गुजरात में कोविड के बाद कैसे बदला गरबा का रंग-ढंग, कैसे बना बड़ा कारोबार?

कोविड के बाद गरबा गलियों और आवासीय सोसायटियों से निकलकर भव्य व्यावसायिक आयोजनों तक पहुंच गया है. महंगे टिकट, टेक्नो संगीत और सोशल मीडिया के बढ़ते चलन ने नवरात्रि को 2,500 करोड़ रुपए के कारोबार में बदल दिया है

2020 और 2021 में कोविड की वजह से गरबा पर पाबंदी लग गई थी (फाइल फोटो)

नौ रातों का त्योहार नवरात्रि गुजरात में गरबा के बिना अधूरा है. इसमें लोग मां अंबा की प्रतिमा के चारों ओर गोल घेरे बनाकर नाचते हैं. इस तरह यह दुनिया के सबसे बड़े नृत्य उत्सवों में से एक बन गया है. पांच-छह साल पहले 2020 और 2021 में कोविड प्रतिबंधों के चलते गुजरात के गरबा मैदान सूने रहे और नवरात्रि का उत्सव फीका पड़ गया. 

इसके बाद 2022 में जब पहली बार बिना किसी पाबंदी के गरबा का आयोजन हुआ तो लोगों ने खुलकर जश्न मनाया. गुजरातियों ने मानो पिछली दो साल की कसर एक ही बार में पूरी कर दी. इसके साथ ही नवरात्रि से जुड़ा कारोबार तेजी से बढ़ने लगा. 

इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को पूरे साल सहारा मिलने लगा. तब से यह कारोबार बहुत तेजी से फैल रहा है. इससे इस उद्योग से जुड़े लोग और गरबा करने वाले, दोनों ही खुश भी हैं और हैरान भी.

कोविड से पहले पारंपरिक गरबा कस्बों और शहरों की गलियों तक सीमित था. यह मुख्य रूप से सामुदायिक मेलजोल का एक जरिया था. आवासीय सोसायटियों में शेरी गरबा के लिए पड़ोस के लोग एक जगह गोल घेरा बनाकर नाचते थे और इसके लिए किसी से उधार लेकर लाउडस्पीकर का इंतजाम कर लिया जाता था. 

इसमें शामिल होने के लिए दोस्तों या परिवार के लोगों का बुलावा जरूरी होता था. अहमदाबाद और सूरत जैसे कुछ शहरों में निजी क्लब भी गरबा के कुछ व्यावसायिक आयोजन करते थे. ऐसे आयोजनों में प्रति व्यक्ति करीब 300 रुपए का मामूली प्रवेश शुल्क लिया जाता था.

हालांकि पिछले पांच साल में तस्वीर बदल गई है. अब न तो गलियों में होने वाले गरबा और न ही आवासीय सोसायटियों के आयोजन नवरात्रि के रंग-ढंग तय करते हैं. अब इस उत्सव का मुख्य आकर्षण हजारों भव्य और आधुनिक व्यावसायिक आयोजन हैं. 

गरबा ड्रेस की मांग ने बुटीक कारोबार को भी खूब फायदा पहुंचाया है (सांकेतिक तस्वीर)

इनमें प्रवेश पास की कीमत औसतन दस गुना बढ़ गई है. अहमदाबाद के जयदीप मेहता तीन दशक से भी ज्यादा समय से गरबा आयोजन से जुड़े हैं. वे इवेंट मैनेजमेंट फेडरेशन ग्लोबल के अध्यक्ष भी हैं. जयदीप बताते हैं, "पहले नवरात्रि कोई कारोबार नहीं था और व्यावसायिक आयोजन हाशिये पर थे. अब त्योहार का हर छोटा हिस्सा कमाई और ब्रांडिंग का अवसर बन गया है."

जगह-जगह फोटो खिंचवाने के लिए बूथ बनाए जा रहे हैं. फिल्म के सेट जैसी सजावट के साथ खास थीम पर आधारित गरबा का अनुभव देने वाले आयोजनों के लिए मोटी रकम चुकानी पड़ती है. इस उद्योग से जुड़े लोगों का अनुमान है कि अकेले गुजरात में नवरात्रि से जुड़ी अर्थव्यवस्था करीब 2,500 करोड़ रुपए की है. 

महंगे और खास लोगों के लिए आयोजित कार्यक्रमों के प्रवेश पास की कीमत एक रात के लिए 15,000 रुपए से भी अधिक हो गई है. इन आयोजनों में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसरों का दबदबा रहता है. यहां प्रवेश पास खरीदने के लिए सोशल मीडिया पर एक निश्चित संख्या में फॉलोअर होना भी जरूरी है.

