कर्नाटक में SIR के बाद एक करोड़ नाम बाहर, वोटर लिस्ट पर क्यों उठे सवाल?
कर्नाटक में SIR के बाद मतदाताओं की संख्या करीब 18 फीसदी घटी है जबकि बेंगलुरु में यह गिरावट 43 फीसदी रही

जिन राज्यों में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, उनमें कर्नाटक की वोटर लिस्ट में सबसे ज्यादा कटौती देखी गई है. फाइनल वोटर लिस्ट जारी होने के बाद राज्य में मतदाताओं की संख्या घटकर 4.55 करोड़ रह गई है. जून में SIR की प्रक्रिया शुरू होने से पहले राज्य में 5.543 करोड़ मतदाता थे. इस तरह मतदाताओं की संख्या में करीब 18 फीसदी की कमी आई है.
सबसे बड़ा बदलाव बेंगलुरु शहर में हुआ है. यहां अब चार चुनावी जिलों में कुल 59 लाख मतदाता हैं जबकि SIR से पहले यह संख्या 1.03 करोड़ थी. इसका मतलब है कि शहर में मतदाताओं की संख्या 43 फीसदी घट गई है.
चुनाव आयोग (EC) के मुताबिक, कर्नाटक की कुल आबादी 6.875 करोड़ होने का अनुमान है. इस हिसाब से आबादी के मुकाबले मतदाताओं का अनुपात 66.11 है. आयोग ने कहा कि यह तय मानकों के दायरे में है.
कर्नाटक में SIR की प्रक्रिया 30 जून को शुरू हुई थी. इसके तहत मतदाताओं को घर-घर जाकर एन्यूमरेशन फॉर्म (गणना प्रपत्र) बांटे गए ताकि वे 2002 में हुई पिछली SIR की वोटर लिस्ट से अपना मिलान कर सकें. इसके बाद 24 अगस्त को ड्राफ्ट वोटर लिस्ट जारी की गई. इस लिस्ट में 4.463 करोड़ मतदाता थे जबकि 1.079 करोड़ लोगों के नाम इसमें शामिल नहीं थे. इन लोगों को अनुपस्थित, दूसरी जगह जा चुके, मृत या डुप्लीकेट (यानी जिनका नाम पहले से वोटर लिस्ट में दर्ज है) जैसी श्रेणियों में रखा गया था.
वोटर लिस्ट में बदलाव की यह प्रक्रिया 27 अक्टूबर को पूरी हुई लेकिन इस दौरान कई विवाद भी हुए. सामाजिक संगठनों ने बड़ी संख्या में लोगों को अनुपस्थित या दूसरी जगह जा चुका बताकर सूची से बाहर रखने पर सवाल उठाए. वहीं मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व वाली सत्ताधारी कांग्रेस ने फॉर्म 7 के गलत इस्तेमाल की आशंका को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था. इस फॉर्म के जरिए वोटर लिस्ट से नाम हटाने की मांग की जा सकती है.
कांग्रेस ने दावा किया था कि दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अवधि के आखिरी कुछ दिनों में बड़ी संख्या में फॉर्म 7 जमा किए गए. पार्टी को शक था कि अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और पिछड़े वर्गों के पात्र मतदाताओं को चुनकर निशाना बनाने की कोशिश की जा रही है.
मुख्य निर्वाचन अधिकारी वी. अनबुकुमार ने 27 अक्टूबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि फॉर्म 7 के आवेदन बड़े पैमाने पर एक साथ तैयार नहीं किए गए थे. फॉर्म 7 के तहत नाम हटाने के लिए कुल 2,29,235 आवेदन मिले थे और ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से 1,88,324 नाम हटाए गए. इनमें सबसे ज्यादा 1,24,327 नाम उन लोगों के थे जो स्थाई रूप से दूसरी जगह चले गए थे. वहीं सुनवाई के दौरान 61,960 लोगों को वोटर बनने के अयोग्य पाया गया.
सूत्रों के मुताबिक, वोटर लिस्ट से हटाए गए विदेशी नागरिकों की संख्या एक हजार से कम थी. इनमें से 583 लोग अकेले बेंगलुरु उत्तर जिले में मिले, जिनमें ज्यादातर नेपाली नागरिक थे. विदेशी नागरिक बताकर अयोग्य लोगों की सूची में ऐसे लोग भी शामिल थे जिन्होंने दूसरे देशों की नागरिकता ले ली थी लेकिन उनके नाम अब भी वोटर लिस्ट में दर्ज थे.
अगस्त-सितंबर के दौरान दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अवधि में ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल 43.8 लाख मतदाताओं को नोटिस भेजे गए. इसकी वजह यह थी कि या तो उन्होंने पिछली वोटर लिस्ट से अपना मिलान नहीं किया था या उनके नाम में अंतर जैसी गड़बड़ियां थीं.
मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक, दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अवधि के दौरान 10 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट में जोड़े गए. फाइनल वोटर लिस्ट में ड्राफ्ट लिस्ट के मुकाबले 8,19,714 मतदाता बढ़े.
कर्नाटक की फाइनल वोटर लिस्ट में शामिल 4.55 करोड़ मतदाताओं में से पांचवां हिस्सा 30-39 साल की उम्र के लोगों का है. इस आयु वर्ग में 1.025 करोड़ मतदाता हैं. इसके बाद 40-49 साल की उम्र के मतदाताओं की संख्या सबसे ज्यादा है. इस वर्ग में 94.1 लाख मतदाता हैं. वहीं 18-19 साल के युवा मतदाताओं की संख्या 6,83,364 है.