यूपी के मेडिकल संस्थानों में भर्ती परीक्षाओं का सिस्टम बार-बार क्यों हो रहा फेल?

KGMU और SGPGI की भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप, निजी एजेंसियों की भूमिका और प्रशासनिक लापरवाही ने चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर खड़े किए सवाल

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SGPGI की दो परीक्षाओं में करीब 8500 अभ्यर्थियों को शामिल होना था (सांकेतिक तस्वीर)

लखनऊ के गोमतीनगर में छोटा भरवारा के तीन परीक्षा केंद्रों के बाहर 1 नवंबर की सुबह से ही अभ्यर्थियों की भीड़ जुटने लगी थी. कोई राजस्थान से आया था तो कोई पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों से. संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (SGPGI) की नर्सिंग ऑफिसर और हॉस्पिटल अटेंडेंट ग्रेड-2 भर्ती परीक्षा में शामिल होने के लिए अभ्यर्थी सुबह आठ बजे से पहले ही केंद्रों पर पहुंच गए थे. 

पहली पाली की परीक्षा सुबह 9:30 बजे से शुरू होनी थी. प्रवेश के लिए बायोमीट्रिक सत्यापन की प्रक्रिया चल रही थी लेकिन अचानक सर्वर में खराबी का हवाला देकर इसे रोक दिया गया. सैकड़ों अभ्यर्थी केंद्रों के बाहर इंतजार करते रहे और परीक्षा शुरू होने का समय निकल गया. 

इस बीच दूसरे केंद्रों पर परीक्षा शुरू होने की खबर से अभ्यर्थियों का गुस्सा बढ़ने लगा. उन्होंने परीक्षा में अनियमितता, कुछ अभ्यर्थियों को पहले प्रवेश देने और पेपर लीक की आशंका जताते हुए हंगामा शुरू कर दिया. काफी देर तक चले विरोध के बाद संस्थान प्रशासन ने पहले हॉस्पिटल अटेंडेंट और फिर नर्सिंग ऑफिसर की दोनों पालियों की परीक्षा निरस्त करने का फैसला किया. इनमें करीब 8,100 से 8,500 अभ्यर्थियों को शामिल होना था. हजारों अभ्यर्थियों की तैयारी, यात्रा और ठहरने पर हुआ खर्च एक झटके में बेकार हो गया.

SGPGI की यह परीक्षा सिर्फ तकनीकी खराबी या परीक्षा केंद्रों पर अव्यवस्था का मामला नहीं रह गई है. स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) के सूत्रों के मुताबिक, परीक्षा कराने वाली कंपनी से जुड़े कुछ लोगों ने अभ्यर्थियों को पास कराने का ठेका लिया था. इसके लिए उनसे मोटी रकम भी वसूली गई. परीक्षा केंद्रों पर सख्ती बढ़ने के बाद साजिशकर्ताओं ने कथित तौर पर सर्वर के जरिये बायोमीट्रिक सत्यापन बाधित कराया ताकि परीक्षा की प्रक्रिया प्रभावित हो सके. 

सूत्रों के मुताबिक परीक्षा कराने वाली एजेंसी ने कुछ अभ्यर्थियों को पास कराने के लिए पैसा लिया था (सांकेतिक तस्वीर)

जांच एजेंसी इस आशंका की पड़ताल कर रही है. इस प्रकरण ने एक बार फिर प्रदेश के दो बड़े चिकित्सा संस्थानों SGPGI और किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (KGMU) की भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. KGMU की वर्ष 2023 की नर्सिंग ऑफिसर भर्ती और अब SGPGI की हॉस्पिटल अटेंडेंट ग्रेड-2 भर्ती परीक्षा दोनों एसटीएफ की जांच के दायरे में हैं. सवाल है कि चिकित्सा संस्थानों में हजारों पदों पर भर्ती के लिए आयोजित परीक्षाओं में बार-बार विवाद क्यों खड़े हो रहे हैं और परीक्षा कराने से लेकर चयन प्रक्रिया की जिम्मेदारी संभालने वाले संस्थानों की जवाबदेही आखिर किसकी है.

