लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को क्यों बताया जा रहा है भविष्य का हाईवे?

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे में सड़क निर्माण से लेकर निगरानी और टोल वसूली तक कई ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है जो भविष्य के भारतीय हाईवे की दिशा तय कर सकती हैं

Lucknow Kanpur Expressway
63 किलोमीटर लंबा लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे 4200 करोड़ रुपए की लागत से बना है

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में 13 जुलाई को लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उद्घाटन सिर्फ एक नई सड़क के शुरू होने की औपचारिकता नहीं थी. यह भारत में राजमार्ग निर्माण और संचालन के एक नए दौर की शुरुआत का संकेत भी है.

देश में पिछले एक दशक में दर्जनों एक्सप्रेसवे बने हैं, लेकिन 63 किलोमीटर लंबा लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे कई मायनों में अलग है. यह सिर्फ दो बड़े शहरों के बीच यात्रा का समय कम नहीं करेगा, बल्कि सड़क निर्माण, यातायात प्रबंधन, सुरक्षा, निगरानी और टोल वसूली की नई तकनीकों का ऐसा प्रयोग है, जिसे भविष्य के भारतीय एक्सप्रेसवे का मॉडल माना जा रहा है.

करीब 4200 करोड़ रुपए की लागत से साढ़े चार वर्ष में तैयार इस एक्सप्रेसवे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें सड़क निर्माण से लेकर निगरानी और टोल कलेक्शन तक हर स्तर पर आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया है. अमेरिका और जर्मनी के बाद पहली बार भारत में सड़क निर्माण में ऑटोमेटेड इंटेलिजेंस मशीन गाइडेड कंस्ट्रक्शन (AIMGC) तकनीक का प्रयोग किया गया है. इसके साथ ही AI आधारित निगरानी, इमरजेंसी कॉल बॉक्स, बैरियर-लेस टोलिंग और 24 घंटे सक्रिय कंट्रोल रूम इसे देश के सबसे आधुनिक एक्सप्रेसवे में शामिल करते हैं.

AI से बनी सड़क, जहां इंसान से ज्यादा मशीन ने तय की गुणवत्ता

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की सबसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि इसका निर्माण है. एक्सप्रेसवे के लगभग 45 किलोमीटर ग्रीनफील्ड हिस्से का निर्माण पारंपरिक तरीके से नहीं, बल्कि ऑटोमेटेड इंटेलिजेंस मशीन गाइडेड कंस्ट्रक्शन (AIMGC) तकनीक से किया गया है. सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाली मशीनों को जीपीएस और थ्री-डी डिजिटल मॉडल से जोड़ा गया. यानी मशीनें पहले से तैयार डिजिटल डिजाइन के अनुसार खुद तय करती रहीं कि कहां कितनी खुदाई करनी है, कितनी मिट्टी भरनी है और किस स्तर तक सतह को समतल करना है.

इस तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह है कि मानवीय गलती लगभग समाप्त हो जाती है. सड़क की सतह अधिक समतल बनती है, जिससे वाहन कम कंपन के साथ चलते हैं. इसका असर सिर्फ यात्रियों के आराम पर नहीं पड़ता, बल्कि ईंधन की बचत, टायरों की उम्र और सड़क के लंबे समय तक टिकाऊ रहने पर भी दिखाई देता है.

भारत में अब तक सड़क निर्माण मुख्य रूप से सर्वेक्षण और इंजीनियरों के अनुभव पर आधारित रहा है. लेकिन यहां डिजिटल इंजीनियरिंग ने निर्माण प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया. यही कारण है कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण इसे भविष्य के एक्सप्रेसवे निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग मान रहा है.
इसी हाईवे पर यात्रियों को देश के दूसरे सबसे लंबे एलिवेटेड कॉरिडोर पर चलने का अनुभव भी मिलेगा. घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्र से गुजरने वाला छह लेन का यह एलिवेटेड रोड सिंगल पिलर डिजाइन पर बनाया गया है, जो इंजीनियरिंग की दृष्टि से भी इसे अलग पहचान देता है. इससे जमीन का कम उपयोग हुआ और नीचे के यातायात पर भी न्यूनतम असर पड़ा.

