ललिता हत्याकांड के बाद पश्चिमी यूपी की दलित राजनीति कैसे बदल रही?

ललिता गौतम हत्याकांड के बहाने पश्चिमी यूपी में दलित वोट को लेकर राजनीतिक सक्रियता बढ़ गई है. विपक्ष और BJP दोनों 2027 से पहले अपने-अपने सामाजिक और चुनावी समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं

Heated exchange between police and Chandrashekhar Azad (Photo: ITG)
ललिता हत्याकांड के बाद मेरठ आए चंद्रशेखर आजाद की पुलिस के साथ तीखी बहस हुई

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति एक बार फिर चुनावी विमर्श के केंद्र में है. मेरठ की 20 वर्षीय बीए अंतिम वर्ष की छात्रा ललिता गौतम की हत्या केवल एक आपराधिक घटना तक सीमित नहीं रही. कुछ ही हफ्तों में यह कानून-व्यवस्था, पुलिस की कार्यप्रणाली और दलित सम्मान के सवाल से जुड़कर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई. 

समाजवादी पार्टी, आजाद समाज पार्टी और कांग्रेस इसे दलित उत्पीड़न और BJP सरकार की कथित संवेदनहीनता के प्रतीक के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं जबकि BJP इसे एक आपराधिक घटना बताते हुए विपक्ष पर सामाजिक तनाव भड़काने और राजनीतिक फायदा उठाने का आरोप लगा रही है.

15 मई 2026 को मेरठ के रोहटा थाना क्षेत्र के उकसिया गांव की रहने वाली ललिता गौतम परीक्षा देने के लिए घर से निकली थीं लेकिन वापस नहीं लौटीं. अगले दिन उनका शव गन्ने के खेत में मिला. पुलिस ने मुख्य आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेजा हालांकि बाद में उसे जमानत मिल गई. यहीं से पीड़ित परिवार और दलित संगठनों का आरोप शुरू हुआ कि हत्या में शामिल अन्य आरोपियों को बचाया जा रहा है और जांच निष्पक्ष नहीं है. 

करीब दो महीने तक न्याय की मांग को लेकर आंदोलन चलता रहा. 8 जुलाई को मेरठ कलेक्ट्रेट पर बड़ी संख्या में दलित संगठनों और स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि जिलाधिकारी वी.के. सिंह और एसएसपी अविनाश पांडे खुद आकर उनका ज्ञापन लें. प्रशासन द्वारा प्रदर्शन स्थल बदलने के प्रस्ताव को प्रदर्शनकारियों ने अस्वीकार कर दिया. इसके बाद पुलिस ने प्रदर्शन हटाने का प्रयास किया और स्थिति हिंसक हो गई. पुलिस ने लाठीचार्ज किया तथा पांच प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया.

मामले ने तब नया मोड़ लिया जब एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें मेरठ के एसएसपी अविनाश पांडे पुलिस वाहन के भीतर हिरासत में लिए गए रवि गौतम को थप्पड़ मारते दिखाई दिए. इसके तुरंत बाद रवि गौतम का पुलिस वाहन में ही फंदा लगाकर आत्महत्या का प्रयास करने का वीडियो भी सामने आया. इन दोनों घटनाओं ने पूरे प्रकरण को कानून-व्यवस्था से निकालकर राजनीतिक बहस के केंद्र में पहुंचा दिया.

एसएसपी अविनाश पांडे ने पुलिस कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि मुख्य आरोपी पहले ही गिरफ्तार होकर जेल जा चुका था. उनके अनुसार जमानत मिलने के बाद बाहरी लोग पीड़ित परिवार को धन और हथियार लाइसेंस जैसे प्रलोभन देकर आंदोलन भड़काने का प्रयास कर रहे थे. उन्होंने दावा किया कि गिरफ्तार रवि गौतम नोएडा का रहने वाला है और उसके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. उन्होंने चेतावनी दी कि घटना को राजनीतिक या सांप्रदायिक रंग देने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी. दूसरी ओर प्रदर्शनकारियों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए पुलिस पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन को बलपूर्वक कुचलने का आरोप लगाया.

