केरल में निपाह मरीजों को एक्सपायर्ड दवा देने के आरोप पर छिड़ा विवाद

केरल की नई सरकार ने 2023 से 2025 के बीच निपाह मरीजों को एक्सपायर्ड रेमडेसिविर देने के आरोपों की जांच के आदेश दिए हैं. हालांकि, पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और मेडिकल विशेषज्ञों ने इन दावों को गलत बताते हुए इलाज के रिकॉर्ड की जांच की मांग की है

केरल में 2018-25 के बीच छह बार निपाह वायरस के मामले सामने आए थे (सांकेतिक तस्वीर)

केरल में निपाह वायरस के इलाज को लेकर नया राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है. कांग्रेस की अगुवाई वाली यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) सरकार ने पिछली लेफ्ट फ्रंट सरकार के कार्यकाल में गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज कोझिकोड में निपाह के मरीजों के इलाज के लिए अपनाए गए तरीकों की जांच कराने का आदेश दिया है.

स्वास्थ्य मंत्री के. मुरलीधरन ने 29 अक्टूबर को विधानसभा में बताया कि उनके विभाग ने 2023 से 2025 के बीच राज्य में निपाह वायरस से हुई मौतों की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए हैं. साथ ही इलाज में अपनाए गए तरीकों की जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड भी बनाया जाएगा. मुरलीधरन कांग्रेस विधायक मैथ्यू कुझलनादन की ओर से उठाए गए सवाल का जवाब दे रहे थे.

मुरलीधरन ने आशंका जताई कि गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज कोझिकोड में मरीजों को एंटीवायरल दवा रेमडेसिविर की एक्सपायर्ड खुराक दी गई थी. उनके मुताबिक सरकारी एजेंसी केरल मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन लिमिटेड ने जून 2021 में 42 लाख रुपए में रेमडेसिविर की 3,000 शीशियां खरीदी थीं. इनकी एक्सपायरी डेट 30 मई 2023 थी.

सरकार के मुताबिक, कोझिकोड मेडिकल कॉलेज ने 2023, 2024 और 2025 में निपाह के मरीजों को इस एंटीवायरल दवा की शीशियां दी थीं. इस दौरान छह लोगों की मौत हुई. दवा के स्टॉक और इस्तेमाल से जुड़े रिकॉर्ड में पता चला कि 2023-24 में एक्सपायर हो चुकी 102 शीशी, 2024-25 में 34 और 2025-26 में 10 शीशियों का इस्तेमाल किया गया.

केरल में 2018, 2019, 2021, 2023, 2024 और 2025 में निपाह का संक्रमण फैला था. इस वायरस से अब तक 22 लोगों की मौत हो चुकी है. लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के शासन में निपाह संक्रमण से निपटने के लिए राज्य की मेडिकल कम्युनिटी और आम लोगों ने सरकार की तारीफ की थी. हालांकि अब कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार के एक्सपायरी दवाओं को लेकर किए गए दावों से उन कोशिशों पर सवाल खड़े हो गए हैं.

स्वास्थ्य मंत्री ने विधानसभा में जब यह बड़ा ऐलान किया तो विपक्ष ने इसे चुनौती दी. इंडिया टुडे से बात करते हुए LDF सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहीं वीणा जॉर्ज ने कहा: "के. मुरलीधरन ने स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए राजनीतिक विवाद खड़ा करने के मकसद से आंकड़ों को गलत तरीके से पेश किया है. निपाह संक्रमण के साथ अस्पताल में भर्ती हुए मरीजों के इलाज की पूरी जानकारी दर्ज है और कोई भी इसकी जांच कर सकता है. मरीजों को निपाह की एंटीवायरल दवा देने से पहले विशेषज्ञों के एक पैनल के साथ मेडिकल बोर्ड बनाया जाता है. 2023 से 2025 के बीच कोझिकोड मेडिकल कॉलेज में रेमडेसिविर लेने वाले किसी भी मरीज की मौत नहीं हुई."

मेडिकल एक्सपर्ट्स ने भी मुरलीधरन के दावों पर हैरानी जताई. कोझिकोड के एस्टर नॉर्थ केरल क्लस्टर फॉर क्रिटिकल केयर के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. ए.एस. अनूप कुमार ने कहा कि 2023 से 2025 के बीच जिन छह निपाह मरीजों की मौत हुई, उन्हें गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज कोझिकोड में कभी रेमडेसिविर नहीं दी गई थी.

डॉ. कुमार ने इंडिया टुडे से कहा, "उन्हें गंभीर हालत में मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया था और उन्हें एंटीवायरल दवा नहीं दी जा सकी. हालांकि रेमडेसिविर लेने वाले निपाह के सात मरीज ठीक हो गए. आंकड़ों और इलाज में अपनाए गए तरीकों की जांच की जा सकती है. यह विवाद सरकारी अस्पतालों पर लोगों का भरोसा कम करने के लिए खड़ा किया गया है."

इस साल जून में केरल में निपाह वायरस का एक मामला सामने आया था. इसके बाद UDF सरकार ने 12 जून को बहरीन से रेमडेसिविर की 50 शीशियां खरीदी थीं.

हाल ही में स्वास्थ्य विभाग एक और विवाद में घिर गया था. तिरुवनंतपुरम के सरकारी अस्पताल श्री अविट्टम थिरुनल अस्पताल ने स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी से पीड़ित बच्चों के इलाज के लिए रोश की दवा रिसडिप्लाम की जगह सस्ती जेनेरिक दवा देना शुरू किया था. इसके बाद बच्चों के माता-पिता ने चिंता जताई. उन्होंने देखा कि जेनेरिक दवा के पैकेट पर "सिर्फ क्लिनिकल ट्रायल के लिए डॉक्टरों को दिए जाने वाले सैंपल" लिखा था.

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