परीक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

SGPGI में नर्सिंग ऑफिसर और हॉस्पिटल अटेंडेंट की भर्ती परीक्षा दो पालियों में आयोजित होनी थी. इसके लिए शहर में परीक्षा केंद्र बनाए गए थे. अभ्यर्थियों का आरोप है कि गोमतीनगर के छोटा भरवारा स्थित एसडीएसएन डिग्री कॉलेज, एसडीएसएन पब्लिक स्कूल और जूरिस कॉलेज ऑफ लॉ में बायोमीट्रिक सत्यापन की प्रक्रिया अचानक रोक दी गई. 

कुछ अभ्यर्थियों का दावा था कि शुरुआती दौर में केवल 15 से 20 अभ्यर्थियों का ही सत्यापन हो सका, इसके बाद सर्वर खराब होने की बात कहकर बाकी को रोक दिया गया. जबकि दूसरे केंद्रों पर परीक्षा शुरू हो चुकी थी. इससे परीक्षा की निष्पक्षता को लेकर संदेह गहराया. कुछ अभ्यर्थियों ने केंद्र के भीतर पहले से प्रवेश देने और ओएमआर शीट भरवाने जैसे आरोप भी लगाए. हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और एसटीएफ पूरे घटनाक्रम की जांच कर रही है.

परीक्षा को लेकर एक दूसरा विवाद ऑफलाइन और ऑनलाइन प्रक्रिया का भी है. अभ्यर्थियों का कहना है कि भर्ती के विज्ञापन में ऑनलाइन परीक्षा का उल्लेख किया गया था. प्रारंभिक परीक्षा में अभ्यर्थियों की संख्या 20 से 30 हजार होने के बावजूद ऑनलाइन परीक्षा कराई गई, लेकिन मुख्य परीक्षा में करीब 8,100 अभ्यर्थियों के लिए ऑफलाइन व्यवस्था अपनाई गई. इसकी जानकारी भी मुख्य परीक्षा से महज दस दिन पहले नोटिस जारी कर दी गई. 

अभ्यर्थियों ने परीक्षा के स्वरूप में इस बदलाव पर सवाल उठाए हैं. राजस्थान से आए अभ्यर्थियों मोहनलाल बराला, सुभाष और वीरेंद्र बढ़ाना के मुताबिक, उन्हें प्रारंभिक परीक्षा के लिए पश्चिम बंगाल और मुख्य परीक्षा के लिए लखनऊ बुलाया गया. हर बार यात्रा और ठहरने पर पांच से छह हजार रुपए खर्च हुए. इसके बावजूद परीक्षा केंद्र पर प्रवेश नहीं मिल सका.

दावा है कि 15-20 अभ्यर्थियों के बायोमेट्रिक सत्यापन के बाद ही सर्वर खराब हो गया था (सांकेतिक तस्वीर)

परीक्षा निरस्त होने के बाद संस्थान के निदेशक डॉ. आरके धीमन ने नई तारीख जल्द घोषित करने और पूरे मामले की जांच एसटीएफ से कराने की बात कही. लेकिन परीक्षा के दिन पैदा हुई अव्यवस्था ने संस्थान की प्रशासनिक तैयारियों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. शासन की ओर से पहले ही प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बंटवारे पर आपत्ति जताई गई थी. 

SGPGI में संयुक्त निदेशक सामग्री प्रबंधन (जेडीएमएम) प्रकाश सिंह को संयुक्त निदेशक प्रशासन (जेडीए) का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था. शासन की अपर निदेशक प्रशासन कृतिका शर्मा ने एक सितंबर को संस्थान के निदेशक को पत्र लिखकर इस व्यवस्था पर सवाल उठाए थे. पत्र में कहा गया था कि संयुक्त निदेशक प्रशासन का पद वित्त सेवा से संबंधित है और प्रकाश सिंह निर्धारित योग्यता पूरी नहीं करते. 

एक अधिकारी को एक से अधिक महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी देने से कामकाज प्रभावित होने की आशंका भी जताई गई थी. इसके बावजूद उन्हें अतिरिक्त प्रभार पर बनाए रखा गया. बाद में भर्ती परीक्षा के आयोजन की जिम्मेदारी भी उन्हीं के पास रही. ऐसे में परीक्षा प्रबंधन में हुई चूक के लिए प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है.

