देश का सबसे बड़ा डेटा सेंटर हब बनाने के लिए गुजरात कहां से लाएगा पानी-बिजली?
भूपेंद्र पटेल सरकार गुजरात को भारत का सबसे बड़ा डेटा सेंटर हब बनाना चाहती है. हालांकि इस सपने को हकीकत में बदलने के लिए पानी और बिजली का इंतजाम सबसे बड़ी चुनौती होगी

गुजरात ने भारत का सबसे बड़ा डेटा सेंटर हब बनने की नई योजना बनाई है. 9 जुलाई को मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने 'विकसित गुजरात डेटा सेंटर नीति 2026-29' लॉन्च की. सरकार का कहना है कि इस नीति से करीब 6 लाख करोड़ रुपए का निवेश आएगा और 7.5 गीगावॉट (GW) डेटा सेंटर क्षमता विकसित होगी.
इसका ज्यादातर हिस्सा खंभात की खाड़ी के पास बन रहे नए शहर धोलेरा में होगा. भूपेंद्र पटेल ने कहा, "विकसित गुजरात डेटा सेंटर नीति 2026-29 गुजरात को डेटा सेंटर स्थापित करने के लिए भारत का सबसे बेहतर स्थान बनाएगी. इससे क्लाउड सेवाएं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), ई-कॉमर्स, डिजिटल गवर्नेंस और स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग को मजबूती मिलेगी."
उपमुख्यमंत्री हर्ष सांघवी ने कहा कि धोलेरा दुनिया के सबसे बड़े डेटा सेंटर शहर का रूप लेने के लिए लगातार आगे बढ़ रहा है. यह बहुत बड़ा दावा है. धोलेरा में चौड़ी सड़कें, भूमिगत पाइपलाइन और बड़ा सोलर पार्क बनाया जा रहा है. यहां टाटा की सेमीकंडक्टर फैक्ट्री भी निर्माणाधीन है.
हालांकि अभी बहुत सी योजनाएं कागजों पर ही हैं. दो रनवे वाला धोलेरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा इस साल आंशिक रूप से शुरू होने की उम्मीद है. 920 वर्ग किलोमीटर में फैले धोलेरा स्मार्ट सिटी का फिलहाल केवल करीब 5 फीसद हिस्सा 'एक्टिवेशन एरिया' के रूप में विकसित हो रहा है. इस इलाके में छह अन्य कंपनियों को जमीन आवंटित की जा चुकी है और कई अन्य कंपनियों के लिए भी जगह उपलब्ध है.
डेटा सेंटर को एक ऐसी विशाल इमारत के रूप में समझिए, जिसमें हजारों कंप्यूटर लगे होते हैं और जहां दुनिया का डिजिटल डेटा सुरक्षित रखा और संचालित किया जाता है. आपकी हर ईमेल, वीडियो, फोटो और AI चैट ऐसे ही डेटा सेंटर में मौजूद होती है. हर सरकार ज्यादा से ज्यादा डेटा सेंटर चाहती है क्योंकि यही इंटरनेट और AI की बढ़ती दुनिया को ताकत देते हैं और किसी राज्य को आधुनिक तथा भविष्य के लिए तैयार दिखाते हैं.
हालांकि इसमें एक बड़ी चुनौती भी है. डेटा सेंटर बहुत ज्यादा रोजगार नहीं देते. इनके निर्माण के दौरान कुछ समय के लिए हजारों लोगों को काम मिलता है लेकिन शुरू होने के बाद मशीनों से भरे एक बड़े हॉल को चलाने के लिए सिर्फ कुछ सौ कर्मचारियों की जरूरत होती है. राज्यों को सीधे तौर पर मजदूरी से भी ज्यादा कमाई नहीं होती. उन्हें उम्मीद रहती है कि जमीन के सौदों, बिजली बेचने, आसपास विकसित होने वाले कारोबार से मिलने वाले टैक्स और गूगल या अमेजन जैसी वैश्विक कंपनियों की मौजूदगी से फायदा होगा लेकिन सबसे बड़ी चुनौती पानी और बिजली की है.
डेटा सेंटर के कंप्यूटर भारी प्रोसेसिंग की वजह से बहुत ज्यादा गर्म होते हैं इसलिए उन्हें ठंडा रखना पड़ता है और इसके लिए अक्सर काफी मात्रा में पानी चाहिए होता है. साथ ही वे एक छोटे शहर जितनी बिजली भी खपत करते हैं. गुजरात का कहना है कि उसके पास बिजली की पर्याप्त उपलब्धता है और वह कंप्यूटरों को ठंडा करने के लिए किसानों के हिस्से का पानी नहीं, बल्कि समुद्र के पानी का इस्तेमाल करेगा. हालांकि, समुद्र का पानी को मीठा बनाने वाले डिसैलिनेशन प्लांट लगाना बहुत महंगा होता है. दुनिया भर में डेटा सेंटर की सबसे बड़ी चुनौती पैसा नहीं बल्कि समय पर पर्याप्त पानी और बिजली उपलब्ध कराना है.
