जयपुर मार्च के लिए करणी सेना ने टकराव की जगह शांत पदयात्रा क्यों चुनी?
UGC के नए नियमों के विरोध में निकली करणी सेना की पदयात्रा पुलिस कार्रवाई के बावजूद शांतिपूर्ण रही. इस बदले हुए तेवर को संगठन की नई राजनीतिक रणनीति और व्यापक जनसमर्थन जुटाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है

राजस्थान के बीकानेर जिले के देशनोक स्थित करणी माता मंदिर से जयपुर तक करणी सेना प्रमुख महिपाल सिंह मकराना की 800 किलोमीटर लंबी पदयात्रा संगठन के पारंपरिक आंदोलन के तरीके से बिल्कुल अलग नजर आई.
आमतौर पर टकराव वाले प्रदर्शनों के लिए पहचानी जाने वाली करणी सेना ने इस बार भीषण गर्मी और मानसून की बारिश के बीच शांतिपूर्ण पदयात्रा का रास्ता चुना. इसका उद्देश्य विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम, 2026' का विरोध करना था.
हालांकि, 21 जुलाई को शुरू हुई यह पदयात्रा 3 अगस्त को हिंसा के साथ खत्म हुई. आरोप है कि प्रदर्शनकारी सुरक्षा बैरिकेड तोड़कर कलेक्ट्रेट की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे थे जिसके बाद पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज किया और पानी की बौछारें छोड़ीं.
प्रदर्शनकारी देवराज सिंह पलारा की मौत ने इस घटनाक्रम को राजनीतिक रूप से और संवेदनशील बना दिया. पलारा के परिवार और करणी सेना का आरोप है कि पानी की तेज बौछार लगने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई थी.
हालांकि इस दावे की अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है. करणी सेना पलारा के परिवार को एक करोड़ रुपए का मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की मांग कर रही है. साथ ही चेतावनी दी है कि मांगें नहीं मानी गईं तो राजस्थान बंद किया जाएगा. दूसरी ओर, सरकार अब तक 21 लाख रुपए की सहायता और मौत की जांच का प्रस्ताव दे चुकी है.
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम की असली कहानी कहीं और है. क्या महिपाल मकराना खुद को राजपूत समाज के नए नेतृत्व के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं?
करणी सेना के पहले के आंदोलनों के विपरीत उनकी पदयात्रा पुलिस कार्रवाई के बावजूद पूरी तरह शांतिपूर्ण रही. न सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया और न ही पुलिस के खिलाफ जवाबी हिंसा हुई. इससे संकेत मिलता है कि मकराना टकराव के बजाय जनसमर्थन जुटाने की रणनीति अपना रहे हैं.
मकराना इस आंदोलन को केवल राजपूत पहचान तक सीमित रखने के बजाय उसका दायरा बढ़ाने की कोशिश भी करते दिख रहे हैं. वे UGC नियमों को अदालत में चुनौती देने के बजाय उन्हें पूरी तरह वापस लेने की मांग कर रहे हैं.
इस मांग का बचाव करते हुए उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, "हमारी चिंता पूरी तरह जायज है. UGC के ये प्रावधान यह मानकर चलते हैं कि सामान्य वर्ग के छात्र ही आक्रामक और उत्पीड़क हैं. हमें डर है कि अगर कोई SC/ST व्यक्ति किसी राजपूत के सामने शादी का प्रस्ताव रखे और उसे मना कर दिया जाए तो उस पर भी भेदभाव का आरोप लगाया जा सकता है."
'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने संबंधी विनियम' का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग और दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकना और सभी पक्षों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना है.
हालांकि, आलोचकों का आरोप है कि ये नियम सामान्य वर्ग के लोगों के खिलाफ पक्षपाती हैं. मकराना की यह दलील कानूनी रूप से कितनी टिकाऊ है, यह अलग सवाल है, लेकिन साफ है कि वे इसे केवल राजपूतों तक सीमित न रखकर पूरे सामान्य वर्ग के मुद्दे के रूप में पेश करना चाहते हैं.
एक और मुद्दा जिसे मकराना ने उठाया है, वह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) का आरक्षण है. समता आंदोलन के कार्यकारी अध्यक्ष योगेंद्र सिंह राठौड़ के साथ मिलकर वह चाहते हैं कि राजस्थान में EWS के लिए भूमि स्वामित्व की पात्रता राज्य के OBC मानकों के अनुरूप तय की जाए.
