क्लाइमेट चेंज निगल जाएगा कश्मीर घाटी?
बदलती बारिश, कम होती बर्फबारी और बढ़ती गर्मी कश्मीर के मौसम में बड़े बदलाव का संकेत दे रही हैं. विशेषज्ञ अब जलवायु जोखिम को समझने और उससे पहले तैयारी करने की जरूरत बता रहे हैं

क्लाइमेट चेंज कश्मीर में लोगों की आजीविका को भी प्रभावित कर रहा है (सांकेतिक तस्वीर)
कश्मीर के लोकप्रिय पर्यटन स्थल पहलगाम में 1 सितंबर को बादल फटने के बाद अचानक आई बाढ़ ने सड़कों और होटलों के सामने गंदा पानी भर दिया. इस मौसम में इलाके में इस तरह की यह दूसरी घटना थी. इससे पहले भी एक घटना में एक पुल क्षतिग्रस्त हो गया था.
सिर्फ पहलगाम ही नहीं बल्कि पूरे कश्मीर में मौसम की चरम घटनाएं अब लगातार आम होती जा रही हैं. इनमें बड़े पैमाने पर ओलावृष्टि, बादल फटना, अचानक बाढ़ आना, गर्मियों में तेज गर्मी और बारिश का अनियमित या कम होना शामिल है.
हालांकि इस क्षेत्र में लंबे समय से मौसम का मिजाज अनिश्चित रहा है लेकिन इस साल वसंत और गर्मियों की शुरुआत असामान्य रूप से उथल-पुथल भरी रही. जून तक 100 से ज्यादा ओलावृष्टि की घटनाएं दर्ज की गईं.
कश्मीर के लोगों को महसूस हो रहा है कि यहां की जलवायु में कुछ बदलाव आया है. कई लोग इन घटनाओं को समाज में नैतिक गिरावट के लिए ईश्वरीय सजा के तौर पर देखते हैं.
वहीं जागरूक लोगों का एक छोटा वर्ग इन बदलावों को ग्लोबल वार्मिंग और कश्मीर हिमालय की खास संवेदनशीलता से जोड़ता है. यह नेपाल की तरह एक पर्वतीय क्षेत्र है, जो जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बेहद संवेदनशील है.
अनुभव से जलवायु परिवर्तन की समझ
नेपाल और तिब्बत में हाल में ग्लेशियल झील के फटने से आई विनाशकारी फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) ने यह डर बढ़ा दिया है कि अगर सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो कश्मीर में भी ऐसी आपदाएं आ सकती हैं.
इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IUST) ने हाल ही में पूरे कश्मीर में करीब 800 लोगों के बीच एक सर्वे किया. इसमें सामने आया कि लोग बदलती जलवायु के असर को साफ तौर पर महसूस करते हैं लेकिन यह नहीं समझ पाते कि ये बदलाव आपस में कैसे जुड़े हुए हैं.
इंडिया टुडे से बातचीत में IUST के कुलपति और जाने-माने पृथ्वी विज्ञानी एवं हिमनद विज्ञानी प्रोफेसर शकील अहमद रोमशू कहते हैं, "अध्ययन से पता चला कि लोगों में जलवायु परिवर्तन को लेकर अनुभव के आधार पर जागरूकता काफी अधिक है. लोग तापमान, बर्फबारी और बारिश के पैटर्न में बदलाव को साफ तौर पर महसूस कर रहे हैं."
साफ-साफ लोग जो महसूस कर पा रहे हैं, वह है, असमान बारिश (95 प्रतिशत), बर्फबारी के समय में बदलाव (92 प्रतिशत), बर्फबारी में कमी (89 प्रतिशत), गर्मियों के तापमान में बढ़ोतरी (87 प्रतिशत), सर्दियों का छोटा होना (86 प्रतिशत) और गर्मियों का ज्यादा गर्म होना (82 प्रतिशत). मौसम की चरम घटनाओं को लेकर लोगों की धारणा इतनी एक जैसी नहीं है हालांकि बड़ी संख्या में लोग जलवायु से जुड़ी आपदाओं के बढ़ते खतरे को पहचानते हैं.
