उत्तर प्रदेश : योगी सरकार कैसे उलझी 69,000 शिक्षकों की भर्ती में, आगे क्या होगा?
जनवरी 2019 में उत्तर प्रदेश में 69 हजार सहायक शिक्षक पदों के लिए परीक्षा हुई लेकिन अब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसके लिए नए सिरे से मेरिट सूची जारी करने का फैसला दिया है और इसके बाद योगी सरकार की चौतरफा किरकिरी हो रही है

सहायक शिक्षकों की भर्ती के मामले में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार चौतरफा घिरती लग रही है. इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने यूपी सरकार को 69,000 सहायक शिक्षकों की भर्ती मामले में सहायक शिक्षक भर्ती परीक्षा (एटीआरई), 2019 के आधार पर तीन महीने के भीतर एक नई चयन सूची तैयार करने और 2020 और 2022 में जारी की गई ऐसी दो सूचियों को नजरअंदाज करने का निर्देश दिया है.
न्यायमूर्ति एआर मसूदी और न्यायमूर्ति बृज राज सिंह की खंडपीठ ने 13 अगस्त को फैसला और आदेश पारित किया, जो 16 अगस्त को ऑनलाइन अपलोड किया गया. इसमें 13 मार्च, 2023 के एकल न्यायाधीश पीठ के फैसले को चुनौती देने वाले उम्मीदवारों की 91 विशेष अपीलों का निपटारा किया गया. कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद राज्य सरकार को कई सारे निर्देश दिए हैं.
प्रकरण की पृष्ठभूमि जानने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं जब यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार थी. तब वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए 1 लाख 37 हजार शिक्षामित्रों को सहायक शिक्षक के रूप में समायोजित कर दिया गया था. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा और समायोजन को रद्द कर दिया गया. यानी अखिलेश सरकार ने जिन शिक्षामित्रों को सहायक शिक्षक बना दिया था, वे फिर से शिक्षामित्र बन गए. इस दौरान यूपी में वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार आ गई. सुप्रीम कोर्ट ने 1 लाख 37 हजार पदों पर भर्ती का आदेश योगी सरकार को दिया.
राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि हम एक साथ इतने पद नहीं भर सकते. फिर सुप्रीम कोर्ट ने दो चरण में सभी पदों को भरने का आदेश दिया. इस आदेश के बाद यूपी सरकार ने 2018 में पहले 68500 पदों के लिए वैकेंसी निकाली. इसके बाद दूसरे चरण में सहायक शिक्षकों के 69000 पदों पर भर्ती के लिए कार्यवाही शुरू की.
बेसिक शिक्षा विभाग के एक सेवानिवृत्त अधिकारी बताते हैं, “69 हजार सहायक शिक्षक पदों के लिए निकली इस भर्ती की परीक्षा 6 जनवरी 2019 को हुई. इसके लिए अनारक्षित की कटऑफ 67.11 फीसदी और ओबीसी की कटऑफ 66.73 फीसदी थी. इस भर्ती के तहत करीब 68 हजार लोगों को नौकरी मिली.”
आरक्षण बना विवाद का मुद्दा
लेकिन यहीं से यह सवाल उठा कि 69 हजार भर्ती में आरक्षण नियमों को लेकर अनदेखी की गई. बेसिक शिक्षा नियमावली-1981 का पालन सही से नहीं किया गया. भर्ती के अभ्यर्थी जो इस विरोध के साथ आंदोलन के लिए सड़क पर उतरे, उनका कहना था कि इस नियमावली में साफ है कि कोई ओबीसी वर्ग का अभ्यर्थी अगर अनारक्षित श्रेणी के कटऑफ से अधिक नंबर पाता है तो उसे ओबीसी कोटे से नहीं बल्कि अनारक्षित श्रेणी में नौकरी मिलेगी. यानी वह आरक्षण के दायरे में नहीं गिना जाएगा. इसके बाद से 69 हजार शिक्षक भर्ती का पेच उलझ गया.
आंदोलनरत अभ्यर्थियों ने दावा किया कि 69 हजार शिक्षक भर्ती में ओबीसी वर्ग को 27% की जगह मात्र 3.86% आरक्षण मिला यानी ओबीसी वर्ग को 18,598 सीट में से मात्र 2637 सीट मिलीं. जबकि सरकार का कहना था कि करीब 31 हजार ओबीसी वर्ग के लोगों की नियुक्ति की गई. सरकार के इस बयान पर अभ्यर्थियों ने बेसिक शिक्षा नियमावली 1981 का तथा आरक्षण नियमावली 1994 का हवाला देते हुए कहा कि ओबीसी वर्ग के जिन 31 हजार लोगों को नियुक्ति दी गई है, उनमें से करीब 29 हजार अनारक्षित कोटे से सीट पाने के हकदार थे. इसके बाद बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों ने लखनऊ के इको गार्डन में धरना प्रदर्शन शुरू किया. अभ्यर्थियों की मांग थी कि 29 हजार ओबीसी वर्ग के लोगों को आरक्षण के दायरे में जोड़ना ही नहीं चाहिए.