पश्चिमी राजस्थान में कई परिवारों के पास बड़ी जमीन तो है, लेकिन उसकी उत्पादकता बहुत कम है. ऐसे में आय कम होने के बावजूद वे EWS आरक्षण के दायरे से बाहर रह जाते हैं.
राठौड़ का अनुभव इस आंदोलन के सामने मौजूद वास्तविक चुनौती भी दिखाता है. वर्षों तक समता आंदोलन ने आरक्षण सुधार और OBC के उप-वर्गीकरण के मुद्दे पर विभिन्न समुदायों को एकजुट करने की कोशिश की.
लंबे अभियान और उप-वर्गीकरण के पक्ष में अदालतों की टिप्पणियों के बावजूद यह आंदोलन सामाजिक समर्थन को राजनीतिक प्रभाव में बदलने में सफल नहीं हो सका.
अगर मकराना सामान्य वर्ग की विभिन्न जातियों को साथ लेकर व्यापक गठबंधन बनाना चाहते हैं तो उनके सामने भी यही चुनौती है. उनका उभार इस बात का भी संकेत है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के स्थापित राजपूत नेताओं को लेकर समाज में असंतोष बढ़ रहा है. सोशल मीडिया पर कई राजपूत आवाजें वरिष्ठ नेताओं पर वंशवादी राजनीति करने और समाज की चिंताओं की अनदेखी करने का आरोप लगा रही हैं.
समाज में इस बात को लेकर भी खास नाराजगी है कि पहली बार BJP विधायक बने देवी सिंह शेखावत और अंशुमान सिंह भाटी जैसे उभरते नेताओं, जिनकी अपने-अपने क्षेत्रों में अच्छी पकड़ मानी जाती है, को टिकट वितरण और चुनाव प्रचार के दौरान कथित तौर पर प्रभावशाली राजपूत नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ा.
समाज के कई लोग इसे इस बात के प्रमाण के रूप में देखते हैं कि स्थापित राजपूत नेता नई पीढ़ी को आगे बढ़ने का मौका नहीं देना चाहते.
करणी सेना के सामने एक और कमी भी है. उसके पास शिक्षित, बौद्धिक और प्रभावशाली चेहरों की मजबूत दूसरी पंक्ति नहीं है. अगर वह केवल एक जातीय संगठन से आगे बढ़कर सामान्य वर्ग के व्यापक हितों का प्रतिनिधित्व करने वाला आंदोलन बनना चाहती है, तो इसकी जरूरत होगी.
कई युवा राजपूत खुद को जातीय आरक्षण व्यवस्था का सबसे बड़ा पीड़ित मानते हैं. पारंपरिक रूप से सेना में भर्ती को प्राथमिकता देने के बावजूद अब उनकी सैनिक के रूप में चयन की हिस्सेदारी भी घटती जा रही है.
प्रशासनिक सेवाओं में भी उनके अवसर कम हुए हैं. इसकी एक वजह यह भी मानी जाती है कि जाट समुदाय की तरह बड़ी संख्या में युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर उतना ध्यान नहीं दे रहे. बदलते समय की जरूरतों के मुताबिक सोच और रणनीति का भी अभाव दिखता है.
शायद यही कारण था कि 2017 में आनंदपाल सिंह की कथित मुठभेड़ में मौत के बाद बड़ी संख्या में राजपूत सड़कों पर उतर आए थे. आनंदपाल एक रावणा राजपूत गैंगस्टर था, जिसकी छवि कई लोगों के बीच 'रॉबिन हुड' जैसी थी और जिसे जाट प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले के रूप में देखा जाता था.
यही असंतोष मकराना के लिए अवसर पैदा करता है. लेकिन भावनात्मक समर्थन को राजनीतिक ताकत में बदलने के लिए सफल आंदोलनों से कहीं अधिक की जरूरत होगी. राजपूत लंबे समय से BJP के सबसे भरोसेमंद वोट बैंक में रहे हैं.
जब तक मकराना UGC नियमों और EWS जैसे मुद्दों पर सामान्य वर्ग के दूसरे समुदायों तक अपनी पहुंच नहीं बढ़ा पाते, तब तक उनका प्रभाव प्रतीकात्मक सड़क राजनीति तक ही सीमित रह सकता है.
फिर भी जयपुर तक निकली यह पदयात्रा एक नए राजनीतिक खिलाड़ी के आगमन का संकेत जरूर दे चुकी है. यह आगे चलकर व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप लेती है या फिर केवल एक और जातीय लामबंदी बनकर रह जाती है, इसका जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि नारों के शांत पड़ जाने के बाद आगे क्या होता है.