जम्मू-कश्मीर : क्या डोगरा सीएम बनाने की मांग भाजपा के लिए तुरुप का इक्का है?

जम्मू नॉर्थ से भाजपा उम्मीदवार शाम लाल शर्मा ने 26 सितंबर को एक अपील में कहा कि "समय आ गया है कि जम्मू-कश्मीर के इतिहास में पहला डोगरा हिंदू मुख्यमंत्री बने"

जम्मू नॉर्थ से भाजपा उम्मीदवार शाम लाल शर्मा/एक्स
जम्मू नॉर्थ से भाजपा उम्मीदवार शाम लाल शर्मा/एक्स

"समय आ गया है कि जम्मू-कश्मीर के इतिहास में पहला डोगरा हिंदू मुख्यमंत्री बने, और यह काम केवल भाजपा ही कर सकती है." सितंबर की 26 तारीख को जब जम्मू नॉर्थ विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उम्मीदवार शाम लाल शर्मा एक सार्वजनिक बैठक में ये अपील कर रहे थे, तो उन्होंने एक उदाहरण के जरिए भी अपनी बात समझाने की कोशिश की.

उन्होंने 'अभी नहीं तो कभी नहीं' वाली स्थिति का जिक्र करते हुए कहा, "अगर महाराष्ट्र में एक मुस्लिम (एआर अंतुले) कम आबादी होने के बावजू़द मुख्यमंत्री बन सकता है, तो जम्मू-कश्मीर में एक हिंदू मुख्यमंत्री क्यों नहीं बन सकता? यहां हमारी आबादी 32 फीसद है." आइए अब यहां समझते हैं कि शर्मा की इस अपील के पीछे क्या कोई राजनीतिक मकसद भी है.

जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए तीसरे और अंतिम चरण का मतदान एक अक्तूबर को होना है. इसके लिए सात ज़िलों की 40 सीटों पर वोटिंग होनी है. इनमें से 24 जम्मू संभाग की ही हैं. मीडिया में छपीं ख़बरों के मुताबिक़, यह जम्मू के मैदानी इलाकों से हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने और उन्हें एकजुट करने का प्रयास है ताकि भाजपा जम्मू संभाग से अधिक से अधिक सीटें जीत सके, और सरकार गठन में अपनी बात रखने की स्थिति में आ सके.

इस पूरे केंद्रशासित प्रदेश में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से जम्मू में कुल 43 हैं, बाकी 47 कश्मीर घाटी में हैं. 2011 की जनगणना के मुताबिक़, जम्मू-कश्मीर में 68.8 फीसद मुस्लिम हैं, जिनमें से ज्यादातर कश्मीर घाटी में बसे हुए हैं. और यहां 28.8 फीसद हिंदू हैं, जिनमें से अधिकतर जम्मू इलाके में रहते हैं.

इसके अलावा भाजपा नेता की यह अपील हिंदू डोगरा समुदाय की उस समय की यादों को भी सामने लाती है, जब 1846 से 1947 तक करीब सौ सालों तक उन्होंने जम्मू और कश्मीर की तत्कालीन रियासत पर अधिकार जमाए रखा था. महाराजा हरि सिंह के 1947 में भारत में विलय के प्रस्ताव के स्वीकार के साथ यहां डोगरा शासन का अंत हुआ, और बाद में 'विशेष दर्जे' के साथ यहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल हुई.

हालांकि यहां एक सवाल और नमूदार होता है कि क्या यह पहली बार है जब किसी उम्मीदवार को जम्मू से मुख्यमंत्री बनाने की मांग उठी है? इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2002 के राज्य विधानसभा चुनावों में त्रिशंकु जनादेश आया था. उस समय राज्य में कुल 87 विधानसभा सीटें थीं. उस चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) की सीटें 57 से घटकर 28 पर आ गई थीं, वहीं कांग्रेस ने 20 सीटें जीतीं. पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) को 16 सीटों पर जीत मिली थी. इसके अलावा पैंथर्स पार्टी, सीपीआई (एम) और कुछ निर्दलीय विधायकों के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनी.

लेकिन यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने में विफल रही. राज्य में अगला चुनाव 2008 में हुआ. इसमें भी जनादेश त्रिशंकु ही आया, जिसका नतीजा ये हुआ कि एनसी और कांग्रेस को चुनाव के बाद गठबंधन बनाकर सरकार बनानी पड़ी. बहरहाल, घाटी में राजनीतिक ताकतों में लगातार विभाजन के साथ ही जम्मू के राजनेताओं को यह विश्वास होने लगा कि मैदानी इलाकों को अपना खुद का मुख्यमंत्री मिल सकता है.

2014 में हुए राज्य विधानसभा चुनावों की बात है. उस समय शाम लाल शर्मा अखनूर से कांग्रेस के विधायक हुआ करते थे. लेकिन इन चुनावों से पहले उन्होंने राज्य के कैबिनेट मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया, और आरोप लगाया कि जम्मू में लोक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग विभाग (अब जल शक्ति मंत्रालय) में दैनिक वेतनभोगियों के नियमितीकरण में भेदभाव किया जा रहा है. उन्होंने आरोप लगाया कि उन कर्मचारियों को सिर्फ 900-1,500 रुपये प्रति माह का भुगतान किया जाता था. इसके अलावा, उन्होंने दावा कि 1994 से नियमित किए गए 11,984 दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों में से केवल 855 जम्मू इलाके से थे.

बहरहाल, उस साल हुए चुनावों में भाजपा हिंदू वोटरों को एकजुट करने में कामयाब रही थी. पार्टी ने जम्मू से कुल 25 सीटें जीतीं, और पीडीपी के साथ गठबंधन कर सत्ता में आने का रास्ता साफ किया. इस बार के चुनाव में भी हिंदू बहुल जम्मू के मतदाताओं पर निर्भर भाजपा ने कहा है कि नई जम्मू-कश्मीर सरकार के गठन में जम्मू की भूमिका होनी चाहिए और अगर वह पूर्ण बहुमत हासिल करती है, तो चुने गए मुख्यमंत्री इसी क्षेत्र से होंगे. हालांकि, पार्टी ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि मुख्यमंत्री किस समुदाय से होगा.

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