सड़क अब खुद बताएगी कहां है खतरा

भारतीय राजमार्गों पर दुर्घटना के बाद अक्सर सूचना मिलने और राहत पहुंचने में देरी होती रही है. लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे इस समस्या को तकनीक के जरिए हल करने की कोशिश करता है. पूरे 63 किलोमीटर लंबे कॉरिडोर पर लगभग 100 आधुनिक कैमरों का नेटवर्क लगाया गया है. इनमें 63 पैन-टिल्ट-ज़ूम (PTZ) कैमरे हैं, जो चारों दिशाओं में घूमकर और जूम करके सड़क तथा उसके किनारों की निगरानी कर सकते हैं. इसके अलावा 21 इंटरचेंज कैमरे प्रवेश और निकास मार्गों पर हर गतिविधि रिकॉर्ड करेंगे. इनमें भी सबसे अहम हैं 16 AI आधारित वीडियो इंसिडेंट डिटेक्शन सिस्टम (VIDS) कैमरे. ये कैमरे केवल वीडियो रिकॉर्ड नहीं करते, बल्कि खुद विश्लेषण भी करते हैं. अगर किसी वाहन का टायर फट जाए, कोई गाड़ी लंबे समय तक खड़ी रहे, धुआं उठे, आग लगे, कोई वाहन गलत दिशा में चले या दुर्घटना हो जाए तो सिस्टम स्वतः अलर्ट जारी कर देता है. यानी कंट्रोल रूम को किसी व्यक्ति के फोन का इंतजार नहीं करना पड़ेगा.

27वें और 35वें किलोमीटर पर दो अत्याधुनिक कंट्रोल रूम बनाए गए हैं. यहां से पूरे एक्सप्रेसवे की चौबीसों घंटे निगरानी होगी. कैमरों से आने वाली लाइव फीड के आधार पर जियो-टैग्ड अलर्ट तैयार होंगे और जरूरत पड़ने पर पेट्रोलिंग टीम, पुलिस, एंबुलेंस या अन्य राहत एजेंसियों को तुरंत रवाना किया जाएगा. उद्घाटन से पहले फेंसिंग को नुकसान पहुंचाने और बिजली के तार काटने की घटनाओं के बाद निगरानी व्यवस्था को और मजबूत किया गया है. अब यही कैमरे सिर्फ ट्रैफिक नहीं, बल्कि बाउंड्री वॉल, फेंसिंग और लैंडस्केपिंग की भी निगरानी करेंगे ताकि चोरी, अतिक्रमण और तोड़फोड़ की घटनाओं पर तुरंत कार्रवाई हो सके. इसका एक बड़ा उद्देश्य आवारा पशुओं को एक्सप्रेसवे पर आने से रोकना भी है, क्योंकि यहां वाहनों की अधिकतम गति 120 किलोमीटर प्रति घंटा होगी.

मुसीबत में एक बटन दबाइए, कंट्रोल रूम तुरंत सुन लेगा आपकी आवाज

भारतीय एक्सप्रेसवे पर अक्सर यह शिकायत रहती है कि दुर्घटना या वाहन खराब होने की स्थिति में मदद मिलने में समय लगता है. लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे इस समस्या का भी समाधान लेकर आया है. ग्रीनफील्ड हिस्से में लगभग हर दो किलोमीटर पर वन इंफ्रा कॉल बॉक्स लगाए गए हैं. यदि किसी वाहन में खराबी आ जाए, दुर्घटना हो जाए या किसी अन्य प्रकार की आपात स्थिति उत्पन्न हो तो चालक केवल एक बटन दबाकर सीधे कंट्रोल रूम से संपर्क कर सकेगा.

