NEET में फर्जीवाड़ा रोकने वाले ही कैसे बन गए मददगार?

बिहार के लखीसराय में NEET की दोबारा आयोजित हुई परीक्षा में फर्जी उम्मीदवारों के शामिल होने का आरोप. बायोमेट्रिक ठेकेदार की गिरफ्तारी से परीक्षा केंद्र पर पहचान सत्यापन की व्यवस्था और उसे संचालित करने वालों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं

परीक्षा केंद्र के बाहर NEET के अभ्यर्थी (फाइल फोटो)

बिहार की आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने लखीसराय में NEET में दूसरे उम्मीदवार की जगह परीक्षा देने के मामले में एक और गिरफ्तारी की है. इससे परीक्षा व्यवस्था की एक बड़ी खामी सामने आई है. दरअसल उम्मीदवारों की पहचान प्रमाणित करने के लिए बनाई गई व्यवस्था उतनी ही सुरक्षित हो सकती है जितने भरोसेमंद उसे संचालित करने वाले लोग हैं.

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-स्नातक (NEET-UG) दोबारा इसलिए आयोजित की गई थी ताकि प्रश्नपत्र लीक होने के विवाद से डगमगाया भरोसा बहाल किया जा सके. लेकिन बिहार के लखीसराय जिले में 21 जून को हुई दोबारा परीक्षा ने एक अलग चुनौती सामने रखी. 

आरोप है कि परीक्षा की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी जिन लोगों पर थी, वे ही इसमें मिलीभगत कर रहे थे. चार महीने बाद बिहार पुलिस की आर्थिक अपराध इकाई ने एक ऐसी गिरफ्तारी की है जिससे सत्यापन व्यवस्था संचालित करने वाले लोग जांच के केंद्र में आ गए हैं.

EOU ने 9 अक्टूबर को लखीसराय के जहाना गांव के निवासी प्रमोद कुमार को किऊल थाने में दर्ज मामले संख्या 64/2026 के सिलसिले में गिरफ्तार किया. फिलहाल वह न्यायिक हिरासत में है.

यह मामला खगौर स्थित केंद्रीय विद्यालय के परीक्षा केंद्र पर दूसरे उम्मीदवारों के जरिए दोबारा परीक्षा दिलाने के आरोपों से जुड़ा है. आरोप है कि इसमें बायोमेट्रिक ऑपरेटरों और पर्यवेक्षकों ने मदद की. EOU के मुताबिक प्रमोद ने अपनी संलिप्तता मान ली है और जांचकर्ताओं को बताया कि उसने विकास कुमार और राहुल नाम के दो लोगों के जरिए लखीसराय में NEET परीक्षा के लिए बायोमेट्रिक काम का ठेका हासिल किया था.

लखीसराय में नीट परीक्षा में फर्जी उम्मीदवार से पेपर हल कराया गया (सांकेतिक तस्वीर)

EOU का कहना है कि मोहम्मद शहजाद, सुबोध और रोहित कुमार उर्फ मुरारी के साथ मिलीभगत करके और बायोमेट्रिक ऑपरेटरों की मदद से असली उम्मीदवारों की जगह फर्जी उम्मीदवारों को परीक्षा केंद्र में प्रवेश दिलाया गया.

व्यवस्था चलाने वाले लोग

प्रमोद की गिरफ्तारी से बायोमेट्रिक सत्यापन के लिए ठेका देने और उसे संचालित करने की प्रक्रिया जांच के केंद्र में आ गई है. ठेका किसने हासिल किया, कर्मचारियों की तैनाती किसने की और क्या उम्मीदवारों की पहचान जांचने की जिम्मेदारी संभालने वालों ने ही फर्जीवाड़े को अंजाम देने में मदद की? दरअसल इसी तरह के फर्जीवाड़े को रोकने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी.

