नवीन पटनायक ने ऐसा क्या किया कि ओडिशा के BJP सांसद मुश्किल में पड़ गए?

पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने आरोप लगाया है कि नए खनन कानून से ओडिशा के राजस्व के साथ उसके खनिज संसाधनों पर नियंत्रण भी कमजोर होगा. उन्होंने BJP सांसदों से कानून के समर्थन पर फिर से विचार करने को कहा है

Odisha Chief Minister Naveen Patnaik
ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक (फाइल फोटो)

बीजू जनता दल (BJD) के अध्यक्ष और ओडिशा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नवीन पटनायक ने खनन और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम, 2026 के खिलाफ अपना विरोध तेज कर दिया है. 

उनका कहना है कि इस कानून से ओडिशा को हजारों करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हो सकता है. साथ ही, राज्य सरकार का अपने खनिज संसाधनों और खनिज वाली जमीन पर नियंत्रण भी कमजोर हो सकता है.

29 अगस्त को ओडिशा के सत्तारूढ़ BJP के सभी सांसदों को लिखे पत्र में पटनायक ने उनसे कानून के समर्थन पर दोबारा विचार करने और इसे वापस लेने की मांग की. 13 अगस्त को जब लोकसभा में यह विधेयक पारित हुआ, नवीन पटनायक ने इसे ‘ओडिशा के लिए काला दिन’ बताया. 

पूर्व मुख्यमंत्री के मुताबिक इस कानून की वजह से खनिज संपदा से समृद्ध ओडिशा पर गंभीर असर पड़ेगा. यह हवाला देते हुए पटनायक ने सांसदों से सवाल किया कि उन्होंने ऐसे कानून के पक्ष में मतदान क्यों किया? 

पटनायक का विरोध तीन बड़े मुद्दों पर केंद्रित है. पहला, राज्य के राजस्व में संभावित कमी. दूसरा, ओडिशा के खनिज संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण कमजोर होना. तीसरा, खनन प्रभावित समुदायों पर पड़ने वाला सामाजिक और पर्यावरणीय बोझ.

पटनायक ने कहा कि ओडिशा की खनन पर निर्भरता को देखते हुए संशोधन के वित्तीय प्रभाव खास तौर पर गंभीर हैं. उनके पत्र के मुताबिक, भारत की कुल खनिज संपदा में ओडिशा की हिस्सेदारी करीब 44 फीसदी है. राज्य दशकों से देश के इस्पात, बिजली, खनन और बुनियादी ढांचा क्षेत्रों के निर्माण के लिए जरूरी खनिज संसाधन उपलब्ध कराता रहा है.

खनन ओडिशा की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है (सांकेतिक तस्वीर)

इस पत्र में कहा गया है, "अनुमानित सालाना (राजस्व) नुकसान 12,000 करोड़ रुपए से अधिक होगा." पटनायक ने कहा कि वित्तीय नुकसान समस्या का सिर्फ एक हिस्सा है. उन्होंने लिखा, "इससे भी बड़ा नुकसान यह है कि एक ही विधायी कदम के जरिए हमारे अपने खनिजों और खनिज वाली जमीन पर हमारा नियंत्रण छीन लिया गया."

कानून में संशोधनों का उद्देश्य राज्यों की ओर से खनिज अधिकारों और खनिज वाली जमीन पर कर लगाने की शक्तियों को सीमित करना है. इस प्रावधान पर खनिज उत्पादक राज्यों ने आपत्ति जताई है. 

पटनायक के लिए इसलिए मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि ओडिशा को हर साल कितना पैसा गंवाना पड़ सकता है. असली सवाल यह है कि राज्य के प्राकृतिक संसाधनों से पैदा होने वाले आर्थिक मूल्य पर किसका नियंत्रण होगा.

पटनायक ने इस कानून को BJD और BJP के बीच महज विवाद के बजाय ओडिशा के अपने संसाधनों पर अधिकार का मुद्दा बनाया है. उन्होंने BJP सांसदों को याद दिलाया कि संसद में उनकी पहली जिम्मेदारी ओडिशा का प्रतिनिधित्व करना है. उन्होंने पत्र में लिखा है, "हमारी संसद भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर है." उन्होंने कहा कि राज्य के सांसद "लोकतंत्र के इस सर्वोच्च मंच पर ओडिशा की आवाज" हैं.

इसके बाद उन्होंने विधेयक के समर्थन पर सवाल उठाते हुए कहा, "ओडिशा की जनता ने अपने हितों की रक्षा करने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए आप पर भरोसा करके आपको चुना है."