दलित वोट बैंक पर नजर, विपक्ष की साझा सक्रियता

पश्च‍िमी उत्तर प्रदेश में 14 लोकसभा और 70 विधानसभा सीटें हैं. बुलंदशहर और नगीना लोकसभा सीट आरक्ष‍ित हैं. एक राजनीतिक अनुमान के मुताबिक पश्च‍िमी यूपी में 26 प्रतिशत दलित हैं. मेरठ की घटना के बाद विपक्षी दलों ने जिस तेजी से राजनीतिक सक्रियता दिखाई, उसने स्पष्ट कर दिया कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित समाज को लेकर नई राजनीतिक प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है. सबसे पहले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर BJP सरकार और पुलिस कार्रवाई की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि BJP शासन में पुलिस अन्याय के सभी रिकॉर्ड तोड़ रही है. 

10 जुलाई को आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद मेरठ पहुंचे. उनके दौरे से पहले प्रशासन ने गांव और आसपास के क्षेत्रों में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया था. चंद्रशेखर ने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर हत्या में शामिल सभी आरोपियों की गिरफ्तारी, निष्पक्ष जांच और परिवार को सुरक्षा देने की मांग की. उन्होंने इस मामले को केवल हत्या नहीं बल्कि दलित सम्मान और न्याय का प्रश्न बताया. 

राजनीतिक विश्लेषक और मेरठ विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर विवेक नौटियाल का मानना है कि बहुजन समाज पार्टी (BSP) के कमजोर पड़ने के बाद दलित राजनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका स्थापित करने के लिए चंद्रशेखर इस तरह के मुद्दों को पूरी ताकत से उठा रहे हैं.

इसके अगले दिन 11 जुलाई को समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दिल्ली में पीड़ित परिवार से मुलाकात की. परिवार सपा सांसद इकरा हसन के साथ उनसे मिलने पहुंचा था. अखिलेश ने परिवार को दो लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी और न्याय मिलने तक साथ खड़े रहने का भरोसा दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि हत्या के आरोपियों पर अपेक्षाकृत कमजोर धाराएं लगाई गईं जबकि न्याय मांगने वाले प्रदर्शनकारियों पर गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए. उन्होंने इसे ‘नाइंसाफी की पराकाष्ठा’ बताते हुए BJP सरकार पर दलितों के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाने का आरोप लगाया. 

कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को आक्रामक ढंग से उठाया. प्रदेश कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम मेरठ जाने निकले लेकिन पुलिस ने उन्हें दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे के काशी टोल प्लाजा पर रोक दिया. प्रशासन ने कहा कि पीड़ित परिवार उस समय प्रयागराज में है और उनके गांव जाने से कानून-व्यवस्था प्रभावित हो सकती है. इसके बाद राजेंद्र पाल गौतम ने आरोप लगाया कि BJP कांग्रेस से डरती है और इसलिए उन्हें पीड़ित परिवार से मिलने नहीं दिया गया. उन्होंने एसएसपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने, एक करोड़ रुपये के मुआवजे, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी तथा फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई की मांग उठाई. 

सपा विधायक अतुल प्रधान ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग को पत्र लिखकर पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की. कांग्रेस ने सांसदों और विधायकों का प्रतिनिधिमंडल मेरठ भेजा. BSP प्रमुख मायावती ने भी सरकार पर सवाल उठाए. इस प्रकार पहली बार लंबे समय बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लगभग पूरा विपक्ष एक दलित मुद्दे पर एक स्वर में दिखाई दिया.

BJP का काउंटर प्लान : कानून-व्यवस्था, विकास और दलित कल्याण का संतुलन

BJP इस पूरे घटनाक्रम को केवल कानून-व्यवस्था का विषय बताकर विपक्ष के राजनीतिक आरोपों को निष्प्रभावी करने की रणनीति पर काम कर रही है. सरकार का तर्क है कि हत्या के मुख्य आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था और जांच जारी है. प्रशासन का कहना है कि कुछ बाहरी तत्व मामले को राजनीतिक रंग देकर सामाजिक तनाव पैदा करने का प्रयास कर रहे हैं. 

