कश्मीर क्यों चाहता है देश के बाजारों तक ग्रीन कॉरिडोर?
सेब की तुड़ाई के मौसम में रोजाना सैकड़ों फल लदे ट्रकों की आवाजाही बढ़ने के बीच उत्पादक और कारोबारी NH-44 पर प्राथमिकता के साथ सुगम रास्ता चाहते हैं ताकि मौसम या यातायात की वजह उन्हें फसल की कीमत का नुकसान न हो

कश्मीर में इस समय सेब तुड़ाई का सीजन पीक पर चल रहा है (फाइल फोटो)
दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग जिले के सेब उत्पादक रियाज अहमद खान इन दिनों पिछले साल लगाए गए हाई-डेंसिटी (उच्च घनत्व) बागान से पहली बार गाला किस्म के सेब की तुड़ाई कर रहे हैं.
देशभर की फल मंडियों में गाला सेब के अच्छे दाम मिलने से उन्हें बेहतर आमदनी की उम्मीद है. हालांकि श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच-44) के मानसूनी बारिश की वजह से बार-बार बंद होने को लेकर वे चिंतित हैं.
रियाज बताते हैं, "मेरी सेब की फसल तैयार है. मैंने गाला श्निगा की तुड़ाई पूरी कर ली है और अब गाला मेमा की तुड़ाई शुरू कर दी है. लेकिन मुझे चिंता है कि भूस्खलन और अन्य कारणों से राजमार्ग बार-बार बंद हो रहा है. ऐसे में क्या मैं अपनी खेप समय पर दिल्ली भेज पाऊंगा?"
उनकी चिंता पूरे उद्योग की आशंका को दिखाती है. पिछले साल लंबे समय तक बंद रहा था. यह कश्मीर घाटी को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला एकमात्र भरोसेमंद सड़क मार्ग है. राजमार्ग बंद रहने से सेब उद्योग को अनुमानित 2,000 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ था.
शुरुआती किस्मों, खासकर गाला सेब के साथ-साथ आलूबुखारा और दूसरी जल्दी खराब होने वाले फलों की तुड़ाई शुरू हो गई है. ऐसे में विभिन्न फल उत्पादक संघों, सोपोर फल मंडी और कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (KCCI) ने फलों से लदे ट्रकों की सुरक्षित और समय पर आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए अलग ग्रीन कॉरिडोर की मांग तेज कर दी है.
भारत की सबसे बड़ी थोक फल मंडियों में से एक सोपोर फल मंडी के अध्यक्ष फैयाज अहमद मलिक ने कहा कि फल से लदे ट्रकों के लिए अलग कॉरिडोर और तय समय स्लॉट की मांग लंबे समय से की जा रही है.
फैयाज कहते हैं, "भूस्खलन के कारण हाल में राजमार्ग बंद होने के अलावा एकतरफा यातायात भी बड़ी समस्या है. अधिकारियों को हर दिन तय समय स्लॉट में फल से लदे ट्रकों को आवाजाही की अनुमति देनी चाहिए, ताकि उपज समय पर देशभर की मंडियों तक पहुंच सके."
फैयाज ने बताया, "जैसे-जैसे तुड़ाई का मौसम जोर पकड़ रहा है, सोपोर फल मंडी से हर दिन 70-80 ट्रक निकल रहे हैं." उन्होंने बताया कि फिलहाल घाटी से रोजाना 400-500 ट्रक ताजे फलों से लदकर बाहर जा रहे हैं. तुड़ाई का मौसम चरम पर पहुंचने के साथ इनकी संख्या और बढ़ने की उम्मीद है.
KCCI के महासचिव फैज अहमद बख्शी ने भी इसी चिंता को दोहराया. उन्होंने कहा कि तय समय स्लॉट या प्राथमिकता के आधार पर रास्ता देकर ट्रकों की संख्या को प्रभावी ढंग से संभाला जा सकता है. वे कहते हैं, "ग्रीन कॉरिडोर से यातायात प्रबंधन सुचारु होगा और उन अनावश्यक देरी को रोका जा सकेगा जो सीधे तौर पर ताजे फलों की गुणवत्ता और बाजार मूल्य को प्रभावित करती हैं."
सेब उद्योग कश्मीर में लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है और जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था में हर साल करीब 12,000 करोड़ रुपए का योगदान देता है. लगभग पूरी फसल एनएच-44 के रास्ते देशभर की थोक मंडियों तक पहुंचाई जाती है.
इसलिए फलों की गुणवत्ता बनाए रखने, समय पर मंडियों तक पहुंच सुनिश्चित करने, कीमतों में प्रतिस्पर्धा बनाए रखने और उत्पादकों की आय सुरक्षित रखने के लिए सड़क संपर्क का निर्बाध रहना बेहद जरूरी है.
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि थोड़ी सी देरी भी शुरुआती मौसम की जल्दी खराब होने वाली किस्मों के बाजार मूल्य में भारी गिरावट ला सकती है. इससे सप्लाई चेन बाधित होती है, माल ढुलाई का खर्च बढ़ता है, लोडिंग और अनलोडिंग की लागत बढ़ती है, ईंधन और श्रम पर खर्च बढ़ता है, उत्पादकों और व्यापारियों को भुगतान मिलने में देरी होती है और कश्मीर की उपज को लेकर खरीदारों का भरोसा कम होता है.
KCCI ने जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से दखल की मांग की है ताकि पूरे तुड़ाई मौसम के दौरान एनएच-44 पर फलों से लदे ट्रकों को प्राथमिकता के आधार पर रास्ता दिया जा सके. चैंबर ने यातायात पुलिस, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई), सीमा सड़क संगठन (बीआरओ), जिला प्रशासन और बागवानी विभाग के बीच करीबी समन्वय की भी मांग की है.
इसका उद्देश्य रास्ते में आई रुकावटों को तेजी से हटाना, मौसम संबंधी बाधाओं के बाद यातायात को जल्द बहाल करना और उत्पादकों, व्यापारियों तथा ट्रांसपोर्टरों के लिए नियमित वास्तविक समय यातायात संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना है.
फैयाज और फैज दोनों ने मुगल रोड को व्यावहारिक विकल्प मानने से इनकार किया. यह कश्मीर घाटी के शोपियां को जम्मू के पुंछ से जोड़ने वाला ऐतिहासिक मार्ग है. उनका कहना है कि सेब की ज्यादातर खेप 12-टायर और 16-टायर वाले ट्रकों से भेजी जाती है, जबकि मुगल रोड छोटे वाहनों के लिए ज्यादा उपयुक्त है.
इनके मुताबिक, कश्मीर से बागवानी उत्पादों को बाहर ले जाने के लिए एनएच-44 ही एकमात्र व्यावहारिक और आर्थिक रूप से टिकाऊ सड़क मार्ग है.