बायोमेट्रिक सत्यापन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि परीक्षा केंद्र पर पहुंचने वाला व्यक्ति वास्तव में वही उम्मीदवार हो, जिसने परीक्षा के लिए पंजीकरण कराया है. इस प्रक्रिया का कारगर होना उन कर्मचारियों पर निर्भर करता है जो जांच करते हैं, पहचान संबंधी रिकॉर्ड संभालते हैं, विसंगतियों को दूर करते हैं और उम्मीदवार की पहचान प्रमाणित करते हैं.

अगर ये कर्मचारी ही फर्जी उम्मीदवारों के साथ मिलीभगत कर लें तो सुरक्षा व्यवस्था के सामने ऐसी समस्या खड़ी हो जाती है जिसे केवल तकनीक के सहारे हल करना मुश्किल है. सवाल यह जरूरी नहीं कि उंगलियों के निशान या डिजिटल रिकॉर्ड में सेंध लगाई जा सकती है या नहीं. सवाल यह भी है कि उनके इस्तेमाल से जुड़ी प्रक्रियाओं में हेरफेर किया जा सकता है या नहीं.

लखीसराय मामले में EOU ने 10 अक्टूबर को कहा है कि बायोमेट्रिक ऑपरेटरों ने फर्जी उम्मीदवारों को परीक्षा केंद्र में प्रवेश दिलाने में मदद की. हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि कथित फर्जीवाड़े को किस-किस चरण में और किस तरीके से अंजाम दिया गया. जांच के दौरान जुटाए गए सबूतों से ही धोखाधड़ी का सटीक तरीका सामने आ सकेगा.

दोबारा परीक्षा और भरोसे को एक और झटका

NEET-UG की 3 मई को हुई परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने के विवाद के बीच रद्द कर दी गई थी. इसके बाद 21 जून को दोबारा परीक्षा आयोजित की गई. राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) ने कहा था कि इसका उद्देश्य उम्मीदवारों को फिर से परीक्षा देने का अवसर देना है. दोबारा परीक्षा के दौरान भी सुरक्षा व्यवस्था लागू थी, जिसमें उम्मीदवारों का सत्यापन शामिल था.

मई में पेपर लीक के बाद जून में दोबारा NEET की परीक्षा कराई गई थी (सांकेतिक तस्वीर)

लेकिन इसी दिन लखीसराय में दूसरे उम्मीदवारों के जरिए परीक्षा देने के आरोप सामने आए. इसके बाद पुलिस ने किऊल थाने में प्राथमिकी दर्ज की जिसमें 27 आरोपियों के नाम हैं. इनमें कथित फर्जी उम्मीदवार और बायोमेट्रिक सत्यापन दल के सदस्य शामिल हैं.

दोनों मामलों के बीच का अंतर साफ है. प्रश्नपत्र लीक होने के विवाद ने परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए थे. लखीसराय मामले ने परीक्षा केंद्र पर उम्मीदवारों की पहचान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं. 

ये सुरक्षा व्यवस्था की दो अलग-अलग कमजोरियां हैं, लेकिन दोनों एक ही चिंता पैदा करती हैं. क्या कोई राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा यह सुनिश्चित कर सकती है कि हर उम्मीदवार को मुकाबले का निष्पक्ष और समान अवसर मिले?

कथित फर्जीवाड़े में एक व्यक्ति के बजाय एक पूरे नेटवर्क की भूमिका भी सामने आती दिख रही है. EOU के बयान में किऊल मामले के 27 आरोपियों का जिक्र है. इनमें पंजीकृत उम्मीदवार, कथित फर्जी उम्मीदवार, बायोमेट्रिक ऑपरेटर और पर्यवेक्षक शामिल हैं. बयान के मुताबिक इस मामले में पहले गिरफ्तार किए गए 14 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए जा चुके हैं.

