BSP को लेकर किस दुविधा में हैं मायावती?
भतीजे आकाश आनंद से लेकर पुराने भरोसेमंदों तक लगातार कार्रवाई और फिर बहाली के चलते BSP सुप्रीमो मायावती के निर्णयों पर उठ रहे सवाल

BSP में मायावती के उत्तराधिकार का मामला अब भी उलझा हुआ है (फाइल फोटो)
2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है लेकिन BSP की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती के सामने संगठन, नेतृत्व और उत्तराधिकारी को लेकर दुविधा लगातार गहरी होती दिख रही है.
पिछले करीब दो वर्षों में पार्टी के भीतर सीनियर नेताओं को हटाने, वापस लेने और फिर कार्रवाई करने का सिलसिला जिस तरह चला है उसने सिर्फ नेताओं की राजनीतिक स्थिति ही नहीं बदली बल्कि कैडर के बीच भी नेतृत्व की स्थिरता को लेकर सवाल खड़े किए हैं.
इस पूरी कवायद का सबसे ताजा उदाहरण मायावती के भतीजे आकाश आनंद हैं. कभी उन्हें मायावती के राजनीतिक उत्तराधिकारी और पार्टी के नंबर दो के तौर पर पेश किया गया, फिर पद और उत्तराधिकारी की जिम्मेदारी वापस ली गई, दोबारा बहाल किया गया. फिर उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया और बाद में राष्ट्रीय संयोजक की भूमिका दी गई.
अब एक बार फिर उन्हें किनारे कर दिया गया है. मायावती ने इसके लिए उनकी कम उम्र और राजनीतिक परिपक्वता की जरूरत को वजह बताया है. लेकिन सवाल यह है कि अगर आकाश को पार्टी की दूसरी पीढ़ी का चेहरा बनाने की तैयारी थी तो बार-बार उनके साथ ऐसा क्यों हुआ?
और इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या मायावती अपनी पार्टी में अपने बाद की नेतृत्व व्यवस्था को लेकर खुद आश्वस्त नहीं हैं?
दुविधा में मायावती
आकाश आनंद का राजनीतिक सफर BSP की मौजूदा दुविधा को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है. 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले मायावती ने उन्हें तेजी से पार्टी के प्रमुख युवा चेहरे के रूप में आगे बढ़ाया. आकाश ने उत्तर प्रदेश में चुनावी सभाएं शुरू कीं और पार्टी के पारंपरिक राजनीतिक अंदाज से अलग आक्रामक भाषा और युवा शैली अपनाई.
इससे यह संकेत गया कि BSP अपने पुराने वोट बैंक के साथ नई पीढ़ी को जोड़ने की कोशिश कर रही है. लेकिन मई 2024 में सीतापुर की एक जनसभा के बाद उनके खिलाफ कथित भड़काऊ भाषण को लेकर मामला दर्ज हुआ और मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय समन्वयक पद से हटा दिया. साथ ही उन्हें राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाए जाने का फैसला भी वापस ले लिया गया.
उस समय मायावती का संदेश साफ था कि आकाश को अभी राजनीतिक रूप से और परिपक्व होने की जरूरत है. महज 47 दिन बाद तस्वीर बदल गई. जून 2024 में आकाश को फिर राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया और उन्हें दोबारा उत्तराधिकारी घोषित किया गया.
इसके बाद मार्च 2025 में एक बार फिर उन्हें पद से हटाकर पार्टी से बाहर कर दिया गया. दो महीने बाद यह फैसला फिर पलटा और आकाश की पार्टी में वापसी हुई. उन्हें मुख्य राष्ट्रीय समन्वयक बनाया गया और अगस्त 2025 में राष्ट्रीय संयोजक का पद दिया गया.
यानी दो साल से कुछ अधिक समय में आकाश की भूमिका लगातार बदलती रही. कभी वे उत्तराधिकारी बने, कभी पार्टी से बाहर हुए और कभी फिर पार्टी की केंद्रीय भूमिका में लौटे.
मेरठ के एक कालेज में शिक्षक और राजनीतिक विश्लेषक संदीप कुमार वर्मा के मुताबिक यह बदलाव केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक यात्रा नहीं है. यह BSP की उस समस्या को सामने लाता है जिसमें मायावती के बाद पार्टी का नेतृत्व कौन संभालेगा, इसका जवाब संगठन के भीतर भी स्थिर नहीं दिखाई देता.
अब जब आकाश को फिर पीछे किया गया है और उनकी जगह उनके छोटे भाई ईशान को पार्टी की महत्वपूर्ण बैठकों में सामने लाया गया है तो सवाल और गहरा हो गया है: क्या मायावती युवा नेतृत्व तैयार करना चाहती हैं, लेकिन उसके राजनीतिक स्वरूप को लेकर आश्वस्त नहीं हैं?
या फिर वे ऐसी दूसरी कतार चाहती हैं जो उनके नियंत्रण और राजनीतिक लाइन से बाहर जाकर स्वतंत्र पहचान न बनाए?