पटनायक की यह आलोचना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ओडिशा में BJP सत्ता में है और उसके सांसदों ने संसद में इस कानून का समर्थन किया था. ऐसे में पटनायक ने इस मुद्दे को इस सवाल से जोड़ दिया है कि क्या राज्य के BJP प्रतिनिधि अपनी पार्टी के रुख से ऊपर ओडिशा के हितों को प्राथमिकता देंगे.

पटनायक ने सांसदों पर ऐसे कानून का समर्थन करने का आरोप लगाया, जिसे उनके मुताबिक संसद में पर्याप्त चर्चा के बिना पारित किया गया. उन्होंने लिखा, "ओडिशा की जनता पर दूरगामी असर डालने वाले प्रावधान होने के बावजूद विधेयक पर लोकसभा में 10 मिनट से भी कम समय तक चर्चा हुई."

पटनायक ने इस संशोधन को ओडिशा के खनन क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के अनुभवों से भी जोड़ा है. पत्र के दूसरे हिस्से में उन्होंने कहा कि खनन के परिणामों को झेलने वाले लोगों को अक्सर इसकी कीमत खुद चुकानी पड़ती है. उन्होंने लिखा, "यह ओडिशा के उन लोगों के साथ अन्याय है, जो प्रदूषण, विस्थापन, पर्यावरणीय क्षरण और खनन के खतरों व मुश्किलों को झेलते हैं."

उनकी दलील है कि ओडिशा की खनिज संपदा को सिर्फ आर्थिक संसाधन के तौर पर नहीं देखा जा सकता. राज्य के खनिज वाले इलाकों को खनन से जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक दुष्परिणामों का भी सामना करना पड़ा है.

पटनायक ने इस मुद्दे को राज्य की युवा पीढ़ी से भी जोड़ा. उन्होंने लिखा कि यह कानून "ओडिशा के बच्चों और युवाओं के साथ अन्याय होगा, जिनका भविष्य इस राज्य के संसाधनों और अवसरों से जुड़ा है."

पटनायक के पत्र में इस संशोधन कानून को ओडिशा की अपने आर्थिक भविष्य को तय करने की क्षमता के सवाल के रूप में पेश किया गया है. उन्होंने इसे ‘एक सशक्त ओडिशा के उस सपने के साथ अन्याय’ बताया, जिसके पास अपने भविष्य को तय करने का भरोसा और संसाधन हों.

यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि ओडिशा की खनन अर्थव्यवस्था लंबे समय से राज्य के वित्त और औद्योगिक विकास का अहम आधार रही है. पटनायक का तर्क है कि ओडिशा की जमीन के नीचे मौजूद खनिज संपदा राज्य को अधिक आर्थिक ताकत और फैसले लेने का अधिकार देना चाहिए न कि इन संसाधनों पर उसका नियंत्रण कम करना चाहिए.

इसी वजह से पटनायक ने BJP सांसदों से संशोधनों को चुनौती देने और उन्हें वापस लेने की मांग करने को कहा है. उन्होंने लिखा, "मैं आपसे गंभीरता से अपील करता हूं कि अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनें और ओडिशा की आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के बारे में सोचें."

इस अपील में स्पष्ट राजनीतिक संदेश भी है. पटनायक ने सांसदों से कहा कि विधेयक पर उनका रुख ओडिशा के हितों के संदर्भ में याद रखा जाएगा. उन्होंने लिखा, "इतिहास आपका आकलन इस आधार पर नहीं करेगा कि आप किस पार्टी के साथ खड़े थे, बल्कि इस आधार पर करेगा कि जब ओडिशा के लिए सबसे ज्यादा जरूरी था, तब आप उसके लिए खड़े हुए या नहीं."

अंत में उन्होंने BJP सांसदों से कहा कि वे ‘ऐतिहासिक मोड़’ पर खड़े हैं और उनके सामने राज्य तथा उसके लोगों के लिए खड़े होने का विकल्प है. पटनायक ने कहा, "मैं फैसला आपके विवेक पर छोड़ता हूं."

इस तरह यह पत्र खनन और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम के विरोध को राजस्व, संघीय शक्तियों, खनिज संसाधनों के स्वामित्व और नियंत्रण तथा उस राज्य के दीर्घकालिक हितों से जुड़े व्यापक मुद्दे में बदल देता है, जिसकी अर्थव्यवस्था खनन से गहराई से जुड़ी है. 

साथ ही, यह ओडिशा के BJP सांसदों पर दबाव डालता है कि क्या वे संसद में जिस कानून का समर्थन कर चुके हैं, उसके खिलाफ राज्य के हितों की रक्षा के लिए आवाज उठाएंगे.

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