निजी पार्टी प्लॉट, वातानुकूलित गुंबदनुमा आयोजन स्थल, मंडली की रातें आयोजित करने वाले रेस्तरां और इनके साथ पैरों की मालिश, मेकअप और नए रूप में सजने-संवरने के लिए खास लाउंज, कई तरह के व्यंजनों वाले फूड कोर्ट, हस्तशिल्प बाजार और बच्चों के खेलने की जगहें अब आम हो गई हैं. अब नौ रातों का हिसाब भी केवल नौ रातों तक सीमित नहीं रह गया है. उत्सव कम से कम दो वीकेंड तक चलता है.

मुंबई में गरबा के कई आयोजन होते हैं. लेकिन इस साल मध्य और उत्तर भारत के शहरों और कस्बों में भी ऐसे आयोजन अब अपवाद नहीं रह गए हैं.

गरबा के संगीत का रंग-रूप भी बदल गया है. पंजाबी पॉप और बॉलीवुड के गानों की जगह अब गुजराती गीत ले रहे हैं. पहले भीड़ जुटाने वाले फिल्मों के प्रचार कार्यक्रम और अभिनेत्रियों की छोटी-छोटी झलकियां भी अब कम हो गई हैं. उनकी जगह स्थानीय गायकों और संगीतकारों के लिए ज्यादा अवसर बने हैं. डीजे पारंपरिक गरबा धुनों में इलेक्ट्रॉनिक बास संगीत मिलाकर बजा रहे हैं. 

युवाओं के बीच टेक्नो गरबा लोकप्रिय हो रहा है. संगीतकार भार्गव पुरोहित इसे "एक नया प्रयोग" बताते हैं. वे यह भी कहते हैं, "नया ट्रेंड कितने समय तक लोकप्रिय रहता है, यह देखना होगा." हालांकि वे इस बात पर जोर देते हैं कि मां दुर्गा के प्रति भक्ति ही गरबा का मूल आधार बनी हुई है.

बुटीक संचालकों का कहना है कि अब ऐसे हल्के चनिया चोली की मांग बढ़ रही है जिन्हें पहनने के लिए दुपट्टे की जरूरत न हो. टिशू, गज्जी और मोडल सिल्क जैसे कपड़ों से बने ये परिधान पूरी रात पहनने और नौ दिनों के बाद भी दोबारा इस्तेमाल करने के लिहाज से तैयार किए जा रहे हैं. सूरत की डिजाइनर और बुटीक संचालक प्राची शाह कहती हैं, "टेक्नो गरबा में शामिल होने वाले लोग आम तौर पर भारी चनिया चोली की पाबंदियां नहीं चाहते."

इसी तरह आभूषण, सजावट और इवेंट मैनेजमेंट का कारोबार भी बढ़ रहा है. आयोजन स्थलों को इस तरह तैयार किया जाता है कि वहां अच्छी तस्वीरें खींची जा सकें. रील बनाने के लिए खास जगहें और लाइट शो भी इसका हिस्सा हैं. इस तरह गरबा का मैदान सोशल मीडिया स्टूडियो में बदल जाता है. इससे जुड़े उद्योग में हजारों लोक कलाकारों को काम मिलता है. 

नवरात्रि से पहले होने वाली रात की पार्टियों और उत्सव के बाद आयोजित कार्यक्रमों ने खानपान, तकनीकी काम करने वालों और इवेंट मैनेजरों के लिए कमाई का समय भी बढ़ा दिया है. कुछ लोग अब एक ही रात में अलग-अलग कलाकारों और माहौल का आनंद लेने के लिए कई आयोजन स्थलों पर जाते हैं. इसे 'गरबा-हॉपिंग' कहा जा रहा है.

पहले सरकार के नियमों के मुताबिक गरबा स्थलों पर रात 11 बजे के बाद लाउडस्पीकर बजाने की अनुमति नहीं थी. 2022 में यह पाबंदी हटने के बाद गरबा उत्सव ने मानो नया रूप ले लिया. 2023 में यूनेस्को ने गुजरात के गरबा को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया. यह मान्यता उस समय मिली जब गरबा का कारोबार तेजी से बढ़ रहा था. इससे इस व्यावसायिक उत्सव को सांस्कृतिक पहचान और मान्यता भी मिली.

जो बदलाव सामाजिक जागृति जैसा दिखता है, वह दरअसल लंबे समय से दबी मांग को कारोबार का रूप मिलने का नतीजा भी हो सकता है. महामारी के दौरान खामोशी के बाद जब गुजरात फिर गरबा के घेरे में लौटा तो उसने इस उत्सव की कीमत भी तय की, उसे आधुनिक रूप दिया और बड़े पैमाने पर फैलाया. इस बीच गलियां पहले से ज्यादा रोशन हो गई हैं. स्थानीय अर्थव्यवस्था में पैसा आ रहा है और ऐसे में शिकायत करने वाले भी कम ही हैं.

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