पूरी प्रणाली ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क पर आधारित है. कॉल शुरू होते ही बॉक्स पर लाल रंग की लाइट जलेगी और जैसे ही कंट्रोल रूम से संपर्क स्थापित होगा, नीली लाइट जलने लगेगी. बॉक्स में लगे माइक्रोफोन और स्पीकर की सहायता से चालक सीधे अपनी समस्या बता सकेगा. इसके बाद निकटतम पेट्रोलिंग वाहन, क्रेन, एंबुलेंस या तकनीकी सहायता टीम मौके पर भेजी जाएगी.

सुरक्षा को और मजबूत बनाने के लिए एक्सप्रेसवे के दोनों ओर मजबूत लोहे की फेंसिंग लगाई गई है ताकि कोई जानवर या अनधिकृत व्यक्ति मुख्य कैरिजवे तक न पहुंच सके. पूरी सड़क पर लगातार पेट्रोलिंग भी होगी. यात्रियों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए एक्सप्रेसवे पर 10 बेड का ट्रॉमा सेंटर भी विकसित किया जा रहा है. भविष्य में दुर्घटना की स्थिति में प्राथमिक उपचार और गोल्डन ऑवर के भीतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

बिना बैरियर टोल, गाड़ी नहीं रुकेगी, सफर भी नहीं टूटेगा

लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की एक और बड़ी विशेषता इसकी टोल प्रणाली है. यह उत्तर प्रदेश का पहला और देश का तीसरा बैरियर-लेस टोल सिस्टम वाला एक्सप्रेसवे होगा. यहां पारंपरिक टोल प्लाजा की तरह बैरियर नहीं होंगे, जहां वाहनों को रुकना पड़ता है. एंट्री और एग्जिट पर स्थापित मल्टी लेन फ्री फ्लो प्रणाली में वाहन 80 से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बिना रुके गुजर सकेंगे.

यह व्यवस्था दो तकनीकों पर आधारित है. पहली ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR), जिसमें हाईस्पीड कैमरे वाहन की नंबर प्लेट पढ़ते हैं और उसकी श्रेणी की पहचान करते हैं. दूसरी रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन (RFID) तकनीक है, जो वाहन पर लगे फास्टैग को पढ़कर संबंधित बैंक खाते से टोल राशि स्वतः काट लेती है.

इस एक्सप्रेसवे पर बीच रास्ते में कोई टोल प्लाजा नहीं है. केवल प्रवेश और निकास बिंदुओं पर ही टोल की गणना होगी. इससे यात्रा का प्रवाह बना रहेगा, ईंधन की बचत होगी और लंबी कतारों की समस्या लगभग समाप्त हो जाएगी. यानी यह एक्सप्रेसवे केवल तेज रफ्तार सड़क नहीं है, बल्कि डिजिटल मोबिलिटी का एक ऐसा मॉडल है जहां सड़क निर्माण, ट्रैफिक प्रबंधन, सुरक्षा, निगरानी, राहत व्यवस्था और टोल वसूली, सभी को तकनीक से जोड़ा गया है.

उत्तर प्रदेश पिछले कुछ वर्षों में एक्सप्रेसवे नेटवर्क के विस्तार के लिए जाना जाने लगा है. पूर्वांचल, बुंदेलखंड, गंगा और गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे के बाद लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे इस श्रृंखला में इसलिए अलग दिखाई देता है क्योंकि इसकी पहचान सिर्फ लंबाई या गति से नहीं बल्कि इनोवेशन नवाचार से बनती है. यदि यहां अपनाई गई AI आधारित निगरानी, मशीन गाइडेड निर्माण और बैरियर-लेस टोल प्रणाली अपेक्षित परिणाम देती है, तो आने वाले वर्षों में देश के कई नए राजमार्ग इसी मॉडल पर विकसित होते दिखाई दे सकते हैं. यह एक्सप्रेसवे केवल लखनऊ और कानपुर के बीच दूरी कम करने वाला मार्ग नहीं, बल्कि भारत के स्मार्ट हाईवे युग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है.

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