मध्य प्रदेश के वनकर्मी अब ड्यूटी के दौरान बेझिझक चला सकेंगे बंदूक!
पुलिस और अर्धसैनिक बलों के विपरीत, ड्यूटी के दौरान वनकर्मियों के बंदूक चलाने पर वर्षों से मामले दर्ज होते रहे, जिनमें हत्या के मामले भी शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से अब यह मुद्दा सुलझ गया है

मध्य प्रदेश सरकार ने आखिरकार वन विभाग के कर्मचारियों को ड्यूटी के दौरान बंदूक इस्तेमाल करने पर कानूनी संरक्षण दे दिया है. यह मुद्दा वर्षों से लंबित था.
पिछले महीने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब इस दिशा में कदम उठाया गया है.
7 अगस्त को जारी राज्य सरकार की अधिसूचना में वनरक्षकों, वनपालों, उप वनक्षेत्रपालों, वनक्षेत्रपालों, सहायक वन संरक्षकों, उप वन संरक्षकों, प्रभागीय वन अधिकारियों, वन संरक्षकों और मुख्य वन संरक्षकों तथा टाइगर रिजर्व के क्षेत्र निदेशकों को शामिल किया गया है.
वन विभाग के पास अपने शस्त्र भंडार में पंप-एक्शन 12 बोर बंदूकें, 0.315 बोर राइफलें, 0.32 बोर रिवॉल्वर और 12 बोर की डबल बैरल बंदूकें हैं. 12 बोर की डबल बैरल बंदूकें और 0.315 बोर राइफलें 1980 और 1990 के दशक में खरीदी गई थीं. वहीं, अमेरिकी हथियार ब्रांड मॉसबर्ग की पंप-एक्शन बंदूकें और 0.32 बोर रिवॉल्वर 25-30 साल पहले खरीदे गए थे.
इन हथियारों ने बड़े वन अपराधों को रोकने या कर्मचारियों की जान बचाने के बजाय ज्यादातर विभाग के लिए और मुश्किलें पैदा की हैं. अपराधियों और नियमों का उल्लंघन करने वालों से निपटने के दौरान कई हथियार छीन लिए गए या चोरी हो गए.
वन विभाग ने वर्षों के दौरान बंदूकें तो खरीदीं, लेकिन राज्य सरकार इस बात को लेकर कभी स्पष्ट नहीं थी कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218(2) के तहत पुलिस और अर्धसैनिक बलों को दिए गए संरक्षण की तरह वनकर्मियों को भी संरक्षण दिया जाए या नहीं.
आसान शब्दों में कहें तो यह धारा किसी गोलीबारी में किसी के घायल होने की स्थिति में हथियार चलाने वाले के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई या प्राथमिकी दर्ज करने से पहले गोलीबारी की घटना की मजिस्ट्रेट से जांच का प्रावधान करती है.
इस संरक्षण के अभाव में जब भी वनकर्मी ड्यूटी के दौरान गोली चलाते और किसी को चोट लगती या उसकी मौत हो जाती, तो पुलिस उनके खिलाफ मामला दर्ज कर देती थी. कई बार हत्या का मामला भी दर्ज होता था.
2022 में ऐसा ही हुआ था. विदिशा जिले के लटेरी में वनकर्मियों ने आदिवासियों पर गोली चलाई थी, जिसमें एक युवक की मौत हो गई थी और तीन अन्य घायल हुए थे. इसमें शामिल रेंज अधिकारी के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया था. इसके विरोध में वनपालों ने अपनी बंदूकें रेंज कार्यालय में जमा कर दी थीं और कानून के तहत संरक्षण मिलने की गारंटी तक गश्त करने से इनकार कर दिया था.
अब दिया गया यह संरक्षण आखिर इतने सालों तक क्यों लंबित रहा? इसके विरोध में रहने वालों का कहना है कि वनकर्मियों और पुलिस-अर्धसैनिक बलों के बीच अंतर किया जाना चाहिए. उनके मुताबिक, वन विभाग के कर्मचारी हथियार रखने वाला वर्दीधारी बल नहीं हैं.
एक और बड़ा अंतर यह है कि राज्य पुलिस और अर्धसैनिक बल अत्याधुनिक हथियारों से लैस हैं. इनमें स्वचालित और अर्ध-स्वचालित हथियार भी शामिल हैं, जिनमें प्रतिबंधित बोर कैलिबर के कारतूस इस्तेमाल होते हैं. ब्रिटिश औपनिवेशिक दौर से चली आ रही यह व्यवस्था आज भी जारी है.
इसके तहत पुलिस, सेना और अर्धसैनिक बल ऐसे कैलिबर का इस्तेमाल करते हैं, जो आम तौर पर आम लोगों के लिए लाइसेंसशुदा हथियारों के रूप में उपलब्ध नहीं होते. इनके कारतूस भी आमतौर पर बाजार में उपलब्ध नहीं होते.
मध्य प्रदेश में वन विभाग ने 12 बोर, 0.315 बोर और 0.32 बोर जैसे गैर-प्रतिबंधित कैलिबर के हथियार और कारतूस रखे हैं, जो आम नागरिकों के पास भी उपलब्ध होते हैं. कई लोगों का मानना है कि इससे इन हथियारों के दुरुपयोग की आशंका बढ़ सकती है.
इसके अलावा पुलिस और अर्धसैनिक बलों के पास हथियार और कारतूस जारी करने के लिए लंबे समय से आजमाए हुए नियम हैं, जबकि वन विभाग के पास अभी ऐसी व्यवस्था नहीं है.
उन विभागों में हर कारतूस का हिसाब रखा जाता है और उसे खुले बाजार से बदला नहीं जा सकता क्योंकि वह वहां उपलब्ध नहीं होता. वन विभाग में इस्तेमाल होने वाले कैलिबर के मामले में ऐसा नहीं कहा जा सकता.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अवैध रेत खनन से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए 22 जुलाई को फैसला दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत वन विभाग को बिना देरी के संरक्षण दिया जाए. अवैध रेत खनन की वजह से ही अप्रैल में मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में एक वनरक्षक की हत्या हुई थी.