मेरठ का सेंट्रल मार्केट विवाद कैसे बना BJP की गले की फांस?

मेरठ के सेंट्रल मार्केट से शुरू हुआ विवाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 16,726 संपत्तियों तक पहुंच गया है. करीब 650 व्यापारियों के पुनर्वास और स्थानीय नाराजगी के बीच BJP के सामने 2027 से पहले बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है

Bulldozer action at Meerut Central Market (File Photo)
मेरठ के सेंट्रल मार्केट में एक दुकान ढहाने की कार्रवाई (फाइल फोटो)

मेरठ में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर सेंट्रल मार्केट का इलाका कभी अपनी दुकानों और लोगों की चहलकदमी से गुलजार रहता था. अब यहां खामोशी है. टूटी हुई दुकानें और कमाई का जरिया खत्म होने पर व्यापारियों के दर्द ने माहौल को गमगीन भी कर रखा है. 

24 सितंबर को सेंट्रल मार्केट के प्रभावित व्यापारियों के पुनर्वास के लिए प्रस्तावित जगहों का सर्वे शुरू हो गया है. मेरठ के सांसद अरुण गोविल, राज्यमंत्री सोमेंद्र तोमर और BJP महानगर अध्यक्ष विवेक रस्तोगी ने प्रस्तावित स्थलों का निरीक्षण किया. 

BJP नेताओं के मुताबिक करीब 650 व्यापारियों को सरकारी जमीन पर कम किराये पर लीज के आधार पर दुकानें देने की योजना है. रंगोली मंडप के बराबर सामुदायिक केंद्र की जमीन पर कॉम्प्लेक्स बनाने का प्रस्ताव है और योगी सरकार में राज्यमंत्री सोमेंद्र तोमर ने छह महीने के भीतर आवंटन पत्र देने की प्रक्रिया शुरू होने की बात कही. 

लेकिन यही ताजा पहल इस पूरे मामले की राजनीतिक पेचीदगी को भी सामने लाती है. एक तरफ सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुपालन में अवैध निर्माण पर कार्रवाई हो रही है, दूसरी तरफ उन्हीं प्रभावित व्यापारियों के पुनर्वास का जिम्मा अब सरकार और BJP के स्थानीय जनप्रतिनिधियों के सामने है. 

21 सितंबर के सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने मामला 44 संपत्तियों से बढ़ाकर मेरठ में जोन-ए की 16,726 संपत्तियों तक पहुंचा दिया है. अदालत ने अन्य जोन में भी अवैध निर्माण की पहचान और रिपोर्ट मांगी है. इसकी अगली सुनवाई 9 दिसंबर को होगी. 

44 से 16,726 संपत्तियों तक पहुंचा विवाद

मेरठ के शास्त्रीनगर स्थित सेंट्रल मार्केट का विवाद कोई नया नहीं है. इसकी कानूनी शुरुआत आवासीय भूखंड के व्यावसायिक इस्तेमाल और उस पर हुए निर्माण को लेकर हुई थी. मामला पहले हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के बाद मेरठ सेंट्रल मार्केट की कुछ दुकानें

17 दिसंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अनधिकृत व्यावसायिक निर्माण के खिलाफ कार्रवाई के रास्ते को बरकरार रखा. इसके बाद 2025 में कार्रवाई हुई और 2026 में मामला और व्यापक होता चला गया. सेंट्रल मार्केट में 44 संपत्तियों को सील किए जाने के बाद जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने इनसे जुड़े अवैध निर्माण हटाने के निर्देश दिए. 

सितंबर में प्रशासन और आवास विकास परिषद ने ध्वस्तीकरण शुरू किया. 16 सितंबर को छह भवनों के खिलाफ कार्रवाई हुई. इससे पहले 44 संपत्तियों की कार्रवाई को लेकर व्यापारियों में भारी नाराजगी सामने आई थी. व्यापारियों का पक्ष रहा है कि उन्हें संपत्तियां आवंटित करते समय ही कई जगह सेटबैक नहीं छोड़ा गया था. 

संयुक्त व्यापार संघ के अध्यक्ष नवीन गुप्ता ने अप्रैल में आरोप लगाया था कि प्रदेश सरकार की नई भू-उपयोग उपविधि के तहत करीब 80 व्यापारियों के भू-उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया पूरी हुई और इसके लिए करीब 70 करोड़ रुपए शुल्क के रूप में जमा कराए गए, लेकिन आवास विकास परिषद ने इन तथ्यों को सुप्रीम कोर्ट के सामने सही तरीके से नहीं रखा. 

व्यापारियों के मुताबिक इसके बजाय 44 भूखंडों के निर्माण को अवैध बताकर सूची अदालत में दी गई. इसी दौर में व्यापारियों ने आवास विकास परिषद की कार्रवाई के खिलाफ विरोध किया. एक व्यापारी के बेहोश होने की घटना भी सामने आई. 