जम्मू-कश्मीर में जलवायु साक्षरता बढ़ाने की तत्काल जरूरत के बारे में पूछे जाने पर प्रोफेसर रोमशू ने कहा, "कुल मिलाकर, अध्ययन एक महत्वपूर्ण अंतर की ओर इशारा करता है. लोगों को जलवायु परिवर्तन के विज्ञान की औपचारिक समझ सीमित हो सकती है लेकिन वे अपने स्थानीय मौसम और पर्यावरण में बदलाव के जरिए इसके असर को मजबूती से महसूस कर रहे हैं."
IUST के निष्कर्ष दूसरे शोधों से भी मेल खाते हैं. इनमें येल प्रोग्राम ऑन क्लाइमेट चेंज कम्युनिकेशन का अध्ययन भी शामिल है. इससे पता चलता है कि भारत में जलवायु परिवर्तन को लेकर लोगों की धारणा अक्सर तापमान, बारिश और मौसम की चरम घटनाओं में बदलाव के प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित होती है.
येल के अध्ययन में आधे से ज्यादा लोगों ने कहा था कि वे जलवायु परिवर्तन के बारे में बहुत कम या कुछ भी नहीं जानते जबकि उनमें से कई ने मौसम की चरम घटनाओं का अनुभव करने की बात कही थी.
प्रोफेसर रोमशू ने जोर देकर कहा, "हाल की हिमालयी आपदाएं (नेपाल) हमें याद दिलाती हैं कि जागरूकता जान बचा सकती है. इसलिए जलवायु साक्षरता को सिर्फ पर्यावरण शिक्षा नहीं, बल्कि आपदा जोखिम कम करने के एक जरूरी हिस्से के तौर पर देखा जाना चाहिए."
कृषि पर सबसे ज्यादा असर
शेर-ए-कश्मीर यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी (SKUAST), कश्मीर के पर्यावरण विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफेसर फारूक अहमद लोन ने कहा कि जिस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर पहले से महसूस किया जा रहा है, वहां कृषि और बागवानी पर इसका प्रभाव खास तौर पर दिखाई दे रहा है.
प्रोफेसर लोन ने कहा, "जम्मू-कश्मीर जलवायु परिवर्तन के प्रति बेहद संवेदनशील है. यहां बर्फबारी और बारिश के पैटर्न, अत्यधिक तापमान, पानी की उपलब्धता और ओलावृष्टि व बादल फटने जैसी मौसम की चरम घटनाओं में साफ बदलाव दिख रहे हैं. कृषि और बागवानी पर गर्मी और पानी के दबाव, सूखे दौर, बाढ़ तथा कीटों और बीमारियों के बदलते स्वरूप का खास असर पड़ रहा है."
जब भूस्खलन के कारण जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग बंद होता है और जल्दी खराब होने वाली कृषि उपज की ढुलाई प्रभावित होती है, तब फसल कटाई के बाद होने वाला नुकसान तेजी से बढ़ जाता है.
लंबे समय तक परिवहन में देरी से उपज खराब होती है, उसकी गुणवत्ता घटती है, बाजार मूल्य कम होता है और किसानों तथा व्यापारियों को भारी आर्थिक नुकसान होता है. ये समस्याएं सीधे या परोक्ष रूप से जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हैं.
कृषि और बागवानी के अलावा प्रोफेसर लोन ने पानी के घटते संसाधनों, बदलते तापमान, हाइ़ड्रोइलेक्टिसिटी, लगातार हो रहे भूस्खलन, मौसम की चरम घटनाओं, जल स्रोतों के प्रदूषण, आर्द्रभूमि के क्षरण और प्राकृतिक आवासों के नुकसान को जलवायु के लिहाज से मजबूत तैयारी के लिए तत्काल ध्यान देने वाले प्रमुख क्षेत्र बताया.
कश्मीर नेपाल से अलग है
कश्मीर का भूगोल और भूविज्ञान नेपाल की संकरी घाटियों से काफी अलग है. सोपोर के सरकारी डिग्री कॉलेज में भूविज्ञान के सहायक प्रोफेसर डॉ. खुर्शीद अहमद पर्रे का कहना है कि ग्लेशियल झील के फटने से आने वाली बाढ़ का कश्मीर घाटी में नेपाल जैसे विनाशकारी असर होने की संभावना कम है.
