राज्य के दर्जे पर प्रस्ताव, अनुच्छेद 370 से परहेज! क्या है उमर अब्दुल्ला की रणनीति?
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में राज्य का दर्जा बहाल करने का प्रस्ताव लाकर उमर अब्दुल्ला ने केंद्र को संदेश देने की कोशिश की. प्रस्ताव में अनुच्छेद 370 और 35A को शामिल करने की मांग से दूरी रखते हुए उन्होंने स्वायत्तता से जुड़े पुराने प्रस्तावों का भी हवाला दिया

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला (फाइल फोटो)
यह विधानसभा में नाटक सरीखा एक घटनाक्रम था. इसके जरिए जम्मू-कश्मीर की विधानसभा अपनी बात नई दिल्ली तक पहुंचाना चाहती थी. राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर जम्मू-कश्मीर में व्यापक सहमति है. ऐसे में इस प्रस्ताव के जरिए केंद्र तक यह संदेश पहुंचाने की कोशिश की गई कि राज्य का दर्जा बहाल करने का मुद्दा वहां के राजनीतिक दलों और लोगों के लिए कितना अहम है.
इसलिए जब 28 सितंबर को विधानसभा ने ‘पूर्ण राज्य का दर्जा तत्काल और जल्द बहाल करने’ की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया तो यह राजनीतिक टकराव वाला कदम नहीं था. 2019 में जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने और उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटे जाने के बाद से केंद्र सरकार भी कई बार कह चुकी है कि केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा अस्थाई है. उसने राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा भी किया है जिसे ‘उचित समय’ पर पूरा किया जाना है.
फिर मुख्य सचिव और कानून सचिव ने बहस से पहले ही विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर उमर अब्दुल्ला के प्रस्ताव को सदन में पेश न करने की सलाह क्यों दी? दरअसल, प्रस्ताव की भाषा भले ही संयमित थी लेकिन उसमें जम्मू-कश्मीर के इतिहास से जुड़े कुछ ऐसे संदर्भ थे जो राजनीतिक रूप से काफी अहम थे.
प्रस्ताव में विशेष दर्जा बहाल करने की स्पष्ट मांग नहीं की गई थी. लेकिन इसमें पहले पारित दो प्रस्तावों का जिक्र था. पहला नवंबर 2024 का प्रस्ताव था जिसे उमर अब्दुल्ला की सरकार बनने के तुरंत बाद लाया गया था. दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण प्रस्ताव 26 जून, 2000 को फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार के दौरान पारित किया गया था. यह जम्मू-कश्मीर को स्वायत्तता देने से जुड़ा प्रस्ताव था.
2000 के उस प्रस्ताव में 1999 में राज्य स्वायत्तता समिति की रिपोर्ट का समर्थन किया गया था. इस रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर को 1953 से पहले की स्थिति में लौटाने की मांग की गई थी. इसका मतलब था कि रक्षा, विदेश मामले, मुद्रा और संचार को छोड़कर शासन से जुड़े सभी विषयों पर जम्मू-कश्मीर का अधिकार बहाल किया जाए. 1952 के दिल्ली समझौते के आधार पर इसमें राज्यपाल का पदनाम बदलकर सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री का पदनाम बदलकर वजीर-ए-आजम करने का प्रस्ताव भी था.
यह एक संवेदनशील मुद्दा था. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. इसलिए उमर अब्दुल्ला ने इस मुद्दे को सावधानी से उठाया. उन्होंने पुराने प्रस्तावों का सिर्फ जिक्र किया उन मांगों पर नए सिरे से मतदान कराने की बात नहीं कही. मकसद बस इतना था कि उनकी गूंज सदन में सुनाई देती रहे.
अब स्वायत्तता मिलने की संभावना लगभग शून्य है तो फिर इस मुद्दे को उठाने का क्या मतलब है? कश्मीर केंद्रीय विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लीगल स्टडीज के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर शेख शौकत हुसैन कहते हैं, "नेशनल कॉन्फ्रेंस पर जनता के साथ-साथ पार्टी के भीतर से भी भारी दबाव है. सांसद रुहुल्लाह मेहदी जैसे नेता खुलकर असहमति जता रहे हैं."
राज्य का दर्जा बहाल होने का इंतजार बेहद लंबा हो चुका है. नई दिल्ली की ओर से कोई निश्चित समयसीमा न दिए जाने के कारण चुनावी वादा अब तक पूरा नहीं हुआ है. साथ ही उपराज्यपाल को अधिकार दिए जाने से नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार की शासन चलाने की क्षमता भी सीमित हो गई है. हुसैन के मुताबिक यह प्रस्ताव उस ‘लाचारी’ के खिलाफ एक प्रतीकात्मक विरोध है जिसमें सरकार के पास औपचारिक रूप से सत्ता तो है लेकिन उसका इस्तेमाल करने की क्षमता नहीं है.
उमर अब्दुल्ला ने इस प्रस्ताव को बेहद सावधानी से आगे बढ़ाया. उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस के कम से कम छह विधायकों के संशोधन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया. ये विधायक प्रस्ताव के पाठ में अनुच्छेद 370 और 35A को स्पष्ट रूप से शामिल करना चाहते थे. राजनीति विशेषज्ञ नूर अहमद बाबा कहते हैं, "प्रस्ताव की भाषा सावधानी से चुनी गई थी और स्वायत्तता का जिक्र भी अपेक्षाकृत नरम था. संभव है कि ऐसा गैर-बीजेपी दलों का समर्थन हासिल करने के लिए किया गया हो."
हुसैन के मुताबिक इस प्रस्ताव का एक प्रमुख मकसद उन आलोचकों को जवाब देना था जो नेशनल कॉन्फ्रेंस पर अपने वादों से पीछे हटने का आरोप लगा रहे थे. उनका मानना है कि उमर सरकार के दोनों प्रस्ताव नई दिल्ली के उस दावे को भी खारिज करते हैं कि विशेष दर्जा खत्म करने के लिए उसे विधानसभा की ‘सहमति’ हासिल थी.
बाबा मुख्य सचिव की इस कदम को रोकने की कोशिश को ‘नौकरशाही का अधिकार क्षेत्र से बाहर जाना’ बताते हैं. इस घटनाक्रम ने उमर अब्दुल्ला को केंद्र के खिलाफ विरोध का स्वर थोड़ा और तेज करने का मौका भी दिया. हुसैन के मुताबिक इसने "केंद्र शासित प्रदेश की विधानसभा की असली हैसियत" को उजागर किया. इसका मतलब यह था कि ऐसे मुद्दों पर फैसला लेने के लिए विधानसभा को "बहुत छोटा निकाय" समझा जा रहा था. इसलिए वे कहते हैं, "प्रस्ताव का पारित होना अपने आप में अधिकार फिर से जताने की एक प्रक्रिया बन गया."