BJP की बड़ी चिंता यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता अब पहले की तरह एकतरफा किसी एक दल के साथ नहीं हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान बदलने और आरक्षण समाप्त होने के विपक्षी अभियान का असर कई सीटों पर देखने को मिला था. यही कारण है कि पार्टी इस बार केवल राजनीतिक जवाब नहीं बल्कि सामाजिक और संगठनात्मक रणनीति पर भी काम कर रही है. 

BJP का पहला फोकस कानून-व्यवस्था की सख्त छवि बनाए रखना है ताकि यह संदेश जाए कि अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई होगी लेकिन हिंसक प्रदर्शन स्वीकार नहीं किए जाएंगे. दूसरा फोकस दलित कल्याण योजनाओं और लाभार्थी वर्ग को लगातार सक्रिय बनाए रखना है. प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, पीएम स्वनिधि, छात्रवृत्ति और मुख्यमंत्री आवास जैसी योजनाओं के लाभार्थियों के बीच BJP लगातार संवाद बढ़ा रही है. 

सत्ताधारी पार्टी यह भी कोशिश कर रही है कि संगठनात्मक स्तर पर दलित समाज के प्रभावशाली स्थानीय नेताओं और सामाजिक संगठनों के साथ संपर्क मजबूत करना है. BJP मानती है कि BSP के कमजोर होने के बाद दलित राजनीति का नया नेतृत्व आकार ले रहा है और अगर विपक्ष इस सामाजिक असंतोष को व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलने में सफल हो गया तो 2027 के विधानसभा चुनाव में चुनौती बढ़ सकती है. इसी कारण पार्टी दलित बहुल क्षेत्रों में जनसंपर्क कार्यक्रम, सामाजिक समरसता अभियान और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर से जुड़े आयोजनों पर विशेष जोर दे रही है. BJP यह भी कोशिश कर रही है कि विपक्ष द्वारा बनाए जा रहे ‘दलित बनाम BJP’ के नैरेटिव को विकास, कानून-व्यवस्था और कल्याणकारी योजनाओं की राजनीति से संतुलित किया जाए.

2027 की तैयारी में दलित नैरेटिव की नई लड़ाई

राजनीतिक विश्लेषक अजय कुमार का मानना है कि ललिता गौतम हत्याकांड अकेला मामला नहीं है. इससे पहले इसी वर्ष जनवरी में मेरठ के कपसाड़ गांव की घटना को लेकर भी विपक्ष ने दलित उत्पीड़न का मुद्दा उठाया था. उससे पहले 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान और आरक्षण को लेकर व्यापक राजनीतिक अभियान चलाया गया था. 2018 के SC-ST एक्ट आंदोलन की स्मृतियां भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अभी पूरी तरह धुंधली नहीं हुई हैं. इसी पृष्ठभूमि में विपक्ष अब ऐसी घटनाओं को जोड़कर यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि BJP शासन में दलित समुदाय सुरक्षित नहीं है. 

समाजवादी पार्टी इसे अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण से जोड़ रही है. चंद्रशेखर आजाद इसे दलित स्वाभिमान की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं. कांग्रेस सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों के मुद्दे के साथ अपनी खोई हुई जमीन तलाश रही है. तीनों दलों की रणनीति अलग-अलग है लेकिन लक्ष्य समान है, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलित मतदाताओं में BJP के खिलाफ राजनीतिक माहौल तैयार करना. 

दूसरी ओर BJP का आकलन है कि केवल भावनात्मक मुद्दों से चुनाव नहीं जीते जाते. पार्टी लाभार्थी वर्ग, कानून-व्यवस्था, बुनियादी ढांचे के विकास और सामाजिक योजनाओं के सहारे अपना जनाधार बनाए रखने की कोशिश करेगी. पार्टी यह भी मानती है कि अगर हत्या जैसे मामलों में त्वरित कार्रवाई और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की गई तो विपक्ष के आरोपों की धार कमजोर पड़ सकती है.

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