इमरान मसूद और आशु मलिक का टकराव, सपा-कांग्रेस में खींचतान का ट्रेलर?

सहारनपुर में इमरान मसूद और आशु मलिक की तकरार ने पुरानी सियासी खींचतान फिर सामने ला दी है. 2027 से पहले यह टकराव सपा-कांग्रेस के रिश्तों और मुस्लिम नेतृत्व के समीकरणों के लिए अहम है

ashu malik and imran masood
सपा नेता आशु मलिक और कांग्रेस के इमरान मसूद

19 अगस्त की सहारनपुर विकास भवन की जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति (दिशा) बैठक में माहौल उस समय अचानक गरमा गया जब सहारनपुर देहात से सपा विधायक आशु मलिक बेहड़ा संदल गांव की सड़क और अधूरे नाले का मुद्दा उठाते हुए अधिकारियों से जवाब मांगने लगे. 

आशु मलिक का कहना था कि चार साल पहले बनी सड़क के साथ नाला अधूरा छोड़ दिया गया, जिससे खेतों और कब्रिस्तान में पानी जा रहा है. अधिकारी के जवाब से संतुष्ट न होने पर उनकी सांसद एवं दिशा समिति के अध्यक्ष इमरान मसूद से नोकझोंक शुरू हो गई. 

“जनता से जुड़े मुद्दे उठाए जाएंगे, हम यहां चाय-पकौड़ी खाने नहीं आए हैं”, आशु मलिक ने कहा. जवाब आया, “चाय-पकौड़ी कौन खिला रहा है? सबको बोलने का मौका मिलना चाहिए.” इसके बाद दोनों के बीच सवाल पूछने के तरीके, बैठक के संचालन और बोलने की बारी को लेकर करीब सात मिनट तक तकरार चलती रही. 

बैठक में मौजूद अधिकारी और दूसरे जनप्रतिनिधि इस नोकझोंक को देखते रहे. बाद में इमरान मसूद ने संबंधित अधिकारी को एक सप्ताह में पूरे मामले की बिंदुवार रिपोर्ट देने का निर्देश दिया. यानी बैठक खत्म होने तक मुद्दे का प्रशासनिक समाधान तलाशने की कोशिश हुई लेकिन राजनीतिक तौर पर पुरानी खींचतान फिर सतह पर आ गई. 

दोनों नेताओं ने बाद में इसे मामूली बात बताया, मगर जिस तरह से बहस हुई, उसने सहारनपुर की राजनीति में चल रही एक पुरानी लड़ाई की परतें फिर खोल दी हैं.

वह बैठक जिसमें दोनों नेताओं के बीच भिड़ंत हुई

चार साल का टकराव

आशु मलिक और इमरान मसूद के बीच मौजूदा तनातनी को सिर्फ एक बैठक में हुई बहस से समझना मुश्किल है. इसकी जड़ 2022 में है, जब विधानसभा चुनाव से पहले इमरान मसूद कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी में आए थे.

सहारनपुर की राजनीति में तब इमरान मसूद पश्चिमी यूपी के बड़े मुस्लिम नेताओं में गिने जाते थे. उनके सपा में आने से पार्टी के भीतर मुस्लिम नेतृत्व का समीकरण बदला. दूसरी तरफ आशु मलिक सपा में पहले से सक्रिय थे और सहारनपुर देहात सीट से टिकट के मजबूत दावेदार थे.

अखिलेश यादव ने आखिरकार सहारनपुर देहात से आशु मलिक को उम्मीदवार बनाया और वे चुनाव जीतकर विधायक बने. इसके बाद जुलाई 2022 में जिला पंचायत के वार्ड-43 के उपचुनाव ने दोनों के बीच मतभेद को सार्वजनिक कर दिया.

एक ही सीट पर दोनों खेमों ने अलग-अलग प्रत्याशी उतार दिए. इमरान मसूद के समर्थन से आशा लता मैदान में थीं, जबकि आशु मलिक खेमे ने अवनीश त्यागी का समर्थन किया. दोनों पक्षों ने खुलकर प्रचार किया और मामला सपा की अंदरूनी गुटबाजी के रूप में सामने आया.

