सूखे की वजह से महाराष्ट्र में दूध का संकट, क्या होगा असर?
महाराष्ट्र के 358 में से 265 तालुके सूखा प्रभावित हैं और चारे की कमी से दूध उत्पादन की लागत बढ़ने का खतरा है. इससे आने वाले महीनों में दूध की खुदरा कीमतें भी बढ़ सकती हैं

चारा-पानी की कमी से जूझ रहे पशुपालक (सांकेतिक तस्वीर)
महाराष्ट्र में सूखे और चारे की कमी से डेयरी किसानों की लागत बढ़ने का खतरा है. इसका असर दूध की खुदरा कीमतों पर भी पड़ सकता है. खासकर अगस्त-सितंबर में सामान्य से कम बारिश बारिश होने के कारण राज्य ने अपने 358 तालुकों में से 265 को सूखा प्रभावित घोषित किया है.
मराठवाड़ा और विदर्भ में सूखे के हालात बेहद खराब हैं. ये इलाके लंबे समय से खेती से जुड़ी दिक्कतों के लिए जाने जाते हैं. उत्तरी महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों और पश्चिमी महाराष्ट्र के सोलापुर जैसे जिलों में भी सूखे का असर है.
डेयरी किसानों और दुग्ध सहकारी समितियों का कहना है कि खेती से कम कमाई होने के कारण किसान अपना ध्यान दूध देने वाले पशुओं पर ज्यादा लगाएंगे लेकिन पशु आहार और चारे जैसी चीजों की कीमतें बढ़ने से दूध उत्पादन की लागत बढ़ने की आशंका है. इसका असर दूध की खुदरा कीमतों पर भी पड़ सकता है.
इस क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि चार से पांच गायों वाले डेयरी किसान के लिए एक लीटर दूध के उत्पादन पर करीब 28-30 रुपए खर्च होते हैं. वहीं, चार से पांच भैंस रखने वाले किसान के लिए भैंस के दूध की उत्पादन लागत 40-45 रुपए प्रति लीटर तक पहुंच सकती है. फिलहाल 3.5 यूनिट फैट और 8.5 यूनिट सॉलिड नॉट फैट वाले गाय के दूध के लिए किसानों को करीब 42 रुपए प्रति लीटर मिलते हैं. वहीं, भैंस के दूध (6 यूनिट फैट और 9 यूनिट सॉलिड नॉट फैट) के लिए उन्हें 56 रुपए प्रति लीटर मिलते हैं.
मुंबई में गाय का दूध करीब 60 रुपए प्रति लीटर और भैंस का दूध करीब 78 रुपए प्रति लीटर बिकता है. हालांकि अलग-अलग डेयरी कंपनियों में दूध खरीदने और बेचने की कीमतें अलग-अलग हैं. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के कमिश्नर तुकाराम मुंढे की अगुवाई में मिलावट के खिलाफ कार्रवाई की गई. इसके बाद दूध की कीमतें बढ़ गईं. मई में गाय के दूध की कीमत करीब 36-37 रुपए और भैंस के दूध की 51-52 रुपए प्रति लीटर थी.
किसान नेता और लोकसभा के पूर्व सांसद राजू शेट्टी कहते हैं कि चारे की कमी से दूध उत्पादन घटने की आशंका है. इसका असर खासकर मराठवाड़ा और पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में दिख सकता है. इनमें जत, कवठेमहांकाळ, आटपाडी, मान और खटाव जैसे इलाके शामिल हैं, जहां सूखे का असर ज्यादा है. उन्होंने जोर देकर कहा, "राज्य सरकार को (किसानों के लिए) पीने का पानी और चारा उपलब्ध कराना चाहिए."
उर्जा ब्रांड के नाम से दूध और डेयरी उत्पाद बनाने वाली कंपनी कुटवाल फूड्स प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक और चेयरमैन प्रकाश कुटवाल ने कहा कि सूखे के दौरान किसान अपना ज्यादा ध्यान दूध के कारोबार पर लगाते हैं. वे मूंगफली जैसी खरीफ फसलों के सूख चुके पौधों को भी पशुओं के चारे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.
महाराष्ट्र राज्य दूध व्यवसायिक संघ के सचिव कुटवाल ने चेतावनी दी कि पशुओं के आहार की लागत बढ़ सकती है, जिससे खुदरा कीमतें बढ़ाने की नौबत आ सकती है. उन्होंने बताया कि हाल ही में कर्नाटक कैबिनेट ने कर्नाटक कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर्स फेडरेशन लिमिटेड के नंदिनी दूध की कीमत 8 रुपए प्रति लीटर बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था.
कोल्हापुर के वारणा समूह से जुड़े महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री विनय कोरे सावकर ने कहा, "सूखे के दौरान किसानों के पास दूध देने वाले पशुओं और डेयरी कारोबार पर ध्यान देने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता. ऐसे समय में दूध पर उनकी आर्थिक निर्भरता बढ़ जाती है जिससे दूध उत्पादन में भी बढ़ोतरी देखने को मिलती है" हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि चारे और पशु आहार की आपूर्ति सुनिश्चित करना जरूरी है.
दूध का फ्लश सीजन (पीक सीजन) आमतौर पर नवंबर के आसपास शुरू होता है और मार्च के आखिर या अप्रैल तक चलता है. इस दौरान दूध की आपूर्ति ज्यादा होती है. इस अतिरिक्त दूध का इस्तेमाल मक्खन और स्किम्ड मिल्क पाउडर जैसे उत्पाद बनाने में किया जाता है.
महाराष्ट्र में संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्र को मिलाकर हर दिन करीब 1.7 करोड़ लीटर दूध का उत्पादन होता है. इसमें गाय के दूध की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा है जबकि भैंस के दूध का रोजाना उत्पादन करीब 40 लाख लीटर है.
डेयरी क्षेत्र से जुड़े एक पुराने कारोबारी बताते हैं कि सूखे के कारण चारे की कमी तो होगी ही साथ ही बढ़ती गर्मी का तनाव भी दूध उत्पादन पर असर डालेगा. उनके मुताबिक "गर्मी का असर दूध देने वाले पशुओं के हार्मोन और उनके दूध देने की क्षमता पर पड़ता है. इससे चारे की कीमतें बढ़ेंगी और पशुओं की सेहत पर होने वाला खर्च भी बढ़ेगा. इसके अलावा फरवरी-मार्च में गर्मी का तनाव और पानी की कमी बढ़ने पर दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए उसमें मिलावट भी बढ़ सकती है."
उन्होंने आगे बताया कि दूध की कीमतें बढ़ने से मिठाइयों और दूध से बने पनीर और खोया जैसे उत्पादों के दाम भी बढ़ेंगे. उन्होंने बताया कि पहले से ही दूध से बनी मिठाइयां लगभग उसी कीमत पर बिक रही हैं जिस कीमत पर काजू से बनी मिठाइयां बिकती हैं. यह उस दौर से काफी अलग है, जब दोनों की कीमतों में दोगुना अंतर होता था.
कारोबारी के मुताबिक किसान जहां गाय पालने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं वहीं भारतीय नस्ल की भैंसें गर्मी और गर्म मौसम को सहने के मामले में ज्यादा सक्षम होती हैं.