राम मंदिर ट्रस्ट में कृष्ण मोहन की ताजपोशी डैमेज कंट्रोल या 2027 की रणनीति?

चंपत राय के बाद पूर्व आईएफएस अधिकारी और दलित चेहरे कृष्ण मोहन को राम मंदिर ट्रस्ट की अंतरिम कमान मिली

Krishna Mohan Ram Mandir
फरवरी, 2025 में कृष्ण मोहन को राम मंदिर ट्रस्ट का सदस्य बनाया गया था

अयोध्या में छह जुलाई को हुई श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक सामान्य प्रशासनिक बैठक नहीं थी. लगभग तीन घंटे तक चली इस बैठक पर पूरे देश की नजर थी क्योंकि यह ऐसे समय हो रही थी जब राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और व्यवस्थाओं को लेकर ट्रस्ट लगातार सवालों के घेरे में था.

बैठक में सबसे बड़ा फैसला महासचिव चंपत राय और वरिष्ठ ट्रस्टी अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार करने का रहा. इसके साथ ही ट्रस्ट ने पूर्व भारतीय वन सेवा (आईएफएस) अधिकारी और ट्रस्ट सदस्य 73 वर्षीय कृष्ण मोहन को अंतरिम महासचिव नियुक्त कर दिया.

यह नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक रिक्ति भरने तक सीमित नहीं मानी जा रही. ट्रस्ट ने ऐसे व्यक्ति को जिम्मेदारी सौंपी है जो हाल के दिनों में चढ़ावा चोरी प्रकरण में सबसे पहले सक्रिय भूमिका निभाते दिखाई दिए. 25 जून को इसी मामले में मुकदमा दर्ज कराने वाले कृष्ण मोहन अब उसी ट्रस्ट के प्रशासनिक प्रमुख की भूमिका में हैं, जिस पर व्यवस्थागत सवाल उठ रहे हैं. ऐसे में उनके सामने पहली चुनौती ट्रस्ट की प्रशासनिक साख को बहाल करने और श्रद्धालुओं का विश्वास मजबूत करने की होगी.

ट्रस्ट के भीतर यह भी माना जा रहा है कि कृष्ण मोहन के लंबे प्रशासनिक अनुभव, संगठनात्मक पृष्ठभूमि और अपेक्षाकृत साफ-सुथरी सार्वजनिक छवि के कारण उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई. खास बात यह भी है कि फरवरी 2025 में कामेश्वर चौपाल के निधन के बाद उन्हें ट्रस्ट का सदस्य बनाया गया था और महज कुछ महीनों के भीतर वे ट्रस्ट के सबसे प्रभावशाली पद तक पहुंच गए.

आईएफएस अधिकारी से संघ के शीर्ष पद तक का सफर

कृष्ण मोहन का जीवन सरकारी सेवा, वैज्ञानिक पृष्ठभूमि और सामाजिक संगठन, तीनों का अनूठा मिश्रण है. सितंबर 1952 में जन्मे कृष्ण मोहन मूल रूप से हरदोई जिले के शाहाबाद क्षेत्र के सिकंदरपुर बाजार के निवासी हैं. उनके पिता भारतीय रेलवे में अधिकारी थे. प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से एमएससी (गणित) की पढ़ाई की.

इसके बाद लगभग पांच वर्षों तक परमाणु ऊर्जा विभाग में वैज्ञानिक के रूप में कार्य किया. बाद में उनका चयन भारतीय वन सेवा में हुआ और उन्हें महाराष्ट्र कैडर मिला. वन सेवा में उन्होंने तीन दशक से अधिक समय तक विभिन्न प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं और वर्ष 2012 में अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए. यही प्रशासनिक अनुभव आज ट्रस्ट के लिए उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है.

