केजीएमयू : डॉक्टरी सलाह में नॉनवेज 'दवा', हॉस्टल मेस में बना 'गुनाह'
KGMU के हॉस्टल मेस में नॉनवेज बैन के फैसले ने प्रशासनिक अधिकार, वैज्ञानिक सोच और भोजन के अधिकार पर बहस छेड़ दी है

किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में पढ़ने वाला एक जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर रोजाना ओपीडी में ऐसे मरीजों को देखता है, जिनके लिए डॉक्टरों की पहली सलाह होती है, "प्रोटीन बढ़ाइए, अंडा खाइए, चिकन या मछली लीजिए". ऑपरेशन के बाद रिकवरी हो, टीबी का इलाज हो, एनीमिया, कुपोषण या गंभीर संक्रमण, अधिकांश मामलों में संतुलित और प्रोटीनयुक्त भोजन चिकित्सा का अहम हिस्सा माना जाता है.
लेकिन शाम को जब यही डॉक्टर अपने हॉस्टल लौटता है तो उसे पता चलता है कि उसके मेस में अब नॉनवेज भोजन नहीं मिलेगा. यह विरोधाभास केवल एक छात्र की परेशानी नहीं, बल्कि देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थानों में से एक के भीतर उठी ऐसी बहस का केंद्र बन गया है, जो अब प्रशासनिक निर्णय से आगे बढ़कर वैज्ञानिक सोच, भोजन की स्वतंत्रता, संस्थागत अधिकार और बदलती सरकारी खाद्य नीति तक पहुंच गई है.
KGMU प्रशासन ने 15 जुलाई को सभी 18 बड़े और तीन छोटे हॉस्टल मेस में नॉनवेज भोजन पकाने और परोसने पर रोक लगाने का आदेश जारी किया है. प्रशासन इसे पूरी तरह गुणवत्ता सुधार और स्वच्छता से जुड़ा फैसला बता रहा है, लेकिन इस निर्णय ने छात्रों, शिक्षकों, डॉक्टरों, धार्मिक नेताओं और राजनीतिक दलों के बीच तीखी बहस छेड़ दी है.
साफ-सफाई की शिकायत से नॉनवेज बैन तक
पूरे विवाद की शुरुआत 13 जुलाई को आयोजित KGMU के 22वें दीक्षांत समारोह के दौरान हुई. समारोह में शामिल होने पहुंचीं उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय की कुलाधिपति आनंदीबेन पटेल ने छात्रावासों के भोजन, मेस की साफ-सफाई और छात्रों को मिलने वाली सुविधाओं पर चिंता जताई. इसके बाद 'जन भवन' की निरीक्षण टीमों ने विभिन्न हॉस्टल मेस का निरीक्षण किया. विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार निरीक्षण के दौरान तीन हॉस्टल मेस में नॉनवेज भोजन पकाया जा रहा था, जबकि दो मेस में एक्सपायर्ड मसालों और खाद्य सामग्री के इस्तेमाल की शिकायत मिली. इसके बाद मुख्य प्रोवोस्ट प्रो. के.के. सवलानी की ओर से सभी हॉस्टल मेस को लिखित आदेश जारी कर नॉनवेज भोजन पकाने और परोसने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गई.
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि राज्यपाल ने अपने निरीक्षण के दौरान कहीं भी नॉनवेज पर प्रतिबंध लगाने का स्पष्ट निर्देश नहीं दिया था. उन्होंने केवल भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता, गुणवत्ता जांच मजबूत करने, पनीर की गुणवत्ता सुधारने और छात्र सुविधाओं को बेहतर बनाने की बात कही थी. यहीं से सवाल उठना शुरू हुआ कि अगर समस्या एक्सपायर्ड मसाले और खराब गुणवत्ता थी तो समाधान पूरे नॉनवेज मेन्यू को समाप्त करना क्यों बना?
प्रशासन का पक्ष : फैसला केवल मेस तक सीमित
विवाद बढ़ने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने लगातार सफाई दी कि इस फैसले को अनावश्यक रूप से विवादित बनाया जा रहा है. KGMU के प्रवक्ता प्रो. के.के. सिंह ने स्पष्ट किया कि पाबंदी केवल विश्वविद्यालय से संचालित हॉस्टल मेस और कोऑपरेटिव किचन तक सीमित है. छात्रों को परिसर के बाहर नॉनवेज भोजन करने से नहीं रोका गया है. अगर कोई छात्र निजी व्यवस्था से भोजन बनाना चाहता है तो वह अपने स्तर पर ऐसा कर सकता है.
