महाराष्ट्र की प्रसिद्ध पैठणी साड़ी के लिए क्यों शुरू हो रहा बारकोड सिस्टम?

पैठणी की असलियत जांचने के लिए महाराष्ट्र सरकार बारकोड सिस्टम शुरू करने जा रही है. इससे खरीदार साड़ी की बुनाई, धागे और बुनकर की जानकारी देख सकेंगे, वहीं पारंपरिक बुनकरों को नकली पैठणी के बाजार से राहत मिलने की उम्मीद है

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पैठणी साड़ी को 2010 में GI टैग मिला था (सांकेतिक तस्वीर)

महाराष्ट्र सरकार मशहूर पैठणी साड़ी के लिए बारकोड सिस्टम शुरू करने जा रही है. इससे ग्राहक असली और नकली पैठणी की पहचान कर सकेंगे और ठगी से बच सकेंगे. इससे पैठणी साड़ी बनाने वाले पारंपरिक बुनकरों को भी मदद मिलेगी.

पैठणी साड़ियां हाथ से बुनी जाती हैं. इनमें सोने और चांदी के धागों से डिजाइन और जरी का काम होता है. छत्रपति संभाजीनगर (पहले औरंगाबाद) की पैठण तहसील और नासिक जिले की येवला तहसील पैठणी साड़ियों के लिए मशहूर हैं.

हथकरघे पर शुद्ध शहतूत के रेशम और जरी से बनने वाली पैठणी साड़ी को 2010 में जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग मिला था. बाजार में पैठणी साड़ी की कीमत ज्यादा होती है लेकिन बुनकरों का कहना है कि दूसरे इलाकों में और पावरलूम पर बनी साड़ियों को भी पैठणी साड़ी बताकर बेचा जाता है.

सेमी-सिल्क साड़ियों को भी असली पैठणी साड़ी के नाम पर बेचा जाता है. कई बार असली जरी की जगह नकली जरी लगा दी जाती है. इससे ग्राहक ठगे जाते हैं, बुनकरों को नुकसान होता है और पैठणी साड़ी की पहचान भी खराब होती है.

महाराष्ट्र के कपड़ा मंत्री संजय सावकारे ने इंडिया टुडे को बताया, "हम असली हथकरघा पैठणी साड़ी के लिए बारकोड सिस्टम शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं." इस बारकोड में साड़ी के कपड़े और इस्तेमाल किए गए धागों की जानकारी, साड़ी बुनने में लगे कुल दिनों की संख्या और बुनकर का नाम दर्ज होगा. बारकोड स्कैन करने पर ये सभी जानकारी मिल जाएगी. सावकारे ने बताया कि इसके लिए सॉफ्टवेयर तैयार कर लिया गया है.

पैठणी साड़ी के बारकोड में बुनकर का नाम भी दर्ज होगा (फाइल फोटो)

राज्य का कपड़ा विभाग हर पैठणी साड़ी की जांच करेगा और उसके बाद ही उस पर बारकोड लगाने की अनुमति देगा. संजय सावकारे के मुताबिक इसके लिए पूरी प्रक्रिया तैयार की जा रही है. बुनकरों को अपनी साड़ी में कोई खास निशान या लोगो बुनने के लिए भी कहा जाएगा ताकि उसे आसानी से असली पैठणी साड़ी के रूप में पहचाना जा सके.

पैठणी साड़ियां कई रंगों में बुनी जाती हैं. इनकी पहचान तिरछे चौकोर डिजाइन वाले बॉर्डर और मोर या तोते के डिजाइन वाले पल्लू से होती है. साड़ी का आगे और पीछे का हिस्सा एक जैसा होता है क्योंकि इसे एक खास तरीके से बुना जाता है. इसमें इस्तेमाल होने वाली जरी, रेशम के धागे पर चांदी की परत चढ़ाकर और फिर उसे सोने से ढककर बनाई जाती है.

कभी-कभी जरी के साथ सूती धागे का भी इस्तेमाल होता है. इसमें पारंपरिक 'असावली', ज्यामितीय आकार वाले फूल और दूसरे डिजाइन भी बुने जाते हैं. पैठणी स्टोल, नैपकिन, बेडशीट, तकिए और कुशन के कवर, पर्स, दरवाजों के पर्दे, दीवार पर लगाने वाली सजावट, ड्रेस मटेरियल, टेबल क्लॉथ और जैकेट भी बनाए जाते हैं.

पैठणी की शुरुआत छत्रपति संभाजीनगर से करीब 60 किलोमीटर दूर पैठण शहर से हुई. उस समय पैठण को प्रतिष्ठान कहा जाता था और यह सातवाहन राजवंश की राजधानी था. सातवाहन राजवंश ने दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईस्वी तक शासन किया था.

लेखक पी.जी. सहस्रबुद्धे के अनुसार, इस राजवंश की शुरुआत राजा सातवाहन ने की थी. हालांकि दूसरे स्रोतों में इसके संस्थापक के रूप में सिमुक या शिशुक का नाम मिलता है. उनके शिलालेख महाराष्ट्री प्राकृत भाषा में हैं, जो मराठी का पुराना रूप था. अपनी किताब 'महाराष्ट्र संस्कृति' में लेखक पी.जी. सहस्रबुद्धे ने सातवाहनों को महाराष्ट्र का पहला राजनीतिक राजवंश बताया है.

सातवाहन काल में पैठण के बंदरगाहों से रोमन साम्राज्य को कपास और रेशम भेजा जाता था. बुनाई का यह काम अभिर, वाकाटक, राष्ट्रकूट, चालुक्य, यादव, मराठा और पेशवा काल तक चलता रहा. 17वीं सदी के आखिर में येवला शहर के संस्थापक रघुजीबाबा पाटील पैठण के अच्छे बुनकर परिवारों को अपने साथ येवला ले गए. इसके बाद येवला भी अपने कपड़ों के लिए मशहूर हो गया.

इतिहासकार आर.एस. मोरवंचीकर की किताब 'प्रतिष्ठान ते पैठण' के मुताबिक, यह इलाका कपास के लिए जाना जाता था. पैठण के बुनकरों ने इसी कपास से बारीक धागे बनाना और उनसे पतले कपड़े बुनना सीखा था. इन धागों से पतले और अच्छे कपड़े बनाए जाते थे.

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