डॉ. पर्रे ने कहते हैं, "सबसे पहले हमें अपने क्षेत्र के भूविज्ञान, भूगोल, भू-आकृति विज्ञान और जलवायु के पैटर्न को समझना होगा. हमारा क्षेत्र पश्चिमी हिमालय का हिस्सा है. घाटी में ग्लेशियल झील के फटने से आने वाली बाढ़ का असर सीमित है, क्योंकि हमारे यहां नेपाल जैसी विस्तृत हिमनद प्रणालियां नहीं हैं. नेपाल प्रमुख हिमनदीय क्षेत्रों के ज्यादा करीब है और वहां घाटियां संकरी हैं."
ग्लेशियल झील के फटने से आने वाली बाढ़ का खतरा संकरी घाटियों में ज्यादा होता है. ऐसी ही एक जगह पहलगाम के ऊपर स्थित अरू घाटी है, जहां भविष्य में चट्टानों और मलबे के खिसकने से ग्लेशियल अवरोध वाली झीलें बन सकती हैं.
डॉ. पर्रे के मुताबिक लद्दाख क्षेत्र में भी ग्लेशियल झील के फटने से आने वाली बाढ़ का खतरा है. कश्मीर हिमालय की प्रमुख भूगर्भीय रेखाओं और भ्रंश प्रणालियों के बीच स्थित है. इनमें मुख्य सीमा थ्रस्ट (पीर पंजाल थ्रस्ट), मुख्य केंद्रीय थ्रस्ट और जांस्कर थ्रस्ट शामिल हैं.
डॉ. पर्रे ने अमेरिकी भूकंप विज्ञानी डॉ. रोजर बिल्हम के काम का भी उल्लेख किया. उनके शोध में चेतावनी दी गई है कि भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की लगातार टक्कर के कारण क्षेत्र में काफी तनाव जमा हो रहा है. इससे भविष्य में यह क्षेत्र बड़े भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील हो सकता है.
डॉ. बिल्हम के आकलन समेत आधुनिक भूकंपीय खतरा आकलनों को देखते हुए भारतीय मानक ब्यूरो ने इस क्षेत्र के डिजाइन कोड में बदलाव किया है और पूरे जम्मू-कश्मीर को भूकंपीय जोन V में फिर से वर्गीकृत किया है. यह सबसे अधिक जोखिम वाली श्रेणी है.
कश्मीर विश्वविद्यालय के पृथ्वी विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों के हालिया जीपीएस और भू-आकृति विज्ञान संबंधी अध्ययन में धरती की सतह में सक्रिय ऊर्ध्वाधर हलचल सामने आई है. घाटी के दक्षिणी और दक्षिण-पूर्वी हिस्सों, जिनमें त्राल और कुलगाम शामिल हैं, में जमीन के औसत रूप से ऊपर उठने और उत्तरी तथा उत्तर-पश्चिमी किनारों, जिनमें उरी और बांदीपोरा शामिल हैं, में जमीन के धंसने की स्थिति पाई गई.
निष्कर्ष बताते हैं कि घाटी के आर-पार उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक सक्रिय सामान्य फॉल्ट मौजूद है. यह प्रमुख थ्रस्ट फॉल्ट की तिरक्षी कटी हुई दिशा में है.
डॉ. पर्रे बताते हैं, "जलवायु परिवर्तन, भूस्खलन और बाढ़ के अलावा हमारी चिंता खास तौर पर भूकंप से जुड़ी आपदाओं को लेकर भी है."
जलवायु जागरूकता
नेपाल की आपदा ने दिखाया है कि प्राकृतिक खतरों को हमेशा रोका नहीं जा सकता. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जागरूकता, आधुनिक शुरुआती चेतावनी प्रणाली और वैज्ञानिक खेती के तरीकों से नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है और आपदाओं से निपटने की क्षमता मजबूत की जा सकती है.
