अमेरिकियों को लूटने का अड्डा निकला लखनऊ का कॉल सेंटर!

लखनऊ से चल रहा यह कॉल सेंटर देशभर के युवाओं को जोड़कर अमेरिका में साइबर ठगी कर रहा था और इनके काम करने का तरीका किसी कॉर्पोरेट से कम नहीं था

 साइबर ठगों ने नोएडा के बुजुर्ग से कर डाली 85 लाख की ठगी. (Representative image)
सांकेतिक तस्वीर

लखनऊ में गोमती नगर के विभूतिखंड स्थित समिट बिल्डिंग में दिन के मुकाबले रात ज्यादा जीवंत होती है. कैफे, बार और रेस्तरां की रोशनी, तेज संगीत और देर रात तक आने-जाने वालों की भीड़ इस इमारत को शहर की नाइटलाइफ का अहम केंद्र बनाती है.

लेकिन इसी चहल-पहल के बीच 11वीं मंजिल पर एक ऐसा दफ्तर भी चल रहा था, जहां रात ढलते ही एक अलग तरह की गतिविधि शुरू होती थी. यहां न तो किसी ग्राहक की शिकायत सुनी जाती थी और न ही किसी ई-कॉमर्स कंपनी की सेवा दी जाती थी.

यहां से दुनिया के अलग-अलग देशों में बैठे लोगों को फोन किए जाते थे जिनमें सबसे ज्यादा अमेरिका की गई कॉल थीं. विदेश में रह रहे लोगों को तकनीकी मदद, रिफंड या सुरक्षा के नाम पर करोड़ों रुपए की साइबर ठगी का शिकार बनाया जाता था.

लखनऊ पुलिस की साइबर सेल, साइबर थाना और क्राइम ब्रांच ने 1 जुलाई की तड़के संयुक्त कार्रवाई करते हुए जिस कथित फर्जी इंटरनेशनल कॉल सेंटर का भंडाफोड़ किया, उसने यह संकेत दिया है कि साइबर अपराध अब छोटे स्तर की धोखाधड़ी नहीं, बल्कि कॉरपोरेट ढांचे में चलने वाला संगठित कारोबार बन चुका है. पुलिस ने मौके से 119 लोगों को गिरफ्तार किया. इनमें दो ऑपरेशनल मैनेजर भी शामिल हैं. 100 लैपटॉप, 178 मोबाइल फोन और भारी मात्रा में डिजिटल रिकॉर्ड जब्त किए गए हैं.

पुलिस कार्रवाई के दौरान कॉल सेंटर से बाहर निकलते कर्मचारी

शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह नेटवर्क भारत और विदेश, खासकर अमेरिका के नागरिकों को निशाना बनाता था. इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू इसकी मॉडस ऑपरेंडी है. यह सिर्फ फर्जी कॉल करने वाला गिरोह नहीं था, बल्कि तकनीक, मनोविज्ञान और संगठित प्रबंधन का ऐसा मिश्रण था, जिसने साइबर अपराध को एक उद्योग का रूप दे दिया था.

कर्मचारियों की भर्ती में बरती जाती थी सतर्कता

पुलिस जांच में सामने आया कि कॉल सेंटर में स्थानीय युवक-युवतियों को प्राथमिकता नहीं दी जाती थी. इसके बजाय गुजरात, महाराष्ट्र और असम जैसे राज्यों से युवाओं को ऑनलाइन विज्ञापनों के जरिए नौकरी का प्रस्ताव देकर लखनऊ बुलाया जाता था. इसका मकसद स्थानीय स्तर पर शक की संभावना कम करना था. बाहर से आए कर्मचारी किराये के मकानों में रहते थे और उनका स्थानीय सामाजिक संपर्क लगभग नहीं के बराबर था.