भरोसा और अविश्वास का सिलसिला
BSP में यह पैटर्न केवल आकाश आनंद तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ लगभग इसी तरह का व्यवहार देखने को मिला है. किसी नेता को अनुशासनहीनता या पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में बाहर किया गया, फिर कुछ समय बाद वापस लिया गया और जिम्मेदारी दी गई. इसके बाद दोबारा कार्रवाई हुई.
आकाश के ससुर और पूर्व राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ इसका एक उदाहरण हैं. फरवरी 2025 में उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में BSP से बाहर किया गया. बाद में मायावती ने उनका निष्कासन वापस लिया. उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपनी गलतियों के लिए माफी मांगी और इसके बाद उन्हें फिर संगठन में जिम्मेदारी दी गई.
लेकिन कुछ समय बाद उन्हें दोबारा पार्टी से बाहर कर दिया गया. राष्ट्रीय समन्वयक रणधीर सिंह बेनीवाल के मामले में भी कार्रवाई और उसके बाद फैसले में बदलाव की बात सामने आई. इसी तरह पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जय प्रकाश सिंह का मामला भी BSP के भीतर नेतृत्व संबंधी अस्थिरता को दिखाता है.
2018 में पार्टी से निकाले गए जय प्रकाश सिंह को अक्टूबर 2025 में फिर से BSP में शामिल किया गया. उन्हें केंद्रीय समन्वयक बनाकर कई राज्यों की जिम्मेदारी दी गई. लेकिन अप्रैल 2026 में उन्हें फिर पार्टी से निकाल दिया गया. केंद्रीय समन्वयक धर्मवीर अशोक भी कार्रवाई और वापसी के इस चक्र से गुजर चुके हैं.
संदीप कुमार वर्मा बताते हैं “कैडर आधारित पार्टी में अनुशासन जरूरी है लेकिन जब बार-बार वरिष्ठ नेताओं को हटाने और वापस लेने की घटनाएं होती हैं तो नीचे तक इसका असर जाता है. कार्यकर्ता यह सोचने लगते हैं कि आखिर संगठन में स्थाई तौर पर भरोसा किस पर किया जाए.”
क्या चाहती हैं बसपा सुप्रीमो?
मायावती की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत लंबे समय से उनका केंद्रीकृत नेतृत्व रहा है. BSP का संगठन उनके नेतृत्व में बना, मजबूत हुआ और चुनावी राजनीति में अपनी अलग पहचान कायम की.
दलित समाज का एक बड़ा हिस्सा मायावती को सिर्फ पार्टी अध्यक्ष नहीं, बल्कि आंदोलन के केंद्रीय चेहरे के रूप में देखता रहा है. इसलिए उनके लिए पार्टी की कमान किसी दूसरे नेता के हाथ में धीरे-धीरे सौंपना सामान्य राजनीतिक उत्तराधिकार का मामला नहीं है.
यह उस राजनीतिक मॉडल में बदलाव होगा, जिसकी पूरी संरचना मायावती के इर्द-गिर्द खड़ी हुई है. यही शायद उनकी मौजूदा दुविधा का मूल है. एक तरफ पार्टी को नई पीढ़ी का चेहरा चाहिए. दूसरी तरफ मायावती के लिए यह जरूरी है कि नया चेहरा पार्टी की लाइन से बाहर जाकर अपनी स्वतंत्र राजनीतिक शैली विकसित न करे.
आकाश आनंद ने युवा मतदाताओं के बीच अपनी पहचान बनाने की कोशिश की. उनकी भाषा और भाषण शैली मायावती की पारंपरिक संयमित राजनीतिक शैली से अलग दिखाई दी. यही अंतर आगे चलकर टकराव का कारण बना.
पार्टी के भीतर यह धारणा भी है कि हाल के कुछ भाषणों में आकाश ने मायावती के आधिकारिक संदेश से अलग बातें कहीं. हाथरस और जेवर की सभाओं में उनके द्वारा राहुल गांधी और अखिलेश यादव को 'अंकल' कहे जाने का उदाहरण दिया जा रहा है.
यह बात छोटी लग सकती है लेकिन BSP जैसे संगठन में जहां शीर्ष नेतृत्व का संदेश नियंत्रित और एकरूप रखा जाता है वहां ऐसी शैली पार्टी नेतृत्व को असहज कर सकती है. यही वजह है कि आकाश पर कार्रवाई को केवल अनुशासन का मामला मानना पर्याप्त नहीं होगा. इसके पीछे नेतृत्व शैली का सवाल भी है.
फिलहाल मायावती के सामने BSP को उसका पुराना गौरव लौटाने की चुनौती जरूर है लेकिन उससे भी बड़ी चुनौती ऐसी पार्टी बनाने की है जो उनके व्यक्तिगत नेतृत्व के बिना भी राजनीतिक रूप से खड़ी रह सके. बार-बार वरिष्ठ नेताओं पर कार्रवाई और वापसी से यह संकेत मिलता है कि पार्टी में अनुशासन तो है लेकिन स्थाई नेतृत्व संरचना का सवाल अभी सुलझा नहीं है.