मामला हाईकोर्ट के साथ राष्ट्रीय ओबीसी आयोग में भी गया. जुलाई 2020 में, शिकायतकर्ता उम्मीदवारों ने राष्ट्रीय ओबीसी आयोग से संपर्क किया, जिसने मामले की जांच की और सीटों के आवंटन में विसंगतियों की पहचान की थी. आयोग के निष्कर्षों के बाद, यूपी सरकार ने अप्रैल 2021 में फिर से मामले की समीक्षा की और कहा कि सुधारात्मक उपाय लागू किए जाएंगे. वर्ष 2021 में, योगी सरकार ने आरक्षण में विसंगति को स्वीकार किया. 23 दिसंबर, 2021 को, यूपी विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 69,000 शिक्षकों की भर्ती में ‘आरक्षण घोटाले’ को लेकर विरोध कर रहे छात्रों से मुलाकात की.
एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने माना कि ‘आरक्षण में विसंगति’ थी और उन्होंने बेसिक शिक्षा विभाग को ‘समस्या का त्वरित और निष्पक्ष समाधान खोजने’ का निर्देश दिया है. 24 दिसंबर, 2021 को तत्कालीन बेसिक शिक्षा मंत्री सतीश द्विवेदी ने मीडिया को बताया था कि आरक्षण प्रक्रिया को लागू करने में कुछ विसंगतियां थीं और अभ्यर्थियों की शिकायत थी कि जिन लोगों के नाम चयन सूची में होने चाहिए थे, उनके नाम सूची में नहीं हैं.
द्विवेदी का कहना था कि प्रक्रिया का अध्ययन करने के बाद पाया गया कि आरक्षित वर्ग के कुछ अभ्यर्थी प्रभावित हुए हैं और राज्य शिक्षा विभाग ने निर्णय लिया है कि आरक्षित वर्ग के प्रभावित अभ्यर्थियों की भर्ती की जाएगी. 2 जनवरी, 2022 को, हाईकोर्ट की एकल न्यायाधीश पीठ ने 6,800 उम्मीदवारों के चयन पर रोक लगा दी, यह पूछते हुए कि सरकार इन उम्मीदवारों को किन पदों पर नियुक्त करेगी, जब 69,000 पद पहले ही भरे जा चुके हैं. 8 जनवरी 2022 को चुनाव आयोग ने राज्य में विधानसभा चुनाव की घोषणा कर दी और आचार संहिता के मद्देनजर प्रक्रिया रोक दी गई.
मार्च 2023, में, हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि शिक्षक भर्ती के लिए परीक्षा प्रक्रिया के दौरान आरक्षण में अनियमितताएं थीं. अदालत ने राज्य को 69,000 उम्मीदवारों की प्रारंभिक सूची को रद्द करने और तीन महीने के भीतर एक नई सूची तैयार करने का निर्देश दिया. सरकार ने नई सूची प्रस्तुत करने में कोई रुचि नहीं दिखाई. इसके विरोध में अभ्यर्थियों का लखनऊ के इको गार्डन में धरना प्रदर्शन जारी रहा.
सरकार का रुख पलटा और हाई कोर्ट ने क्या-क्या कहा
अभ्यर्थियों को झटका तब लगा जब उत्तर प्रदेश में 69,000 सहायक शिक्षकों की भर्ती के लिए आरक्षण प्रक्रिया में ‘अनियमितताओं’ को स्वीकार करने और ‘सुधारात्मक उपाय’ के रूप में अतिरिक्त 6,800 आरक्षित उम्मीदवारों का चयन करने के निर्णय के करीब ढाई साल बाद प्रदेश सरकार का रुख बदल गया. 29 जुलाई को लखनऊ में भाजपा के प्रदेश ओबीसी मोर्चा की कार्यकारिणी बैठक में सीएम योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि आरक्षित वर्ग के छात्रों को कोई नुकसान नहीं हुआ और आरक्षण नीति में निर्धारित सीमा से ज़्यादा ओबीसी छात्रों की भर्ती की गई. उन्होंने कहा, "69,000 शिक्षकों की भर्ती पर सवाल उठ रहे हैं. ये लोग समाजवादी पार्टी के वही मोहरे हैं, जिन्होंने 86 में से 56 पदों पर एक ही परिवार और एक खास जाति के लोगों को भर दिया था. वही लोग आज सवाल उठा रहे हैं. अगर 69,000 शिक्षकों की भर्ती में आरक्षण के हिसाब से 27 प्रतिशत ओबीसी की भर्ती होती, तो 18,200 की भर्ती होती...लेकिन 31,500 युवाओं की भर्ती की गई. उन्हें इस बात की चिंता है."