प्रशासन का कहना है कि उसका उद्देश्य किसी की भोजन संबंधी पसंद पर रोक लगाना नहीं बल्कि मेस संचालन को अधिक व्यवस्थित, स्वच्छ और गुणवत्तापूर्ण बनाना है. विश्वविद्यालय ने यह भी बताया कि कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने प्रो. अंजू अग्रवाल की अध्यक्षता में छह सदस्यीय टास्क फोर्स गठित की है. यह समिति 15 दिनों के भीतर भोजन की गुणवत्ता, साफ-सफाई, छात्र सुविधाओं और मेस संचालन में सुधार के लिए सुझाव देगी. राज्यपाल की ओर से सभी हॉस्टलों में वॉशिंग मशीन लगाने, पनीर की गुणवत्ता बेहतर करने और खाद्य सामग्री की नियमित जांच सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं. प्रशासन का कहना है कि एक्सपायर्ड खाद्य सामग्री हटाने और गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है;
मेडिकल साइंस के सामने खड़े हुए सवाल
सबसे अधिक चर्चा इस बात की हो रही है कि क्या एक मेडिकल विश्वविद्यालय में ऐसा फैसला वैज्ञानिक दृष्टि से सही माना जा सकता है. डॉक्टरों का कहना है कि प्रोटीन शरीर की मरम्मत, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और रिकवरी के लिए बेहद जरूरी है. अंडा, चिकन और मछली उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन के प्रमुख स्रोत माने जाते हैं. यही कारण है कि अस्पतालों में डॉक्टर कई मरीजों को इनका सेवन करने की सलाह देते हैं. इसी आधार पर विश्वविद्यालय के कई फैकल्टी सदस्य इस फैसले से सहमत नहीं हैं. ऑर्थोपेडिक्स विभाग के एक वरिष्ठ फैकल्टी सदस्य ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर कहा कि यह निर्णय पूरी तरह गलत है. उनके अनुसार विश्वविद्यालय को यह तय नहीं करना चाहिए कि छात्र क्या खाएं. उन्होंने कहा कि KGMU में देश के विभिन्न राज्यों से छात्र आते हैं और उनकी सांस्कृतिक तथा खानपान संबंधी विविधता का सम्मान किया जाना चाहिए.
कुछ शिक्षकों का यह भी कहना है कि पहले कुछ छोटे हॉस्टल मेस में छात्रों को अपनी पसंद का भोजन, जिसमें नॉनवेज भी शामिल था, बनाने की अनुमति थी लेकिन अब वह विकल्प भी समाप्त कर दिया गया है. हालांकि प्रशासन का तर्क है कि बेहतर गुणवत्ता वाले पनीर और अन्य शाकाहारी प्रोटीन विकल्प उपलब्ध कराकर छात्रों की पोषण संबंधी जरूरतें पूरी की जा सकती हैं.
भोजन का अधिकार बनाम संस्थागत अनुशासन
यह विवाद अब केवल नॉनवेज तक सीमित नहीं रहा. यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संस्थागत अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न बन गया है. फैसले का विरोध करने वाले छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि भोजन का चुनाव प्रत्येक व्यक्ति का निजी अधिकार है. अगर मेस में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों विकल्प उपलब्ध हों तो प्रत्येक छात्र अपनी पसंद के अनुसार भोजन चुन सकता है. उनका तर्क है कि विश्वविद्यालय को स्वच्छता और गुणवत्ता सुनिश्चित करनी चाहिए लेकिन किसी एक प्रकार के भोजन पर पूर्ण प्रतिबंध उचित समाधान नहीं माना जा सकता.
वहीं इस फैसले के समर्थकों का कहना है कि बड़े आवासीय परिसरों में एक समान भोजन व्यवस्था संचालन को आसान बनाती है. उनका मानना है कि इससे स्वच्छता, अनुशासन और प्रशासनिक नियंत्रण बेहतर रहेगा. डीन स्टूडेंट वेलफेयर प्रो. रश्मि कुशवाहा के मुताबिक इस विषय पर छात्रों से अभी औपचारिक बातचीत नहीं हुई है. माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में छात्र संगठनों के साथ संवाद के बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकती है.