भर्ती के बाद इन लोगों को आकर्षक वेतन दिया जाता था. जहां सामान्य बीपीओ उद्योग में शुरुआती वेतन 15 से 20 हजार रुपए के बीच होता है, जबकि यहां के कर्मचारियों को सीधे 30 से 40 हजार रुपए तक मासिक वेतन और लक्ष्य पूरा करने पर अतिरिक्त इंसेंटिव दिया जाता था. पुलिस का दावा है कि अधिकांश कर्मचारियों को यह जानकारी थी कि वे वैध कस्टमर सपोर्ट नहीं बल्कि साइबर फ्रॉड का हिस्सा हैं, लेकिन अधिक कमाई के लालच में वे इस नेटवर्क से जुड़े रहे.

गिरोह ने कर्मचारियों को अपने नियंत्रण में रखने का तरीका भी बेहद सुनियोजित बनाया था. ऑपरेशनल मैनेजर कथित रूप से सभी कर्मचारियों के मूल शैक्षणिक प्रमाणपत्र और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज अपने पास जमा कर लेते थे. इससे कर्मचारी बीच में नौकरी छोड़कर आसानी से नहीं जा सकते थे. आर्थिक लालच और दस्तावेजों की निर्भरता ने उन्हें संगठन से बांधे रखा.

कैसी चलती थी ठगी

यह पूरा नेटवर्क पारंपरिक मोबाइल कॉल के बजाय वर्चुअल कॉलिंग या वीओआईपी (Voice over Internet Protocol) तकनीक का इस्तेमाल करता था. इंटरनेट आधारित इस तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि कॉल का वास्तविक स्रोत छिप जाता है. अमेरिका में बैठे व्यक्ति के मोबाइल पर भारत से की गई कॉल भी स्थानीय अमेरिकी नंबर या टोल-फ्री नंबर जैसी दिखाई देती थी. पीड़ित को यह एहसास ही नहीं होता था कि कॉल हजारों किलोमीटर दूर भारत के किसी कार्यालय से की जा रही है.

पहला संपर्क स्थापित होते ही कॉलर खुद को किसी प्रतिष्ठित ई-कॉमर्स कंपनी, ऑनलाइन वॉलेट सेवा या तकनीकी सहायता विभाग का अधिकारी बताता था. बातचीत पूरी तरह प्रशिक्षित स्क्रिप्ट के आधार पर होती थी. कॉलर का उद्देश्य शुरुआत में विश्वास पैदा करना होता था. इसके लिए ग्राहक का नाम, ईमेल या लेन-देन जैसी कुछ सामान्य जानकारियों का इस्तेमाल किया जाता था, जिससे सामने वाले को बातचीत वास्तविक लगे.

विश्वास बनने के बाद दूसरे चरण में डर पैदा किया जाता था; पीड़ित से कहा जाता था कि उसके डिजिटल वॉलेट में सुरक्षा संबंधी समस्या आ गई है, किसी ने उसके खाते तक पहुंचने की कोशिश की है, कोई रिफंड लंबित है या उसका अकाउंट ब्लॉक होने वाला है. साइबर अपराधियों को अच्छी तरह पता है कि लोग अपने पैसे और डिजिटल पहचान को लेकर सबसे अधिक संवेदनशील होते हैं. इसी मनोवैज्ञानिक कमजोरी का फायदा उठाया जाता था. इसके बाद पीड़ित को तथाकथित समाधान बताया जाता था. उसे 'डॉलर ऐप' जैसे डिजिटल वॉलेट या अन्य एप्लिकेशन डाउनलोड करने के लिए कहा जाता था.

कई मामलों में रिमोट एक्सेस टूल इंस्टॉल कराया जाता था ताकि कॉलर दूर बैठकर पीड़ित के मोबाइल या कंप्यूटर तक पहुंच बना सके. जैसे ही पीड़ित निर्देशों का पालन करता, उसके डिवाइस पर अपराधियों का नियंत्रण स्थापित हो जाता था.