सपा विधायक अतुल प्रधान धरनास्थल पर पहुंचे और उन्होंने BJP सांसद, विधायक तथा महापौर पर व्यापारियों के साथ खड़े न होने का आरोप लगाया. प्रधान का कहना था कि उन्होंने यह मामला विधानसभा में उठाया है और यदि सपा की सरकार बनी तो व्यापारियों की मदद की जाएगी. 

कारोबारियों के सामने अचानक रोजी-रोटी का सवाल खड़ा हो गया है

यह राजनीतिक हमला उस समय हुआ जब BJP के स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर व्यापारियों में असंतोष दिखाई दे रहा था. इस प्रकरण में पीडि़त महिलाओं का धरना भी इस विवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा. महिलाओं का कहना था कि उनका विरोध सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ नहीं, बल्कि आवास विकास परिषद के अधिकारियों की कार्यशैली के खिलाफ है. 

अब 21 सितंबर के आदेश ने इस विवाद को कई गुना बड़ा कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने जोन-ए में चिन्हित 16,726 निर्माणों को तत्काल सील करने का निर्देश दिया. अदालत ने मेरठ में 500 से 600 अवैध कॉलोनियों के निर्माण पर भी सवाल उठाया और अधिकारियों से पूछा कि इतने वर्षों तक ये निर्माण होते रहे तो संबंधित प्राधिकरण क्या कर रहे थे. 

अदालत ने अवैध निर्माण के जिम्मेदार लोगों और चारों जोन में कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है. यहीं से सेंट्रल मार्केट का मुद्दा केवल कुछ सौ व्यापारियों की परेशानी नहीं रह गया. अब सवाल मेरठ शहर में लंबे समय से हुए निर्माण, आवासीय संपत्तियों के व्यावसायिक इस्तेमाल, प्राधिकरण की निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही का भी है.

कारोबारियों की चिंता

BJP के लिए इस प्रकरण की सबसे कठिन परत यही है. सुप्रीम कोर्ट का आदेश स्पष्ट है और स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व के लिए उससे अलग रास्ता निकालना आसान नहीं है. अदालत ने कहा है कि अवैध निर्माण लंबे समय तक मौजूद रहने से वैध नहीं हो जाता. 

21 सितंबर की सुनवाई में अदालत ने पांच साल या 50 साल का अंतर किए बिना अवैध निर्माण पर कार्रवाई की बात कही. साथ ही अदालत ने 44 संपत्तियों पर कार्रवाई की गति पर भी सवाल उठाए. दूसरी तरफ जमीन पर प्रभावित परिवार हैं. 

मेरठ निवासी और राजनीतिक विश्लेषक संदीप कुमार कहते हैं, “दुकान टूटने का अर्थ केवल एक निर्माण का खत्म होना नहीं है. इसके साथ कारोबार, कर्मचारियों की रोजी-रोटी, वर्षों का निवेश और आसपास बनी आर्थिक गतिविधियां जुड़ी हैं. यही वजह है कि अदालत के आदेश और उसके स्थानीय सामाजिक-आर्थिक प्रभाव के बीच संतुलन BJP के स्थानीय नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है.” 

23 सितंबर को सांसद अरुण गोविल ने बीजेपी नेताओं के साथ व्यापारियों से मुलाकात की थी (फाइल फोटो)

BJP ने अब इसी अंतर को पुनर्वास की पहल के जरिए भरने की कोशिश शुरू की है. 23 सितंबर को सर्किट हाउस में सांसद अरुण गोविल, राज्यमंत्री सोमेंद्र तोमर, महापौर हरिकांत अहलूवालिया, कैंट विधायक अमित अग्रवाल और महानगर अध्यक्ष विवेक रस्तोगी ने संयुक्त रूप से पत्रकारों के सामने कहा कि प्रभावित व्यापारियों और निवासियों के लिए सरकार नई पुनर्वास नीति ला रही है. 

लगभग 650 व्यापारियों को आबादी के बीच लीज पर दुकानें देने की बात कही गई. इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक सवाल ने BJP के सामने खड़ी असहजता को भी उजागर कर दिया. जब यह पूछा गया कि जिन लोगों का पुनर्वास किया जाना है, क्या उनकी इच्छा भी पूछी गई है, तो सांसद अरुण गोविल नाराज हो गए. 

गोविल ने कहा कि सरकार के पास प्रभावित लोगों की संवेदनाओं को देखते हुए और क्या विकल्प है और सवाल किया कि क्या उनसे सुप्रीम कोर्ट से ऊपर जाने की अपेक्षा की जा रही है. 

यह संवाद महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे BJP के स्थानीय नेताओं की स्थिति साफ होती है. वे अदालत के आदेश को चुनौती देने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन प्रभावित व्यापारियों के बीच राजनीतिक और सामाजिक दबाव से भी बच नहीं सकते.