KGMU की भर्ती भी जांच

SGPGI से पहले KGMU की नर्सिंग ऑफिसर भर्ती परीक्षा भी विवादों में घिर चुकी है. संस्थान ने वर्ष 2023 में नर्सिंग ऑफिसर के 1,276 पदों पर भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया था. इसमें 63 हजार से अधिक आवेदन आए और 1,172 अभ्यर्थियों ने नियुक्ति के बाद कार्यभार ग्रहण किया. इस भर्ती प्रक्रिया में परीक्षा के स्वरूप और चयन सूची को लेकर सवाल उठे. आरोप है कि विज्ञापन में ऑनलाइन परीक्षा कराने का उल्लेख था लेकिन बाद में इसे ओएमआर आधारित कर दिया गया. इस बदलाव को लेकर अभ्यर्थियों और जनप्रतिनिधियों ने आपत्ति जताई.

चयन सूची में अनारक्षित वर्ग के 510 पदों पर उत्तर प्रदेश के केवल 160 अभ्यर्थियों का चयन होने का दावा भी विवाद की वजह बना. राजस्थान के 209 और दिल्ली के 46 अभ्यर्थियों के चयन को लेकर सवाल उठाए गए. हालांकि केवल दूसरे राज्यों के अभ्यर्थियों का चयन होना अपने आप में किसी अनियमितता का प्रमाण नहीं है, लेकिन परीक्षा के स्वरूप में बदलाव और चयन प्रक्रिया को लेकर उठी शिकायतों ने पूरे मामले को विवादित बना दिया. 

विधायकों की शिकायत के बाद मुख्यमंत्री के निर्देश पर एसटीएफ ने जांच शुरू की. जांच एजेंसी ने KGMU के कुलपति और कुलसचिव कार्यालय से भर्ती से जुड़ी गोपनीय फाइलें भी जब्त की थीं. अब SGPGI की परीक्षा में गड़बड़ी की आशंका सामने आने के बाद दोनों संस्थानों की भर्ती प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा में है.

इन दोनों मामलों में एक समानता यह है कि चिकित्सा संस्थानों ने उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग या उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग जैसी स्वतंत्र भर्ती संस्थाओं के बजाय अपने स्तर पर परीक्षा आयोजित कराने की व्यवस्था अपनाई. संस्थानों के पास भर्ती प्रक्रिया संचालित करने का अधिकार और प्रशासनिक क्षमता हो सकती है, लेकिन परीक्षा कराने वाली एजेंसी के चयन, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता, बायोमीट्रिक सत्यापन, परीक्षा केंद्रों की निगरानी और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है. 

बाहरी एजेंसी को परीक्षा कराने का जिम्मा सौंपने से संस्थान अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते. KGMU की भर्ती में परीक्षा के स्वरूप में बदलाव और SGPGI में परीक्षा के दिन बायोमीट्रिक व्यवस्था ठप होने की घटनाएं इसी व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती हैं.

निगरानी तंत्र की जवाबदेही

भर्ती परीक्षाओं में विवाद की एक बड़ी वजह परीक्षा कराने वाली निजी एजेंसियों पर संस्थानों की निर्भरता और उनकी निगरानी की व्यवस्था भी है. परीक्षा केंद्रों का चयन, सर्वर की क्षमता, बायोमीट्रिक सत्यापन, अभ्यर्थियों का प्रवेश और ओएमआर शीट की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण काम एजेंसी के जिम्मे होते हैं. ऐसे में एजेंसी के कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध होने या तकनीकी व्यवस्था बाधित होने पर पूरी परीक्षा की विश्वसनीयता प्रभावित होती है. 

SGPGI के मामले में एसटीएफ की जांच इस बिंदु पर केंद्रित है कि क्या परीक्षा कराने वाली कंपनी से जुड़े लोगों ने वास्तव में अभ्यर्थियों को पास कराने का ठेका लिया था और क्या बायोमीट्रिक सत्यापन में जानबूझकर बाधा पहुंचाई गई. जांच एजेंसी संदिग्ध लोगों की भूमिका और कथित वसूली के साक्ष्य जुटा रही है. पुख्ता प्रमाण मिलने पर संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई हो सकती है.

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