपचुनाव अब बिहार के सबसे अहम चुनावों में शामिल हो गया है. यह उपचुनाव सरकार की संख्या बदलने के कारण नहीं, बल्कि कुछ बड़े राजनीतिक सवालों की वजह से चर्चा में है.

क्या नितिन नवीन के बिना भी बांकीपुर में उनकी चुनावी पकड़ कायम रहेगी? क्या दो दशकों में बनाई गई उनकी लोकप्रियता किसी दूसरे उम्मीदवार को मिल पाएगी और क्या प्रशांत किशोर की जन सुराज जैसी उभरती पार्टी लोगों की दिलचस्पी को वोटों में बदल पाएगी?

बांकीपुर यानी नितिन नवीन की पहचान

बिहार की बहुत कम विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जिनकी पहचान किसी एक नेता से इतनी गहराई से जुड़ गई हो, जितनी बांकीपुर की पहचान नितिन नवीन से जुड़ी है. मई 1980 में जन्मे नितिन नवीन को राजनीति अपने पिता से विरासत में मिली. उनके पिता BJP के वरिष्ठ नेता और पटना पश्चिम से चार बार विधायक रहे थे. हालांकि, सिर्फ राजनीतिक विरासत किसी नेता को लंबे समय तक सफल नहीं बना सकती. परिवार का नाम शुरुआत में मदद कर सकता है लेकिन लगातार जीत के लिए अपनी अलग पहचान बनानी पड़ती है.

नितिन नवीन ने यही किया. 2006 में पिता के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उन्होंने पटना पश्चिम से चुनाव लड़ा और आसानी से जीत गए. चार साल बाद परिसीमन के बाद पटना पश्चिम की जगह बांकीपुर सीट बनी. उन्होंने नई सीट से चुनाव लड़ा और इसे अपना मजबूत राजनीतिक गढ़ बना लिया.

उन्होंने 2010 में भी सीट बरकरार रखी. 2015 में नीतीश कुमार और लालू यादव की लहर के बावजूद जीत हासिल की. 2020 में कोरोना महामारी के दौरान हुए चुनाव में भी जीत दर्ज की और 2025 में पहले से भी बड़ी जीत हासिल की. लगातार पांच जीत ने उन्हें सिर्फ दूसरी पीढ़ी का नेता नहीं, बल्कि बिहार BJP के सबसे मजबूत नेताओं में शामिल कर दिया.

बिहार सरकार में भी उनकी जिम्मेदारियां लगातार बढ़ती गईं. उन्होंने सड़क निर्माण, नगर विकास और आवास जैसे अहम विभाग संभाले और शहरी विकास को समझने वाले प्रशासक के रूप में पहचान बनाई. इसके साथ ही पार्टी ने उन्हें सिक्किम और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी संगठन की जिम्मेदारियां दीं. आखिरकार उन्हें BJP का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया.

आंकड़े खुद कहानी बताते हैं

अगर नितिन नवीन का राजनीतिक सफर उनकी लंबी पारी दिखाता है, तो उनका चुनावी रिकॉर्ड लगातार बढ़ते जनसमर्थन की कहानी कहता है. 2006 के उपचुनाव में उन्हें 76,025 वोट मिले थे. 2010 में बांकीपुर नई सीट बनी, इस बार यहां से उन्हें 78,771 वोट मिले. हालांकि, उनकी असली ताकत 2015 के चुनाव में दिखी. उस चुनाव में नीतीश कुमार और लालू यादव के महागठबंधन ने पूरे बिहार में NDA को बड़ा नुकसान पहुंचाया था.

फिर भी बांकीपुर अलग साबित हुआ. नितिन नवीन ने न सिर्फ अपनी बांकीपुर सीट बचाई, बल्कि उनके वोट बढ़कर 86,759 हो गए. इससे साफ हुआ कि पूरे राज्य में BJP की स्थिति और बांकीपुर में उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता अलग-अलग थी. 2020 में कोरोना महामारी के कारण मतदान कम हुआ, जिससे उनके वोट घटकर 83,068 रह गए लेकिन 2025 में उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी जीत दर्ज की और 98,299 वोट हासिल किए.

एक बात साफ नजर आती है. 2020 को छोड़कर हर चुनाव में उन्हें पिछले चुनाव से ज्यादा वोट मिले.बांकीपुर में उनका जनाधार समय के साथ घटने के बजाय लगातार बढ़ता गया. आंकड़े बताते हैं कि बांकीपुर के लोगों ने सिर्फ BJP को नहीं, बल्कि करीब 20 साल तक उनका प्रतिनिधित्व करने वाले नेता पर भरोसा जताया.

