NEET आंदोलन से बनी राहुल-अखिलेश की केमिस्ट्री बढ़ाएगी यूपी में बीजेपी की चुनौती?
जंतर-मंतर के छात्र आंदोलन ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को साझा राजनीतिक मंच दिया है. दोनों दल 2027 के विधानसभा चुनावों में युवाओं के मुद्दों पर बीजेपी को घेरने की रणनीति बना रहे हैं लेकिन सीट बंटवारे और नेतृत्व की चुनौती अब भी बरकरार है

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब लगभग छह महीने का समय बचा है. ऐसे समय में NEET पेपर लीक विवाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के लिए सिर्फ एक छात्र आंदोलन नहीं बल्कि साझा राजनीतिक अभियान का आधार बनता दिखाई दे रहा है.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के प्रदर्शन से शुरू हुआ आंदोलन अब उत्तर प्रदेश की राजनीति में पेपर लीक, बेरोजगारी, भर्ती में देरी और युवाओं की नाराजगी जैसे बड़े चुनावी मुद्दों का प्रतीक बन चुका है.
2024 के लोकसभा चुनाव में साथ आकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को उत्तर प्रदेश में बड़ा झटका देने वाली कांग्रेस और सपा अब इस आंदोलन के जरिए अपने गठबंधन को राजनीतिक धार देने की कोशिश कर रही हैं.
दोनों दलों का आकलन है कि राज्य के करोड़ों युवा और पहली बार मतदान करने वाले मतदाता जातीय समीकरणों से इतर रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे मुद्दों पर लामबंद हो सकते हैं.
राजनीतिक रूप से यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2017 में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की बहुचर्चित दो 'लड़के' वाली जोड़ी मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकी थी. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव ने दोनों नेताओं के रिश्ते और उनकी राजनीतिक उपयोगिता को नया आधार दिया.
अब NEET आंदोलन ने इस रिश्ते को सड़क से संसद तक सक्रिय रूप में सामने ला दिया है. 20 जून को शुरू हुआ आंदोलन संसद के मानसून सत्र के दौरान और तेज हुआ. राहुल गांधी प्रदर्शनकारी छात्रों के समर्थन में उतरे. अगले ही दिन अखिलेश यादव अपने सांसदों के साथ जंतर-मंतर पहुंचे.
संसद के भीतर दोनों दलों ने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और NEET विवाद पर चर्चा की मांग को लेकर लगातार सरकार को घेरा. प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च के दौरान दोनों नेता एक साथ नजर आए और बाद में कई विपक्षी सांसदों के साथ हिरासत में भी लिए गए.
राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ के शिया कालेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के सहायक प्रोफेसर अमित राय का मानना है कि विपक्ष लंबे समय बाद किसी ऐसे मुद्दे पर एकजुट दिखाई दिया है, जो जातीय पहचान या धार्मिक ध्रुवीकरण की बजाय सीधे युवाओं के भविष्य से जुड़ा हुआ है. यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत है.
2024 की सफलता के बाद 2027 की नई रणनीति
लोकसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस और सपा दोनों को यह भरोसा दिया कि यदि विपक्ष संगठित रहता है तो बीजेपी को चुनौती दी जा सकती है. इसी विश्वास के आधार पर दोनों दल अब विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रहे हैं.
रणनीति केवल NEET तक सीमित नहीं है. विपक्ष इस आंदोलन को व्यापक अभियान में बदलना चाहता है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक आने वाले महीनों में कथित पेपर लीक, बेरोजगारी, सरकारी भर्ती में देरी, राम मंदिर दान विवाद, खाद की कमी, नकली दवाइयों का कारोबार और बिजली की बढ़ती दरों जैसे मुद्दों को लगातार उठाया जाएगा.
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अजय कुमार का कहना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहली बार लंबे समय बाद ऐसा माहौल बन रहा है, जहां विपक्ष जातीय गठजोड़ के साथ-साथ 'इश्यू बेस्ड पॉलिटिक्स' की भी कोशिश कर रहा है.