इस चुनाव ने एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया था : सहारनपुर और पश्चिमी यूपी में सपा का प्रमुख मुस्लिम चेहरा कौन होगा? इमरान मसूद, जिनका सहारनपुर की राजनीति में लंबा प्रभाव रहा है, या आशु मलिक, जिन्हें अखिलेश यादव के भरोसेमंद नेताओं में गिना जाने लगा था?

इमरान ने उस समय आरोप लगाया था कि उन्हें राजनीतिक रूप से बेइज्जत और बर्बाद करने की साजिश की जा रही है. दिलचस्प यह है कि दोनों खेमों के प्रत्याशी चुनाव हार गए. लेकिन इस चुनाव ने दोनों नेताओं के बीच राजनीतिक अविश्वास की वह जमीन तैयार कर दी, जिस पर आने वाले वर्षों में विवाद और गहराता गया.

2022 विधानसभा चुनाव के बाद दोनों की राहें अलग हो गईं. इमरान मसूद सपा से अलग होकर बहुजन समाज पाटी (BSP) में गए और फिर कांग्रेस में लौट आए. 2024 के लोकसभा चुनाव में वह कांग्रेस के टिकट पर सहारनपुर से सांसद चुने गए. दूसरी ओर आशु मलिक सपा विधायक के रूप में सहारनपुर देहात में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करते रहे.

इस तरह एक ही जिले की राजनीति में दोनों की भूमिकाएं भी बदल गईं. इमरान संसद में कांग्रेस की आवाज बने तो आशु विधानसभा में सपा के प्रतिनिधि. यहीं से पुराना राजनीतिक मुकाबला एक नए रूप में सामने आया. अब सवाल सिर्फ यह नहीं था कि सहारनपुर में किस नेता का प्रभाव ज्यादा है, बल्कि यह भी था कि 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच संभावित गठबंधन के बावजूद दोनों अपने-अपने राजनीतिक क्षेत्र को कैसे सुरक्षित रखेंगे.

हर मोर्चे पर आमने-सामने

दोनों नेताओं की प्रतिद्वंद्विता सिर्फ सहारनपुर देहात विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रही. 2023 के नगर निकाय चुनाव के दौरान भी दोनों के बीच जुबानी जंग देखने को मिली. इमरान मसूद ने सहारनपुर मेयर पद के लिए अपने परिवार की खदीजा मसूद का समर्थन किया, जबकि आशु मलिक के भाई नूर हसन मलिक चुनाव मैदान में थे.

इस दौरान दोनों नेताओं ने एक-दूसरे पर सार्वजनिक टिप्पणियां कीं. हालांकि उस चुनाव का मैदान अलग था, लेकिन इससे यह साफ हुआ कि दोनों की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता व्यक्तिगत समर्थक समूहों और परिवार तक भी असर डाल रही थी.

सहारनपुर में नगर निकाय की राजनीति से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक अलग-अलग स्तरों पर दोनों के समर्थक आमने-सामने दिखाई देने लगे. 2024 में इमरान मसूद की लोकसभा चुनाव में जीत ने उनकी राजनीतिक ताकत फिर बढ़ा दी. कांग्रेस के टिकट पर जीतकर वे संसद पहुंचे तो सहारनपुर में उनकी हैसियत फिर एक बड़े जनप्रतिनिधि की हो गई.

उधर, आशु मलिक विधानसभा में सपा के विधायक थे और स्थानीय संगठन में उनकी पकड़ थी. यानी एक के पास लोकसभा का जनादेश था तो दूसरे के पास विधानसभा क्षेत्र का. यही दोहरी राजनीतिक हैसियत आगे चलकर टकराव का बड़ा कारण बनी.