व्यापारी, पेशेवर, सरकारी कर्मचारी और तेजी से बढ़ते मध्यम वर्ग वाले इस क्षेत्र में BJP का संगठन और नितिन नवीन की व्यक्तिगत लोकप्रियता एक-दूसरे से जुड़ गए. अब BJP की चुनौती सिर्फ चुनाव जीतना नहीं है. उसे यह साबित करना है कि दो दशकों में नितिन नवीन ने जो राजनीतिक पूंजी बनाई, वह केवल उनकी नहीं बल्कि पूरी पार्टी की ताकत बन चुकी है.

क्या दूसरे BJP नेता नितिन नवीन जितना लोकप्रिय हो पाएंगे?

नितिन नवीन और BJP संगठन की पहचान अब काफी हद तक एक-दूसरे से जुड़ चुकी है. स्थानीय लोग उन्हें ऐसे नेता के रूप में याद करते हैं, जो चुनाव खत्म होने के बाद भी जनता के बीच सक्रिय रहे. उन्होंने व्यापारिक संगठनों, रेजिडेंट वेलफेयर समूहों और पार्टी कार्यकर्ताओं से लगातार संपर्क बनाए रखा और लोगों की नागरिक समस्याओं का जल्दी समाधान कराने की छवि बनाई.

राजनीतिक लोकप्रियता को वोटों की तरह मापा नहीं जा सकता लेकिन लगातार चुनावी जीत उसके होने का संकेत देती है. बांकीपुर ने सिर्फ पांच बार उन्हें विधायक नहीं बनाया, बल्कि हर बार उनका जीत का अंतर भी बढ़ाया. ऐसे समय में जब राजनीति में सत्ता विरोधी लहर आम बात मानी जाती है, यह बड़ी उपलब्धि है. BJP के लिए नितिन नवीन का बांकीपुर छोड़ना नुकसान नहीं, बल्कि पदोन्नति है. पार्टी इसे इस रूप में पेश कर रही है कि बांकीपुर से निकला नेता अब राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है.

BJP के बिहार अध्यक्ष संजय सरावगी का मानना है कि मतदाता भी इसे इसी नजरिए से देखेंगे. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, "बांकीपुर के लोगों ने हमेशा नितिन नवीन का साथ दिया है. आज BJP ने उनके प्रतिनिधि को पार्टी का सर्वोच्च संगठनात्मक पद यानी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया है. मुझे पूरा विश्वास है कि मतदाता एक बार फिर BJP को ही जीत दिलाएंगे."

सरावगी इस बात से भी सहमत नहीं हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में जाने से नितिन नवीन का बांकीपुर से जुड़ाव कम हुआ है. उन्होंने कहा, "नितिन नवीन बांकीपुर के लोगों के दिल में हैं और बांकीपुर उनके दिल में है. अब उनके पास बड़ी जिम्मेदारियां हैं लेकिन वे आज भी क्षेत्र के विकास को लेकर उतने ही गंभीर हैं. NDA सरकार विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है." उनका कहना है कि यही BJP के चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा संदेश भी होगा. चेहरा बदल सकता है लेकिन बांकीपुर और BJP का रिश्ता नहीं.

सिर्फ नेता नहीं, मजबूत संगठनकर्ता भी

BJP में नितिन नवीन की पहचान सिर्फ चुनाव जीतने वाले नेता की नहीं रही. राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से पहले ही वे पार्टी के सबसे प्रभावी संगठनकर्ताओं में गिने जाते थे. बिहार के बाहर मिली जिम्मेदारियां इस बात का संकेत थीं कि केंद्रीय नेतृत्व को उनकी संगठन क्षमता पर पूरा भरोसा था.

संजय सरावगी इसके उदाहरण के तौर पर पश्चिम बंगाल का जिक्र करते हैं. उन्होंने कहा, "नितिन नवीन के नेतृत्व में BJP ने पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक सफलता हासिल की. इससे BJP भी गौरवान्वित हुई और उनके क्षेत्र के लोग भी." यही वजह है कि BJP मानती है कि नितिन नवीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से बांकीपुर में पार्टी और मजबूत होगी.

अगर BJP आराम से यह उपचुनाव जीतती है, तो यह संदेश जाएगा कि पार्टी की संगठनात्मक ताकत अब किसी एक नेता पर निर्भर नहीं रही. यानी दो दशकों में बनी राजनीतिक पूंजी अब संस्था की ताकत बन चुकी है. हालांकि, अगर जीत का अंतर कम हुआ, तो कई सवाल उठेंगे. क्या लोगों ने BJP से ज्यादा नितिन नवीन को वोट दिया था? क्या संगठन किसी लोकप्रिय नेता की कमी पूरी कर सकता है? क्या बांकीपुर में फिर से व्यक्ति पार्टी से बड़ा हो गया है? इन सवालों का जवाब कोई सर्वे नहीं दे सकता. इसका फैसला सिर्फ बांकीपुर के मतदाता ही करेंगे.

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