धार्मिक नेताओं और राजनीतिक दलों की अलग-अलग राय
इस विवाद ने जल्द ही राजनीतिक और सामाजिक रंग भी ले लिया. ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि शिक्षण संस्थान अपने नियम बनाने के लिए स्वतंत्र हैं. अगर छात्र नॉनवेज खाना चाहते हैं तो वे परिसर के बाहर जाकर भोजन कर सकते हैं. उन्होंने इस मुद्दे का राजनीतिकरण न करने की सलाह दी.
दूसरी ओर लखनऊ ईदगाह के इमाम एवं इस्लामिक स्कॉलर मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने फैसले पर पुनर्विचार की अपील की. उन्होंने कहा कि देश की बड़ी आबादी मांसाहारी भोजन करती है और मेडिकल विज्ञान भी संतुलित नॉनवेज भोजन को पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत मानता है. उनके अनुसार देश के प्रमुख मेडिकल संस्थान में ऐसा निर्णय वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुरूप नहीं माना जा सकता.
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी अलग-अलग रहीं. केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा कि अगर ऐसा निर्णय लिया गया है तो संभवतः स्थानीय भावनाओं को ध्यान में रखकर लिया गया होगा. वहीं समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने इसे 'तुगलकी फरमान' बताते हुए आदेश वापस लेने की मांग की. कांग्रेस के प्रवक्ता अंशु अवस्थी ने भी कहा कि किसी व्यक्ति की खानपान संबंधी आदतों पर नियंत्रण उचित नहीं माना जा सकता.
ODOC नीति और अवधी खानपान की बहस
KGMU का यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब उत्तर प्रदेश सरकार की 'वन डिस्ट्रिक्ट-वन कुजीन' (ODOC) योजना पहले ही चर्चा में है. इस योजना के तहत प्रदेश के सभी 75 जिलों के लिए केवल शाकाहारी सिग्नेचर व्यंजन चुने गए. लखनऊ की पहचान माने जाने वाले गलावटी कबाब, काकोरी कबाब, अवधी बिरयानी और निहारी-कुलचा जैसी विश्व प्रसिद्ध डिश इस सूची में शामिल नहीं की गईं. दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार पहले लखनऊ को यूनेस्को के क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क में गैस्ट्रोनॉमी श्रेणी के लिए प्रस्तुत करते समय उसकी अवधी खाद्य विरासत को वैश्विक पहचान दिलाने की बात कर चुकी है. ऐसे में आलोचक KGMU के फैसले को राज्य में बदलती खाद्य प्राथमिकताओं की नजर से भी देख रहे हैं. हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन इस तुलना को स्वीकार नहीं करता. उसका कहना है कि यह पूरी तरह प्रशासनिक निर्णय है, जिसका उद्देश्य केवल मेस संचालन में सुधार लाना है.
फिलहाल KGMU में हॉस्टल मेस के भीतर नॉनवेज भोजन पर रोक लागू है. लेकिन इस फैसले ने कई ऐसे सवाल छोड़ दिए हैं जिनका जवाब केवल प्रशासनिक आदेश से नहीं मिलेगा. क्या मेडिकल संस्थानों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और प्रशासनिक सुविधा के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है? क्या भोजन की गुणवत्ता सुधारने का रास्ता प्रतिबंध से होकर गुजरता है, या सख्त निगरानी और बेहतर प्रबंधन से भी वही लक्ष्य हासिल किया जा सकता है? क्या छात्रों की भोजन संबंधी पसंद को संस्थागत अनुशासन के साथ संतुलित किया जा सकता है?
इन सवालों का जवाब आने वाले दिनों में टास्क फोर्स की सिफारिशों और विश्वविद्यालय प्रशासन के अगले कदमों से मिल सकता है. लेकिन फिलहाल इतना तय है कि KGMU का यह निर्णय केवल एक मेस का मेन्यू बदलने तक सीमित नहीं रहा. इसने चिकित्सा विज्ञान, पोषण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सांस्कृतिक विविधता और सार्वजनिक संस्थानों की नीतियों पर एक ऐसी बहस छेड़ दी है, जिसकी गूंज लखनऊ से निकलकर देश के अन्य विश्वविद्यालयों और मेडिकल संस्थानों तक पहुंच चुकी है.