फिलहाल गुजरात के पास जरूरत से ज्यादा बिजली हो सकती है लेकिन सेमीकंडक्टर फैक्ट्रियों और डेटा सेंटरों की तेजी से बढ़ती जरूरतों को पूरा करने लायक बिजली नहीं है. सबसे बड़ी चुनौती पानी की है. राज्य में पीने, सिंचाई और उद्योगों के लिए पानी की जरूरत मुख्य रूप से नर्मदा के पानी और भूजल से पूरी होती है लेकिन यह मुश्किल से ही पर्याप्त कहा जा सकता है.
अगर नई तकनीक आधारित उद्योगों के लिए बड़ी मात्रा में पानी देना होगा तो राज्य को पानी के नए स्रोत तैयार करने होंगे. इसके लिए सबसे अधिक संभावना डिसैलिनेशन प्लांट लगाने की है. धोलेरा में फिलहाल प्रतिदिन 2 करोड़ लीटर (20 MLD) क्षमता का डिसैलिनेशन प्लांट चालू है जो अभी 'एक्टिवेशन एरिया' की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है.
9 जुलाई को धोलेरा इंडस्ट्रियल सिटी डेवलपमेंट लिमिटेड (DICDL) ने धोलेरा स्पेशल इन्वेस्टमेंट रीजन (DSIR) में प्रस्तावित 200 MLD क्षमता वाले समुद्री जल डिसैलिनेशन प्लांट के लिए कंसल्टेंसी सेवाओं का टेंडर जारी किया. हालांकि DSIR के पूरी क्षमता से शुरू होने पर पानी की कुल जरूरत कितनी होगी, यह अभी तय नहीं है. इसलिए डिसैलिनेशन प्लांट की क्षमता कितनी तेजी से बढ़ाई जाती है, यही तय करेगा कि सरकार के ये वादे कितने सफल होंगे.
इस दौड़ में आगे निकलने के लिए गुजरात कई आकर्षक रियायतें दे रहा है. सरकार 20 साल तक बिजली की हर यूनिट पर 1 रुपए की छूट देगी, स्टांप ड्यूटी नहीं लेगी और कई तरह के टैक्स में भी राहत देगी. हालांकि ये सुविधाएं केवल 150 मेगावॉट या उससे बड़े प्रोजेक्ट्स को मिलेंगी. यानी इसका लक्ष्य छोटे निवेशक नहीं, बल्कि दुनिया की बड़ी 'हाइपरस्केलर' कंपनियां हैं.
गुजरात इस दौड़ में अकेला नहीं है और न ही सबसे पहले आया है. तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र और ओडिशा कई साल पहले ही डेटा सेंटर नीति बना चुके हैं. फिलहाल मुंबई भारत का सबसे बड़ा डेटा सेंटर हब है. देशभर में कंपनियां पहले ही अरबों डॉलर के निवेश का वादा कर चुकी हैं. अकेले गूगल आंध्र प्रदेश में 1 गीगावॉट क्षमता वाले प्रोजेक्ट पर करीब 6 अरब डॉलर खर्च कर रहा है.
गुजरात की नीति में सबसे खास बात है लंबी अवधि तक दी जाने वाली बड़ी रियायतें और उसका बहुत बड़ा लक्ष्य. नीति में 7.5 गीगावॉट क्षमता का लक्ष्य रखा गया है लेकिन राज्य के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अर्जुन मोढवाडिया ने कहा कि राज्य को कुल 10 गीगावॉट क्षमता वाले डेटा सेंटरों के प्रस्ताव मिल चुके हैं.
तुलना के लिए देखें तो आज पूरे भारत में डेटा सेंटरों की कुल क्षमता करीब 2 गीगावॉट है. गुजरात अकेले ही इससे कई गुना ज्यादा क्षमता विकसित करने का दावा कर रहा है. राज्य के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव पी. भारती ने कहा, "भारत दुनिया का करीब 20 फीसद डेटा तैयार करता है लेकिन वैश्विक डेटा सेंटर क्षमता में उसकी हिस्सेदारी केवल 3 फीसद है. यह हमारे लिए बहुत बड़ा अवसर है."
दुनिया का सबसे बड़ा डेटा सेंटर हब अमेरिका के उत्तरी वर्जीनिया का 'डेटा सेंटर एली' है. वहां फिलहाल 16 से 20 गीगावॉट क्षमता वाले डेटा सेंटर चल रहे हैं या बन रहे हैं. यह धोलेरा के पूरे लक्ष्य से भी दोगुना से ज्यादा है और वहां तक पहुंचने में कई दशक लगे हैं. गुजरात की नीति कागज पर बेहद महत्वाकांक्षी है लेकिन 6 लाख करोड़ रुपए का यह सपना सच होगा या नहीं,इसका फैसला इस बात से होगा कि राज्य समय पर पानी और बिजली का इंतजाम कर पाता है या नहीं.