जांच में सामने आया है कि कथित ठग विशेष रूप से अमेरिका के नागरिकों को निशाना बनाते थे. हर कॉलर को प्रतिदिन एक निश्चित लक्ष्य दिया जाता था. जितने अधिक लोगों को ठगा जाता, उतना अधिक इंसेंटिव मिलता था. यानी यहां काम करने वाले कर्मचारी किसी सामान्य ग्राहक सेवा प्रतिनिधि की तरह नहीं बल्कि बिक्री एजेंट की तरह प्रदर्शन के आधार पर आंके जाते थे.

इस पूरे नेटवर्क में तकनीकी उपकरणों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण थी. पुलिस ने मौके से 100 लैपटॉप और 178 मोबाइल फोन जब्त किए हैं. इतनी बड़ी संख्या में डिवाइस यह संकेत देती है कि यहां एक साथ बड़ी संख्या में कॉलर सक्रिय रहते थे. प्रत्येक सिस्टम में अलग-अलग डिजिटल पहचान, कॉलिंग अकाउंट, स्क्रिप्ट और संभावित पीड़ितों का डेटा मौजूद होने की आशंका है. अब फोरेंसिक जांच के जरिए कॉल रिकॉर्ड, चैट लॉग, ईमेल, आईपी लॉग, वित्तीय लेन-देन और अन्य डिजिटल फुटप्रिंट का विश्लेषण किया जा रहा है.लखनऊ में तैनात एक पुलिस अधिकारी बताते हैं, “जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह पता लगाना है कि इस नेटवर्क से कुल कितने लोग प्रभावित हुए, ठगी की रकम कितनी है और पैसा किन खातों या डिजिटल वॉलेट के जरिए आगे भेजा गया. साइबर अपराध में धन का प्रवाह अक्सर कई देशों और कई डिजिटल प्लेटफॉर्म से होकर गुजरता है, जिससे अंतिम लाभार्थी तक पहुंचना कठिन हो जाता है.”

इस मामले ने यह भी उजागर किया है कि आधुनिक साइबर अपराध केवल तकनीक का खेल नहीं है, बल्कि यह मानव व्यवहार को समझकर उसे नियंत्रित करने की कला भी बन चुका है. अपराधी जानते हैं कि यदि किसी व्यक्ति को यह विश्वास दिला दिया जाए कि उसका पैसा खतरे में है या उसे तुरंत कोई कार्रवाई करनी होगी, तो वह बिना ज्यादा सोच-विचार के निर्देशों का पालन कर सकता है.

यही वजह है कि रिफंड स्कैम, टेक्निकल सपोर्ट फ्रॉड और डिजिटल वॉलेट सुरक्षा जैसे बहाने दुनिया भर में सबसे तेजी से बढ़ने वाले साइबर अपराधों में शामिल हैं. साइबर तकनीक विशेषज्ञ आलोक श्रीवास्तव बताते हैं, “ऐसे गिरोहों के लिए भारत आकर्षक केंद्र इसलिए भी बन गया है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में अंग्रेजी बोलने वाले प्रशिक्षित युवा उपलब्ध हैं, इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों की पहुंच आसान है और आउटसोर्सिंग उद्योग के कारण कॉल सेंटर संस्कृति पहले से विकसित है. यही वैध उद्योग अब कुछ मामलों में अपराधियों के लिए भी मॉडल बनता दिखाई दे रहा है.”

लखनऊ में पकड़ा गया यह नेटवर्क इसी प्रवृत्ति का उदाहरण माना जा रहा है. यहां भर्ती, प्रशिक्षण, लक्ष्य निर्धारण, वेतन, इंसेंटिव, शिफ्ट, तकनीकी सहायता और ऑपरेशनल मैनेजमेंट, सब कुछ किसी वैध कंपनी की तरह व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जा रहा था. फर्क सिर्फ इतना था कि ग्राहक सेवा की जगह लक्ष्य साइबर ठगी था.

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