ज्ञानेश कुमार से जुड़े 20 साल पुराने केस की फिर खुली फाइल, जांच से कुछ निकलेगा?
केरल सरकार ने यह मामला ऐसे समय में फिर खोला है जब SIR को लेकर देशभर में विपक्ष का दबाव बढ़ रहा है और वोटर लिस्ट में बदलाव को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की जा रही है

केरल में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ करीब 20 साल पुरानी विजिलेंस जांच फिर सुर्खियों में है. यह मामला उस समय का है जब ज्ञानेश कुमार राज्य के लोक निर्माण विभाग (PWD) के सचिव थे.
तब कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार ने भारत-मलेशिया की संयुक्त कंपनी PATI-BEL की ओर से शुरू की गई एक सड़क परियोजना से जुड़े मामले को फिर खोल दिया है. यह मामला 2006 में सामने आया था जब परियोजना के मैनेजर लीसी बीन ने आत्महत्या कर ली थी. इसके बाद मामले की जांच शुरू हुई लेकिन सबूत न मिलने की वजह से 2011 में इसे बंद कर दिया गया था.
केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने 4 अक्टूबर को कहा कि मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन से बातचीत के बाद राज्य के विजिलेंस एंड एंटी-करप्शन ब्यूरो (VACB) के निदेशक मनोज अब्राहम को इस मामले में जांच नए सिरे से शुरू करने का निर्देश दिया गया है.
यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत मतदाता सूचियों में बदलाव और इस प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेदों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज हो रही है. इस प्रक्रिया की वजह से लाखों लोग मतदान के अधिकार से वंचित हुए हैं.
PATI-BEL मामला उस समय सुर्खियों में आया था जब मलेशिया के रहने वाले लीसी बीन नवंबर 2006 में कुआलालंपुर में फांसी पर लटके मिले थे. इससे पहले वी.एस. अच्युतानंदन की नेतृत्व वाली तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार ने परियोजना के लिए भुगतान रोक दिया था और कथित देरी के लिए जुर्माना लगाने की प्रक्रिया शुरू की थी. लीसी बीन की मौत के बाद सरकार ने PWD और उसके सचिव कुमार के खिलाफ विजिलेंस जांच के आदेश दिए थे.
उस समय मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया था कि सरकार में कुछ लोगों ने बकाया बिलों का भुगतान कराने के लिए रिश्वत मांगी थी. यह स्पष्ट नहीं है कि मलेशियाई पुलिस को मिले सुसाइड नोट में किसी का नाम लिखा था या नहीं.
केरल के एक पूर्व DGP और विजिलेंस निदेशक ने नाम जाहिर न करने की शर्त पर इंडिया टुडे से कहा कि उस समय PWD सचिव के तौर पर कुमार ने कैबिनेट के फैसलों को लागू किया होगा और संभवत: उन्हें सजा के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता था.
पूर्व अधिकारी ने कहा, “ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ऐसे मामले में पूरी जांच का आदेश देना, जिसे विजिलेंस विभाग ने कई साल पहले बंद कर दिया था, सिर्फ मीडिया में चर्चा पाने का काम करेगा, खासकर तब जब नई कार्रवाई पुराने मीडिया रिपोर्टों के आधार पर की जा रही हो. इसका नतीजा शुरुआती जांच के रूप में निकलेगा और विभाग के एक और अनसुलझे मामले में जुड़ जाएगा.”
उन्होंने बताया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने 2007 की शुरुआत में कुमार को केंद्र में डेपुटेशन पर रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव के तौर पर जाने की मंजूरी दी थी. उस समय कांग्रेस नेता ए.के. एंटनी रक्षा मंत्री थे. पूर्व विजिलेंस प्रमुख ने सवाल उठाया कि अगर विजिलेंस की मंजूरी नहीं थी तो मुख्यमंत्री किसी केरल कैडर के IAS अधिकारी कुमार को केंद्र में डेपुटेशन पर जाने की अनुमति कैसे दे सकते थे?
विजिलेंस जांच उस समय शुरू की गई थी, जब केरल के पूर्व DGP उपेंद्र वर्मा VACB के प्रमुख थे. वर्मा एक ईमानदार अधिकारी माने जाते थे और नियमों से कभी समझौता नहीं करने के लिए जाने जाते थे. इसके अलावा अगर सतीशन सरकार की ओर से अब इस मामले को आगे बढ़ाने की वजह सिर्फ राजनीतिक है, तो यह कार्रवाई सवालों के घेरे में आ सकती है.
केरल में कुमार को 1989 से ही कई लोग एक काबिल अधिकारी मानते हैं. उस समय वह फोर्ट कोच्चि में असिस्टेंट कलेक्टर की ट्रेनिंग पर थे. अगले साल वह पथानामथिट्टा के अडूर के सब-कलेक्टर बने. उनकी अहम पोस्टिंग में से एक 2001 में एंटनी के मुख्यमंत्री रहने के दौरान एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर की थी. कुमार इस पद पर तीन साल तक रहे. माना जाता है कि एंटनी के साथ उनकी नजदीकी के चलते उन्हें रक्षा मंत्रालय में केंद्र में डेपुटेशन मिला था.
केरल कैडर के एक रिटायर्ड IAS अधिकारी ने कहा, “IAS अधिकारी के तौर पर ज्ञानेश कुमार शानदार थे. उनकी नजर बारीकियों पर रहती थी और काम को सही तरीके से पूरा करने के लिए जरूरी चीजों को लेकर उनकी समझ बहुत अच्छी थी लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर उन्होंने हमें निराश किया है. BJP के लिबास मे उनका दूसरा रूप उस ‘GK’ से बिल्कुल मेल नहीं खाता, जिसे हम सभी पसंद करते थे.”