BJP कार्यकर्ता भी सवाल उठा रहे 

सितंबर की शुरुआत में BJP के ब्लॉक प्रमुख कपिल मुखिया ने पार्टी से इस्तीफा देते हुए छात्रों, किसानों और व्यापारियों की समस्याओं का मुद्दा उठाया था. उन्होंने सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों की परेशानी का भी उल्लेख किया और कहा था कि वरिष्ठ नेता कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुन रहे हैं. 

उन्होंने आगे की रणनीति 36 बिरादरी के साथ मिलकर तय करने की बात कही थी. इसके बाद 21-22 सितंबर को BJP के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के पश्चिमी यूपी दौरे के दौरान मेरठ में पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं ने सेंट्रल मार्केट का मुद्दा उठाया. 

रिपोर्टों के मुताबिक कार्यकर्ताओं ने जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल किए और कहा कि व्यापारियों को जिस तरह का समर्थन मिलना चाहिए था वह नहीं मिला. इस घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि पश्चिमी यूपी में व्यापारी वर्ग BJP का महत्वपूर्ण सामाजिक आधार रहा है. 

सेंट्रल मार्केट में कार्रवाई के बाद यदि व्यापारियों की नाराजगी केवल प्रभावित दुकानदारों तक सीमित रहती है तो एक बात है लेकिन यदि इसे स्थानीय प्रशासन, जनप्रतिनिधियों और सरकार की कार्यशैली से जोड़कर देखा जाने लगे तो BJP के लिए चुनौती बढ़ती है.

समयसीमा सबसे बड़ा सवाल

सेंट्रल मार्केट को लेकर BJP ने फिलहाल दो समानांतर रास्ते चुने हैं. पहला, सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान और अनुपालन. दूसरा, प्रभावित व्यापारियों के लिए पुनर्वास की व्यवस्था. राजनीतिक चुनौती इन दोनों को जमीन पर साथ लेकर चलने की है.

करीब 650 व्यापारियों के लिए प्रस्तावित पुनर्वास योजना का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि जमीन कितनी है, कितनी दुकानें बन सकती हैं, पात्रता कैसे तय होगी, मकान मालिक और किराएदार दोनों को किस आधार पर जगह मिलेगी, लीज की अवधि क्या होगी, किराया कितना होगा और आवंटन कब तक पूरा होगा. 

अभी इन सवालों के सभी अंतिम जवाब सार्वजनिक नहीं हैं. BJP नेताओं ने छह महीने के भीतर आवंटन पत्र की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही है. इस समयसीमा का राजनीतिक महत्व भी है. सितंबर 2026 से छह महीने का मतलब लगभग मार्च 2027 है. 

यानी पुनर्वास की प्रक्रिया उस समय निर्णायक चरण में पहुंच सकती है जब यूपी विधानसभा चुनाव की तैयारियां भी तेज होंगी. यही कारण है कि सेंट्रल मार्केट का समाधान केवल प्रशासनिक योजना नहीं रहेगा. उसके क्रियान्वयन की गति, पारदर्शिता और प्रभावित व्यापारियों की प्रतिक्रिया सीधे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन सकती है.

दूसरी ओर 16,726 संपत्तियों का मामला इस पूरे संकट को और बड़ा बना देता है. यह आंकड़ा बताता है कि मेरठ में सवाल सिर्फ सेंट्रल मार्केट के 44 चिन्हित भवनों का नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कार्रवाई का दायरा पूरे जोन तक फैल सकता है. 

अदालत ने दूसरे जोन में भी अवैध निर्माण की पहचान के निर्देश दिए हैं. इस बीच 24 सितंबर को मेरठ विकास प्राधिकरण के सचिव अर्पित गुप्ता को पद से हटाकर प्रतीक्षा सूची में भेजे जाने की खबर ने प्रशासनिक पक्ष को भी नया मोड़ दिया है. 

रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट में जोन-ए की 16,726 संपत्तियों की सूची पेश किए जाने के बाद शासन स्तर पर यह कार्रवाई हुई और सूची तैयार करने की प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है. यानी सेंट्रल मार्केट प्रकरण अब तीन स्तरों पर चल रहा है.

अदालत का आदेश, प्रशासन की कार्रवाई और राजनीतिक पुनर्वास. BJP के लिए मुश्किल यह है कि तीनों मोर्चों पर उसे एक साथ जवाब देना पड़ रहा है. अदालत से राहत दिलाने का वादा करना संभव नहीं, क्योंकि अंतिम आदेश सुप्रीम कोर्ट का है. प्रशासनिक कार्रवाई रोकना भी आसान नहीं. और व्यापारियों को उनके कारोबार का विकल्प दिए बिना राजनीतिक असंतोष को संभालना भी कठिन है.

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