प्रोफेसर रोमशू ने सुझाव दिया, "पहली जरूरत यह है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़ी जानकारी को इस तरह लोगों तक पहुंचाया जाए कि वे उसे समझ सकें और उसके आधार पर कदम उठा सकें. जलवायु और आपदा जोखिम की शिक्षा स्कूलों और विश्वविद्यालयों से आगे पंचायतों, स्थानीय संस्थाओं, नागरिक समाज और मीडिया के जरिए समुदायों तक पहुंचनी चाहिए. इसमें स्थानीय भाषाओं और स्थानीय स्तर पर प्रासंगिक उदाहरणों का इस्तेमाल होना चाहिए."
रोमशू जोर देते हैं कि विकास की योजना में जलवायु जोखिम को मुख्यधारा में शामिल किया जाए और भविष्य में आने वाली चरम स्थितियों को ध्यान में रखकर बुनियादी ढांचे का निर्माण किया जाए, क्योंकि सिर्फ जागरूकता पर्याप्त नहीं है.
प्रोफेसर लोन ने प्राथमिक स्तर से ही स्कूल के पाठ्यक्रम में जलवायु साक्षरता को शामिल करने की सिफारिश की. इसके साथ सामुदायिक स्तर पर जागरूकता, स्थानीय भाषा में संवाद और किसानों के लिए जलवायु संबंधी सूचना सेवाएं भी जरूरी हैं.
उन्होंने कहा कि आपदाओं से निपटने की क्षमता के लिए शुरुआती चेतावनी प्रणाली, जलवायु के अनुकूल कृषि, जल संरक्षण, गंदे जल का उपयोग, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और जलवायु के अनुकूल बुनियादी ढांचा जरूरी है. इसमें सौर ऊर्जा आधारित ऊर्जा प्रणालियां भी शामिल हैं.
घटते जल संसाधनों को देखते हुए डॉ. पर्रे ने कश्मीर और जम्मू-कश्मीर के दूसरे क्षेत्रों में ऊंचाई और मध्यम ऊंचाई वाले इलाकों में चेक डैम (पानी के बहाव को रोकने वाले छोटे बांध) बनाने की वकालत की.
डॉ. पर्रे का कहना है कि इससे पानी के तेज बहाव को रोका जा सकेगा, बारिश के पानी का संरक्षण होगा और भविष्य में पानी की कमी को टाला जा सकेगा. उन्होंने भूकंपीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए खतरे के नक्शों को अपडेट करने और निर्माण के लिए सख्त दिशा-निर्देश लागू करने की भी मांग की.
नेपाल की त्रासदी के बाद तीनों विशेषज्ञों ने जम्मू-कश्मीर सरकार से जलवायु जोखिम का आकलन कराने की अपील की. इसका उद्देश्य अधिक जोखिम वाले क्षेत्रों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की पहचान करना होगा.
प्रोफेसर रोमशू कहते हैं, "जब जलवायु परिवर्तन का असर अनियोजित विकास, बाढ़ के मैदानों पर अतिक्रमण और ढलानों में छेड़छाड़ के साथ मिलकर आपदाओं को बढ़ाता है तब हमें आपदा के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय आपदा से पहले जलवायु जोखिम प्रबंधन की ओर बढ़ना होगा. जोखिमों की पहले पहचान करनी होगी, शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को मजबूत करना होगा और आपदा आने से पहले उससे निपटने की क्षमता तैयार करनी होगी."
प्रोफेसर लोन ने कहा, "अध्ययन में जलवायु के अनुमान, खतरे के नक्शे, रिमोट सेंसिंग (दूर से पृथ्वी की सतह की निगरानी) और जमीनी निरीक्षण को शामिल किया जाना चाहिए. साथ ही भविष्य की आपदाओं को रोकने के लिए स्थान विशेष के आधार पर ऐसे उपाय बताए जाने चाहिए जिन पर अमल किया जा सके."
डॉ. पर्रे आखिर में यह भी कहते हैं, "आपदाओं को रोका नहीं जा सकता. लेकिन बेहतर तैयारी से उनके असर को कम किया जा सकता है और जान-माल बचाने में मदद मिल सकती है."