उनके अनुसार, "अगर विपक्ष युवाओं की नाराजगी को लगातार जीवित रख पाता है तो यह चुनावी बहस को बदल सकता है. लेकिन केवल आंदोलन काफी नहीं होगा. इसे संगठन और बूथ स्तर तक ले जाना पड़ेगा."
अजय कुमार के मुताबिक, "लोकसभा चुनाव ने साबित किया कि दोनों दलों का सामाजिक आधार एक-दूसरे का पूरक बन सकता है. अब चुनौती यह है कि इस तालमेल को विधानसभा चुनाव तक बिना बड़े विवाद के बनाए रखा जाए." उनका कहना है कि विधानसभा चुनाव लोकसभा से कहीं अधिक स्थानीय होता है, इसलिए केवल राष्ट्रीय मुद्दों के सहारे चुनाव नहीं जीता जा सकता.
डिंपल यादव की सक्रियता और सपा की बदली शैली
इस पूरे आंदोलन का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू डिंपल यादव की भूमिका भी रही. आमतौर पर अपेक्षाकृत कम सार्वजनिक राजनीतिक सक्रियता रखने वाली डिंपल यादव इस आंदोलन में लगातार अग्रिम पंक्ति में दिखाई दीं.
सोशल मीडिया पर दिखाई दीं तस्वीरों ने उनकी अब तक की 'लो-प्रोफाइल' और 'शांत स्वभाव वाली बहू' की छवि को बदलकर एक सक्रिय और संघर्षशील नेता की नई पहचान देने का काम किया.
दिलचस्प बात यह है कि पार्टी सूत्र इसे महज संयोग नहीं बल्कि सोची-समझी रणनीति बता रहे हैं. बताया जाता है कि संसद सत्र शुरू होने से पहले हुई बैठक में फैसला लिया गया था कि प्रदर्शनकारियों के समर्थन में निकलने वाले मार्च का नेतृत्व अखिलेश यादव नहीं बल्कि डिंपल यादव करेंगी. उनके साथ आजमगढ़ से सांसद धर्मेंद्र यादव को भी रखा गया ताकि पूरा फोकस डिंपल पर बना रहे.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा नेतृत्व ने इस आंदोलन में भूमिकाओं का स्पष्ट विभाजन किया; अखिलेश यादव ने संसद और राजनीतिक विमर्श संभाला जबकि डिंपल यादव ने मानवीय और भावनात्मक पक्ष को मजबूत किया. सपा के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं, “डिंपल यादव की सक्रियता ने सपा के भीतर एक ऐसा नया पावर सेंटर तैयार किया है जो सीधे युवाओं और महिलाओं से जुड़ा है.
अगर अखिलेश यादव यूपी विधानसभा चुनाव में बिजी होते हैं तो डिंपल दिल्ली में कांग्रेस के साथ जरूरी संवाद करने में बड़ी भूमिका निभाएंगी. सपा नेताओं का कहना है कि डिंपल यादव और प्रियंका गांधी के बीच बहुत अच्छे रिश्ते हैं.
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले यूपी में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन और सीटों के तालमेल में डिंपल यादव और प्रियंका गांधी की बड़ी भूमिका है. पार्टी नेता अब ऐसी ही भूमिका की उम्मीद वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कर रहे हैं.
चुनौतियां अभी भी बाकी
हालांकि जंतर-मंतर का आंदोलन कांग्रेस और सपा को एक मंच पर ले आया है लेकिन गठबंधन के भीतर मौजूद चुनौतियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं. इसकी झलक संसद के भीतर भी देखने को मिली. 22 जुलाई को लोकसभा में बोलने का अवसर न मिलने पर अखिलेश यादव पहले लोकसभा अध्यक्ष से और बाद में कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल से नाराज नजर आए.
अखिलेश ने स्पष्ट कहा कि यह कांग्रेस या सपा का मुद्दा नहीं बल्कि युवाओं का मुद्दा है. उन्होंने यह शिकायत भी की कि प्रधानमंत्री आवास के बाहर आयोजित विरोध प्रदर्शन की सूचना उन्हें समय पर नहीं दी गई थी. बाद में उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने उन्हें कार्यक्रम की पूर्व जानकारी नहीं दी थी लेकिन बुलाए जाने पर समाजवादी पार्टी के सभी उपलब्ध सांसद वहां पहुंचे.
साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है. राजनीतिक दृष्टि से यह घटना छोटी जरूर लग सकती है लेकिन यह गठबंधन के भीतर मौजूद वास्तविक चुनौतियों की ओर संकेत करती है.
कुछ ही समय पहले कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बराबरी की हिस्सेदारी चाहेगी. गौतम ने तो कांग्रेस को गठबंधन का 'बड़ा भाई' तक बताया था. दूसरी ओर समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में स्वयं को स्वाभाविक रूप से बड़े दल के रूप में देखती है. यही वजह है कि सीट बंटवारे का प्रश्न आगे चलकर दोनों दलों के बीच सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा बन सकता है.
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अजय कुमार कहते हैं, "आंदोलन साझा हो सकता है लेकिन चुनाव अंततः सीटों पर लड़ा जाता है. लोकसभा में सीमित सीटों का फार्मूला था जबकि विधानसभा में 403 सीटों का बंटवारा कहीं अधिक जटिल होगा." उनका कहना है कि यदि सीट बंटवारे पर विवाद बढ़ा तो विपक्ष की पूरी राजनीतिक ऊर्जा उसी में खर्च हो सकती है.
युवा वोट ही निर्णायक मैदान, बीजेपी भी तैयार
उत्तर प्रदेश में लगभग हर चुनाव में पहली बार मतदान करने वाले लाखों युवा चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं. यही कारण है कि कांग्रेस और सपा दोनों अब इस वर्ग को अपने राजनीतिक अभियान का केंद्र बना रही हैं.
समाजवादी पार्टी का मुस्लिम-यादव सामाजिक आधार पहले से मजबूत माना जाता है. कांग्रेस उम्मीद कर रही है कि वह शहरी मतदाताओं, सवर्णों, दलितों, शिक्षित युवाओं और पहली बार वोट डालने वाले वर्ग में अपनी स्वीकार्यता बढ़ा सकेगी. यदि दोनों दल अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों को जोड़ने में सफल रहते हैं तो मुकाबला निश्चित रूप से अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकता है लेकिन बीजेपी भी इस चुनौती को हल्के में नहीं ले रही.
लोकसभा चुनाव में अपेक्षित प्रदर्शन न करने के बावजूद पार्टी ने बाद के विधानसभा उपचुनावों में अपनी संगठनात्मक क्षमता दिखाई. बीजेपी का दावा है कि उसका बूथ स्तर का नेटवर्क, लाभार्थी वर्ग से जुड़ाव, बुनियादी ढांचे का विकास, कल्याणकारी योजनाएं और सरकारी भर्ती अभियान उसे मजबूत बनाए रखेंगे. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाला चुनाव दो अलग-अलग राजनीतिक नैरेटिव के बीच होगा.
एक ओर विपक्ष युवाओं की नाराजगी, पेपर लीक, रोजगार और भर्ती को चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बनाना चाहता है. दूसरी ओर बीजेपी विकास, सुशासन, कल्याणकारी योजनाओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व को केंद्र में रखकर चुनाव लड़ना चाहेगी.
यही कारण है कि NEET आंदोलन का वास्तविक राजनीतिक असर केवल जंतर-मंतर या संसद तक सीमित नहीं रहेगा. उसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या कांग्रेस और समाजवादी पार्टी अगले कई महीनों तक युवाओं के मुद्दों को लगातार राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाए रख पाती हैं.
यदि राहुल गांधी और अखिलेश यादव यह संतुलन बनाए रखते हैं, साझा रणनीति पर कायम रहते हैं और सीट बंटवारे जैसे विवादों को नियंत्रित कर लेते हैं तो 2027 का विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए 2024 के बाद सबसे कठिन राजनीतिक मुकाबलों में से एक बन सकता है.