कामाख्या मंदिर में करोड़ों का चढ़ावा लेकिन हिसाब-किताब अब भी पुराने ढर्रे पर

कामाख्या मंदिर में हिसाब-किताब रखने का तरीका बताता है कि यह व्यवस्था अब पुरानी पड़ चुकी है और इसे मंदिर से जुड़े लोग भी मानते हैं

कामाख्या मंदिर

सामान्य दिनों में हर दिन 6,000 से 7,000 श्रद्धालु गुवाहाटी की नीलाचल पहाड़ियों पर स्थित देश के सबसे पूजनीय शक्ति पीठों में से एक कामाख्या मंदिर में देवी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं. शनिवार-रविवार को यह संख्या लगभग दोगुनी होकर 12,000 तक पहुंच जाती है.

त्योहारों या शुभ मौकों पर श्रद्धालुओं की संख्या 30,000 से 35,000 तक हो जाती है. इस साल 1 जनवरी को मंदिर में एक ही दिन में करीब 50,000 श्रद्धालु पहुंचे थे. वहीं मंदिर के सबसे बड़े उत्सव अंबुबाची मेले के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु आते हैं.

इन सभी श्रद्धालुओं के साथ आर्थिक गतिविधियां भी जुड़ी होती हैं. दानपात्रों में चढ़ावा, गर्भगृह में नकद दान, देवी को चढ़ाए गए सोने-चांदी के आभूषण और ऐसे धार्मिक संस्थान के भोजन, आवास तथा संचालन का रोज का खर्च, जो लगभग कभी बंद नहीं होता.

लेकिन कामाख्या मंदिर में इतनी बड़ी रकम आने के बावजूद इससे जुड़ी वित्तीय व्यवस्था अब भी काफी हद तक अनौपचारिक है. मंदिर से जुड़े लोग भी इसे स्वीकार करते हैं. इसे समझना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी की जांच जारी है. जांचकर्ताओं का अनुमान है कि श्रद्धालुओं के चढ़ावे में से करीब 7.9 करोड़ रुपए की हेराफेरी की गई.

कामाख्या मंदिर की वित्तीय व्यवस्था को समझने के लिए दो अलग-अलग स्रोतों को अलग करना जरूरी है, जिन्हें अक्सर सार्वजनिक चर्चा में एक ही मान लिया जाता है. पहला, मंदिर की अपनी आय. इसमें श्रद्धालुओं का चढ़ावा, दान और 501 रुपए की विशेष दर्शन फीस शामिल है. यह रकम सीधे श्रद्धालुओं से आती है. यह पैसा SBI में जमा किया जाता है.

हालांकि मंदिर में नकद के रूप में मिलने वाले चढ़ावे का तरीका अलग है. इसे एकत्र किया जाता है, गिना जाता है और इसका रिकॉर्ड बारदोलोई यानी मुख्य पुजारी और उनकी टीम रखती है. देवी को चढ़ाए गए सोने, अन्य कीमती धातुओं और वस्तुओं को मंदिर के पारंपरिक भंडारघर भराल में नामित अधिकारियों की निगरानी में रखा जाता है.

मंदिर के नियमित खर्च भी काफी बड़े हैं. कामाख्या मंदिर में करीब 500 लोग काम करते हैं और सभी को हर महीने वेतन दिया जाता है. इसके अलावा बिजली का बिल, नियमित रखरखाव और भवनों व अन्य ढांचों की मरम्मत का खर्च भी मंदिर उठाता है. श्रद्धालुओं की संख्या चाहे जितनी हो, ये खर्च लगातार चलते रहते हैं.

हिसाब-किताब रखने का तरीका बताता है कि यह व्यवस्था अब पुरानी पड़ चुकी है. अकाउंटेंट करीब हर छह महीने में ऑडिट करते हैं लेकिन यह कोई संस्थागत व्यवस्था नहीं है. यह जरूरत के हिसाब से चलने वाली प्रणाली है. मंदिर का कोई सार्वजनिक वार्षिक ऑडिट उपलब्ध नहीं है. न ही कोई वित्तीय डैशबोर्ड है और न ही दान की कुल राशि या खर्च के मदों की नियमित जानकारी सार्वजनिक की जाती है.

कोई भी शोधकर्ता मंदिर के आसपास सरकार की ओर से चलाए जा रहे विकास कार्यों की लागत का पता आसानी से लगा सकता है. लेकिन यह जानना आसान नहीं है कि मंदिर खुद एक साल में कितना दान जुटाता है और कितना खर्च करता है. सरकारी धन की अपेक्षाकृत पारदर्शिता और मंदिर की अपनी आय की अपारदर्शिता के बीच का यही अंतर कामाख्या की वित्तीय व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता है.

इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में बोरदोलोई कबिंद्र प्रसाद शर्मा हैं. वे मंदिर की कार्यकारी समिति के सबसे वरिष्ठ पदाधिकारी हैं. वे पैसे की आवाजाही को सीधे शब्दों में समझाते हैं. उनके मुताबिक, जो श्रद्धालु मंदिर के प्रबंधन, धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और अन्य गतिविधियों के लिए योगदान देना चाहते हैं, वे सीधे मंदिर के आधिकारिक बैंक खाते में पैसा जमा कर सकते हैं. शर्मा कहते हैं, "मंदिर के बैंक खाते की जानकारी आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है. इसकी संबंधित बैंक से भी स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जा सकती है." उनका कहना है कि दान देने का सत्यापित तरीका SBI के जरिए ही है.

रोज मिलने वाले चढ़ावे के बारे में भी उनका जवाब प्रक्रिया पर आधारित है. वह कहते हैं, "रोज आने वाले श्रद्धालुओं से मिलने वाला दान स्थापित धार्मिक प्रक्रिया के तहत मंदिर ट्रस्ट की निगरानी में एकत्र किया जाता है. इसके बाद इसे मंदिर के बैंक खाते में जमा किया जाता है. मंदिर समिति जरूरत के अनुसार रखरखाव, विकास कार्यों और कर्मचारियों के वेतन के लिए इस खाते से पैसा निकालती है."

यह पैसा खर्च कहां होता है? शर्मा के मुताबिक, बैंक में जमा धन का उपयोग पूजा-पाठ, धार्मिक अनुष्ठानों, मंदिर की मरम्मत और रखरखाव, पूजा सामग्री की खरीद, वार्षिक अनुष्ठानों, सुरक्षा व्यवस्था, बीमा और अन्य संचालन संबंधी जरूरतों पर किया जाता है. उनका यह भी कहना है कि मंदिर कानूनी नियमों की अनदेखी नहीं करता. उनके मुताबिक, "हर साल वित्तीय गणना की जाती है और लागू आयकर देनदारियों का भुगतान तय समयसीमा के भीतर कर दिया जाता है."

यह आंतरिक आर्थिक व्यवस्था केवल कार्यकारी समिति नहीं चलाती. कामाख्या मंदिर का प्रशासन पारंपरिक सेवा व्यवस्था के तहत अलग-अलग समूहों में बंटा हुआ है और हर समूह की अपनी स्पष्ट जिम्मेदारी है. भराली मंदिर का हिसाब-किताब रखते हैं और खर्च का रिकॉर्ड संभालते हैं. भरालकंठ भंडार यानी गोदाम का संचालन करते हैं. सोनारी आभूषणों की देखरेख करते हैं. वहीं अन्य शेबैत समूह चढ़ावे, भोग, प्रवेश व्यवस्था और धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़ी व्यवस्थाएं संभालते हैं.

इस व्यवस्था को कानूनी मान्यता भी मिली हुई है. 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने बोरदेउरी समाज और उसके निर्वाचित दोलोई को मंदिर के धार्मिक और प्रशासनिक दोनों मामलों के प्रबंधन का पारंपरिक अधिकार बरकरार रखा था. अदालत ने कामाख्या देबुत्तर रेगुलेशन, के तहत किए गए अधिकार के दावे को खारिज कर दिया था.

इसी स्थिर व्यवस्था के बीच अब एक नई चिंता सामने आने लगी है. यह चिंता ईमानदारी से ज्यादा इस बात को लेकर है कि अधिकार किस तरह केंद्रित हो गए हैं. मंदिर के मामलों से परिचित एक व्यक्ति कहते हैं, "पहले जनरल बॉडी लोकतांत्रिक तरीके से काम करती थी. लेकिन हाल के समय में बहुत ज्यादा अधिकार बोरदोलोई के हाथों में केंद्रित हो गए हैं. यह मंदिर के संचालन के लिए अच्छा नहीं है क्योंकि इतने बड़े संस्थान अनौपचारिक व्यवस्था के भरोसे नहीं चल सकते."

मुद्दा पूरी व्यवस्था का है. करोड़ों रुपए के चढ़ावे और 500 कर्मचारियों के वेतन का प्रबंधन करने वाला संस्थान अनिश्चित समय तक अनौपचारिक व्यवस्था और कुछ लोगों के विवेक पर निर्भर नहीं रह सकता. हालांकि मौजूदा समिति पर वित्तीय गड़बड़ी का कोई आरोप नहीं लगाया गया है.

कामाख्या मंदिर से जुड़ा विवाद पुराने दौर का है. प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मंदिर के भंग किए जा चुके प्रशासक मंडल के तीन पूर्व अधिकारियों के घरों पर छापेमारी की थी. उन पर मंदिर की निधि में से 7 करोड़ रुपए से अधिक की कथित हेराफेरी की जांच चल रही थी. यह कार्रवाई उन अधिकारियों के खिलाफ सीआईडी (CID) द्वारा दर्ज मामले के बाद की गई थी.

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