मई 2025 में यह टकराव खुली राजनीतिक चुनौती में बदल गया. एक स्वास्थ्य शिविर को लेकर इमरान मसूद ने अधिकारियों से सवाल किया और आशु मलिक की भूमिका पर टिप्पणी की. वीडियो सामने आने के बाद आशु मलिक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इमरान मसूद पर तीखा हमला बोला. उन्होंने इमरान को BJP की 'स्लीपर सेल' तक कह दिया और चुनौती दी कि अगर उन्हें कोई राजनीतिक भ्रम है तो इस्तीफा देकर चुनाव मैदान में आएं.

यहीं से विवाद ने एक और महत्वपूर्ण मोड़ लिया. इमरान मसूद ने सहारनपुर देहात सीट से एमएलसी शाहनवाज खान को 2027 में चुनाव लड़ाने का ऐलान कर दिया. यह बयान सीधे आशु मलिक के राजनीतिक भविष्य से जुड़ा था. यानी 2022 में जिस विधानसभा सीट को लेकर राजनीतिक समीकरण बदले थे, वही सीट 2025 में दोनों नेताओं की प्रतिद्वंद्विता का केंद्र बन गई.

‘80-17’ से खुली सपा-कांग्रेस की बड़ी लड़ाई

इमरान मसूद और आशु मलिक की लड़ाई को सिर्फ दो नेताओं की व्यक्तिगत अदावत मानना इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि इसके पीछे सपा और कांग्रेस के बदलते रिश्तों की पूरी राजनीति मौजूद है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन किया.

सपा ने 37 और कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं. सहारनपुर से इमरान मसूद की जीत ने कांग्रेस को पश्चिमी यूपी में एक महत्वपूर्ण मुस्लिम चेहरा भी दिया. इसके बाद 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सीट बंटवारे की चर्चा शुरू हुई तो इमरान मसूद ने खुलकर कहा कि पिछला ‘80-17’ फॉर्मूला नहीं चलेगा.

उनका तर्क था कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 17 सीटें मिली थीं और विधानसभा की 403 सीटों के लिहाज से उसी अनुपात को दोहराना कांग्रेस के लिए स्वीकार्य नहीं होगा. उन्होंने कांग्रेस को किसी की 'बैसाखी' पर निर्भर नहीं बताया और सम्मानजनक समझौते की बात कही.

यह बयान सीधे सपा के नेतृत्व और अखिलेश यादव की रणनीति के लिए चुनौती के रूप में देखा गया. इमरान का संदेश था कि कांग्रेस को 2027 में ज्यादा राजनीतिक हिस्सेदारी चाहिए. दूसरी तरफ सपा के लिए सहारनपुर देहात जैसी सीटें महत्वपूर्ण हैं, जहां उसका विधायक पहले से मौजूद है. यहीं आशु मलिक और इमरान मसूद की व्यक्तिगत लड़ाई बड़े राजनीतिक संघर्ष से जुड़ जाती है.

आशु मलिक का राजनीतिक भविष्य सपा से जुड़ा है और इमरान मसूद कांग्रेस के भीतर अपना प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं. दोनों की राजनीतिक जरूरतें अलग हैं, लेकिन उनका चुनावी भूगोल एक ही है. मुस्लिम मतदाताओं के बीच प्रभाव को लेकर भी दोनों के रास्ते अलग दिखाई देते हैं.

इमरान मसूद सहारनपुर में लंबे समय से मुस्लिम राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं. आशु मलिक ने पिछले कुछ वर्षों में सपा के भीतर अपनी जगह मजबूत की है. इसलिए सवाल सिर्फ एक सीट का नहीं, बल्कि पश्चिमी यूपी में मुस्लिम नेतृत्व की अगली कतार का भी है.

दिशा बैठक की सात मिनट की बहस ने भले ही किसी प्रशासनिक योजना का फैसला नहीं बदला हो, लेकिन उसने एक राजनीतिक संदेश जरूर दिया है. सहारनपुर में इमरान मसूद और आशु मलिक की पुरानी सियासी अदावत अभी खत्म नहीं हुई है. 2027 का चुनाव करीब आने के साथ इसके और खुलने की संभावना ज्यादा है.

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