राम मंदिर जैसा विशाल धार्मिक परिसर, करोड़ों श्रद्धालुओं का प्रबंधन, सैकड़ों कर्मचारियों का संचालन और हजारों करोड़ रुपए की परिसंपत्तियों का संरक्षण किसी बड़े प्रशासनिक ढांचे से कम नहीं है. ऐसे में एक अनुभवी नौकरशाह का ट्रस्ट की कमान संभालना स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

हालांकि कृष्ण मोहन स्वयं स्वीकार करते हैं कि राम मंदिर आंदोलन से उनका प्रत्यक्ष जुड़ाव कभी नहीं रहा. महाराष्ट्र में रहते हुए प्रखर आंबेडकरवादी आंदोलन का प्रभाव उन पर रहा लेकिन लौट कर हरदोई आने के बाद समाज सेवा के लिए उनके भाव में विचारधारा का कोई स्थान नहीं था और इस नाते वर्ष 2015-16 में संघ के आयाम 'सेवा भारती' में वे जिला प्रमुख (शिक्षा आयाम) बने. फिर नगर संघचालक, उसके बाद जिला संघचालक और फिर झट से 2020 में अवध प्रांत के प्रांत संघचालक बने और अत्यंत तेज गति से बढ़ते हुए वर्ष 2023 में उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश क्षेत्र का क्षेत्र संघचालक बनाया गया, जिस पद पर वे आज भी हैं.

संघ में इतनी तेज गति से शीर्ष जिम्मेदारियों तक पहुंचना अपने आप में उल्लेखनीय माना जाता है. राम मंदिर में 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान कृष्ण मोहन यजमान की भूमिका में भी रहे थे. बाद में राम दरबार और मंदिर परिसर के अन्य सात मंदिरों की प्राण प्रतिष्ठा में भी उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई. इससे स्पष्ट था कि ट्रस्ट और संघ नेतृत्व पहले से ही उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के लिए तैयार कर रहा था.

'सबके राम' का संदेश या सामाजिक समीकरण?

कृष्ण मोहन की नियुक्ति का सबसे अधिक चर्चा में रहने वाला पहलू उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि है. वे दलित समाज से आते हैं. इससे पहले ट्रस्ट में इसी सामाजिक प्रतिनिधित्व का चेहरा कामेश्वर चौपाल थे, जिन्हें राम मंदिर आंदोलन में पहली शिला रखने का गौरव प्राप्त था. उनके निधन के बाद कृष्ण मोहन को ट्रस्ट में शामिल किया गया और अब उन्हें अंतरिम महासचिव बना दिया गया.

यहीं से इस नियुक्ति के राजनीतिक और सामाजिक अर्थ निकाले जाने लगे हैं. अयोध्या में साकेत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य वी. एन. अरोड़ा बताते हैं, “संघ और विश्व हिंदू परिषद लंबे समय से राम मंदिर आंदोलन को केवल धार्मिक आंदोलन नहीं बल्कि सामाजिक समरसता के अभियान के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं. भगवान राम के जीवन में शबरी, निषादराज, वाल्मीकि, सुग्रीव, नल-नील जैसे पात्रों का उल्लेख करते हुए यह तर्क दिया जाता है कि राम का संदेश समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने का था. कृष्ण मोहन की नियुक्ति को भी उसी विचार के विस्तार के रूप में देखा जा रहा है.”

राजनीतिक और सामाजिक मामलों के जानकारों का कहना है कि कृष्ण मोहन की व्यक्तिगत आस्था और वैचारिक पृष्ठभूमि को लेकर लंबे समय से अलग-अलग तरह की चर्चाएं होती रही हैं. उनके करीबी लोगों के अनुसार वे पारंपरिक कर्मकांड और आडंबरपूर्ण पूजा-पाठ से दूरी बनाकर रखते हैं तथा गौतम बुद्ध के विचारों से प्रभावित रहे हैं. हालांकि सार्वजनिक जीवन में उन्होंने हमेशा राम मंदिर ट्रस्ट की जिम्मेदारियों और भगवान राम के प्रति अपनी आस्था व समर्पण की ही बात कही है.

राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक मानते हैं कि ट्रस्ट का यह फैसला केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि प्रतीकात्मक भी है. इससे यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि राम मंदिर किसी एक वर्ग का नहीं बल्कि पूरे समाज का केंद्र है. ट्रस्ट के भीतर दलित समाज से आने वाले व्यक्ति को सबसे प्रभावशाली प्रशासनिक जिम्मेदारी देकर सामाजिक प्रतिनिधित्व का संदेश मजबूत करने का प्रयास किया गया है;

कृष्ण मोहन का चयन ऐसे समय हुआ है जब बीजेपी और संघ परिवार लगातार सामाजिक विस्तार की रणनीति पर काम कर रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में अनुसूचित जाति, पिछड़े वर्ग और वंचित समाज के बीच संगठन की पहुंच बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया है. इसके अलावा वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या को समाहित करने वाली फैजाबाद लोकसभा सामान्य सीट पर समाजवादी पार्टी के दलित उम्मीदवार अवधेश पासी की जीत ने संघ और बीजेपी की सामाजिक समरसता की नीति को आइना दिखा दिया था. ऐसे में वर्ष 2027 में यूपी विधानसभा चुनाव से पहले राम मंदिर जैसे राष्ट्रीय महत्व के संस्थान में दलित चेहरे को सबसे प्रमुख प्रशासनिक जिम्मेदारी देना इस व्यापक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है. माना जा रहा है कि बाद में कृष्ण मोहन को ट्रस्ट का स्थाई महासचिव भी बनाया जा सकता है.

क्या यह डैमेज कंट्रोल भी है और 2027 की तैयारी भी?

कृष्ण मोहन की नियुक्ति का समय भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. यह फैसला उस समय आया है जब राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी, सुरक्षा व्यवस्था और ट्रस्ट के प्रशासनिक ढांचे को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं. विपक्ष भी इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उठाने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में ट्रस्ट को एक नए चेहरे और नई कार्यशैली की आवश्यकता महसूस हो रही थी. चंपत राय पिछले कई वर्षों से ट्रस्ट का सबसे प्रमुख चेहरा रहे. राम मंदिर निर्माण से लेकर धन संग्रह और प्रशासनिक निर्णयों तक उनकी केंद्रीय भूमिका रही. लेकिन हाल के विवादों के बाद नेतृत्व परिवर्तन अपरिहार्य माना जा रहा था. कृष्ण मोहन इस बदलाव का अपेक्षाकृत निष्पक्ष और प्रशासनिक चेहरा बनकर उभरे हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को देखते हुए भी यह फैसला महत्वपूर्ण हो सकता है. बीजेपी पिछले कुछ वर्षों से दलित समाज में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. दूसरी ओर विपक्ष भी अपने परंपरागत सामाजिक आधार में दलितों को जोड़ने की कोशि‍श कर रहा है. ऐसे में राम मंदिर ट्रस्ट जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में दलित चेहरे को शीर्ष जिम्मेदारी देना केवल धार्मिक निर्णय नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदेश भी माना जाएगा.

यह भी चर्चा है कि बौद्ध चिंतन से प्रभावित रहे कृष्ण मोहन का संघ के शीर्ष दायित्वों तक पहुंचना संघ की व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता का उदाहरण प्रस्तुत करता है. हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है और स्वयं कृष्ण मोहन सार्वजनिक रूप से भगवान राम के प्रति अपनी आस्था तथा ट्रस्ट के प्रति पूर्ण निष्ठा व्यक्त कर चुके हैं.

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने केवल महासचिव नहीं बदला है बल्कि अपने सार्वजनिक संदेश का स्वर भी बदला है. कृष्ण मोहन के सामने अब दोहरी चुनौती है. पहली, राम मंदिर ट्रस्ट की प्रशासनिक विश्वसनीयता को मजबूत करना और चढ़ावा विवाद जैसे मामलों पर पारदर्शिता स्थापित करना. दूसरी, उस सामाजिक समरसता के संदेश को व्यवहार में उतारना, जिसे उनके चयन के साथ जोड़ा जा रहा है.

Read more!