अब इलाहाबाद हाईकोर्ट का ताजा निर्णय आरक्षण के मुद्दे पर यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार के रुख के स्पष्ट विरोध में आया है. निर्णय के मुताबिक अब राज्य सरकार सेवा नियमावली, 1981 के अनुसार एटीआरई-2019 के आधार पर सहायक अध्यापकों के रूप में नियुक्ति के लिए 69,000 अभ्यर्थियों की चयन सूची नए सिरे से तैयार करेगी. कोर्ट निर्देश दिया, "अगर आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार सामान्य श्रेणी के लिए निर्धारित योग्यता के बराबर योग्यता प्राप्त करता है, तो मेधावी आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार को आरक्षण अधिनियम, 1994 की धारा 3 (6) में निहित प्रावधानों के अनुसार सामान्य श्रेणी में स्थानांतरित कर दिया जाएगा."
कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि नियुक्ति के लिए नई सूची तैयार करते समय यदि कोई कार्यरत अभ्यर्थी राज्य सरकार/सक्षम प्राधिकारी की कार्रवाई से प्रभावित होता है तो उसे सत्र लाभ दिया जाए, ताकि विद्यार्थियों को परेशानी न हों. कोर्ट ने यह निर्देश भी दिया कि इस आदेश की प्राप्ति की तिथि से तीन माह की अवधि के भीतर इस निर्णय के अनुसार प्रक्रिया पूरी की जाए.
इस मामले पर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अवनीश त्यागी का कहना है कि सरकार हाई कोर्ट के आदेश का अध्ययन करेगी और उसके बाद ही आगे कोई निर्णय लिया जाएगा. वहीं सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने कहा है “समाजवादी पार्टी इसका स्वागत करती है. यह सपा, अभ्यर्थियों, युवाओं, विपक्ष और इस मुद्दे पर लगातार संघर्ष कर रहे सभी लोगों की जीत है.” राज्य के बेसिक शिक्षा विभाग ने एक बयान में कहा कि विभाग माननीय न्यायालय के आदेश का अध्ययन कर रहा है और किसी भी युवा के साथ अन्याय नहीं होगा.
हालांकि सरकार के लिए सबसे बड़ा मुद्दा अनारक्षित वर्ग के उन चयनित अभ्यर्थियों का भी है जो पिछले चार सालों से नौकरी कर रहे हैं. हाई कोर्ट के निर्णय ने उनके भविष्य को भी संकट में ला दिया है. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर योगी सरकार इस निर्णय के विरोध में हाई कोर्ट में अपील करती है तो विपक्षी दलों के इस आरोप की ही पुष्टि होगी कि प्रदेश सरकार आरक्षण विरोधी है.
राजनीतिक विश्लेषक सहायक शिक्षक भर्ती में आरक्षण से जुड़े हाई कोर्ट के ताजा निर्णय से योगी आदित्यनाथ सरकार को मुश्किलों में घिरता देख रहे हैं. लखनऊ के शिया कालेज में इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक अमित राय बताते हैं, “हाई कोर्ट द्वारा चयन सूची रद्द करने के निर्णय से न केवल विपक्षी दल बल्कि भाजपा और उसके सहयोगी भी योगी आदित्यनाथ सरकार को पिछड़ा विरोधी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और अपना दल नेता अनुप्रिया पटेल पहले से ही योगी सरकार में पिछड़ा आरक्षण की विसंगतियों को लेकर हमलावर हैं. अब इन्हें एक नया मुद्दा मिल गया है.”
इंडिया गठबंधन ने लोकसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा पर आरक्षण खत्म करने का आरोप लगाया था. वहीं हाई कोर्ट ताजा फैसले ने विपक्षी दलों को प्रदेश सरकार के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा थमा दिया है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा है, "69,000 शिक्षक भर्ती आखिरकार भाजपा के छलावे, घोटाले और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई. हम मांग करते हैं कि नई और न्यायपूर्ण सूची बनाई जाए ताकि पारदर्शी तरीके से भर्ती हो सके और एक बार फिर भाजपा काल में पटरी से उतरी शिक्षा व्यवस्था पटरी पर आए. हम नई सूची आने पर उस पर नजर रखेंगे ताकि किसी अभ्यर्थी के साथ अन्याय न हो..." जाहिर है कि सहायक शिक्षक भर्ती में आरक्षण का मुद्दा योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए चौतरफा चुनौतियां लेकर आया है. इससे निबटना मुख्यमंत्री योगी के लिए आसान नहीं होगा.