प्रमोद की कथित संलिप्तता सिर्फ किऊल मामले तक सीमित नहीं है. EOU का कहना है कि जांचकर्ताओं को लखीसराय के कवैया थाने में दर्ज NEET से जुड़े दो अन्य मामलों में भी उसकी मिलीभगत के सबूत मिले हैं. ये मामले संख्या 244/26 और 245/26 हैं.

परीक्षा केंद्र से आगे जवाबदेही का सवाल

यह मामला बड़ी परीक्षाओं में आउटसोर्स की जाने वाली सेवाओं की निगरानी को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है. अगर EOU के आरोप साबित होते हैं तो बायोमेट्रिक सत्यापन का ठेका हासिल करना और कर्मचारियों की तैनाती करना महज प्रशासनिक काम नहीं थे. ये परीक्षा की सुरक्षा व्यवस्था की कमजोर कड़ियां भी साबित हो सकते हैं.

जांच में यह स्पष्ट करना होगा कि कथित हेरफेर कुछ लोगों तक सीमित था या कर्मचारियों के चयन, निगरानी और सत्यापन की जिम्मेदारी संभालने वालों पर नजर रखने की व्यवस्था में भी व्यापक खामियां थीं. इसके अलावा पंजीकृत उम्मीदवारों, कथित फर्जी उम्मीदवारों और बिचौलियों की भूमिका भी तय करनी होगी.

NTA के लिए यह मामला सिर्फ एक जिले तक सीमित नहीं है. डिजिटल पहचान जांच से परीक्षा की सुरक्षा मजबूत हो सकती है लेकिन इसका कारगर होना पारदर्शी प्रक्रियाओं, स्वतंत्र निगरानी और इसे संचालित करने वालों की जवाबदेही पर निर्भर करता है. 

सुरक्षा के संभावित उपायों में बायोमेट्रिक रिकॉर्ड का ऑडिट, ठेकेदारों की कड़ी जांच, स्वतंत्र निगरानी और पहचान संबंधी विसंगतियों से निपटने के लिए दर्ज प्रक्रियाएं शामिल हो सकती हैं. इनमें से कोई उपाय लखीसराय में कथित फर्जीवाड़े को रोक सकता था या नहीं, यह धोखाधड़ी के सटीक तरीके पर निर्भर करेगा.

EOU ने किऊल मामले में भारतीय न्याय संहिता, 2023 और सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 की धाराएं लगाई हैं. उसकी प्रेस रिलीज के मुताबिक, जांच जारी है. इसमें अन्य लोगों की भूमिका की पड़ताल और जरूरत पड़ने पर आगे की कानूनी कार्रवाई भी शामिल है.

उम्मीदवारों और उनके परिवारों के लिए यह मामला सीधे उनके भविष्य से जुड़ा है. NEET के जरिए मेडिकल शिक्षा में दाखिले का रास्ता खुलता है. इस परीक्षा की विश्वसनीयता इस भरोसे पर टिकी है कि दाखिला निष्पक्ष परीक्षा के जरिए हासिल किया जाता है. दूसरे की जगह परीक्षा देने का हर कथित मामला इस भरोसे को नुकसान पहुंचाता है. इसका असर उन लोगों पर ही नहीं पड़ता, जिनकी पहचान का कथित तौर पर दुरुपयोग हुआ बल्कि उन उम्मीदवारों पर भी पड़ता है, जिन्होंने ईमानदारी से परीक्षा दी.

अक्टूबर में हुई गिरफ्तारी से बायोमेट्रिक ठेकेदार की कथित भूमिका पर ध्यान केंद्रित हुआ है. जांच में किसी बड़े षड्यंत्र का खुलासा होता है या नहीं, यह अभी देखना बाकी है. लेकिन बुनियादी सवाल साफ है: उम्मीदवारों की पहचान प्रमाणित करने के लिए बनाई गई व्यवस्था उतनी ही सुरक्षित हो सकती है जितने भरोसेमंद उसे संचालित करने की जिम्मेदारी संभालने वाले लोग हैं.

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