गोरखपुर बना बिश्नोई गैंग के हथियार नेटवर्क का नया ठिकाना?

गोरखपुर में पांच लोगों की गिरफ्तारी और हथियारों की बरामदगी के बाद एसटीएफ की जांच मध्य प्रदेश और हरियाणा से लेकर पूर्वांचल तक फैले नेटवर्क तक पहुंची है. पुलिस का दावा है कि इस नेटवर्क से 100 से 150 पिस्टल बेची गईं

दावा है कि इस गैंग ने पूर्वांचल में कई जगह हथियार सप्लाई किए हैं (सांकेतिक फोटो)

14 सितंबर की रात करीब साढ़े दस बजे गोरखपुर के विंध्यवासिनी पार्क के आसपास सामान्य आवाजाही थी. इसी दौरान एसटीएफ की गोरखपुर फील्ड यूनिट ने पांच युवकों को घेरकर गिरफ्तार किया. तलाशी में चार 32 बोर की पिस्टल, चार मैगजीन, एक 32 बोर रिवॉल्वर और पांच कारतूस मिले. 

पहली नजर में यह कार्रवाई अवैध असलहा तस्करी के एक सामान्य मामले जैसी लग सकती थी लेकिन पूछताछ आगे बढ़ी तो जांच की दिशा गोरखपुर से निकलकर मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और महाराष्ट्र तक पहुंचने लगी.

पुलिस का दावा है कि यह केवल पांच लोगों का स्थानीय गिरोह नहीं बल्कि पूर्वांचल में फैले एक बड़े असलहा नेटवर्क की कड़ी है, जिसके तार कुख्यात अपराधी सरगना लॉरेंस बिश्नोई और अनमोल बिश्नोई से जुड़े बताए जा रहे हैं.

एसटीएफ के अनुसार इस नेटवर्क का केंद्र गोरखपुर था. मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के सेंधवा और हरियाणा के सोनीपत से पिस्टल खरीदी जाती थीं और फिर गोरखपुर के रास्ते पूर्वांचल के अलग-अलग जिलों में पहुंचाई जाती थीं. 

पुलिस का दावा है कि इस नेटवर्क के जरिये गोरखपुर-बस्ती मंडल समेत पूर्वांचल के विभिन्न जिलों में करीब 100 से 150 पिस्टल बेची गई हैं. अब जांच इस बात पर केंद्रित है कि इन हथियारों के खरीदार कौन थे, किन आपराधिक घटनाओं में उनका इस्तेमाल हुआ और स्थानीय नेटवर्क की पहुंच कितनी दूर तक है.

शशांक पांडेय की तलाश

इस पूरे नेटवर्क की जांच में एसटीएफ जिस व्यक्ति को महत्वपूर्ण कड़ी मान रही है, वह पश्चिमी चंपारण, बिहार का रहने वाला शशांक पांडेय है. पुलिस के अनुसार शशांक गोरखपुर के सिंघड़िया इलाके में किराये के कमरे में रहता था और अवैध हथियारों के कारोबार से जुड़े स्थानीय लोगों को लॉरेंस बिश्नोई और अनमोल बिश्नोई गिरोह से जोड़ने में उसकी भूमिका थी. 

इन्स्टाग्राम पर फर्जी आईडी बनाकर हथियारों के ग्राहक तलाशे जाते थे (सांकेतिक तस्वीर)

पुलिस का दावा है कि गोरखपुर और आसपास के जिलों में बिश्नोई गैंग से जुड़ा नेटवर्क खड़ा करने में भी शशांक की भूमिका रही है. शशांक का नाम पहले भी सामने आ चुका है. पंजाब पुलिस उसे असलहा सप्लाई के मामले में जेल भेज चुकी है. गिरफ्तार आरोपितों से पूछताछ में उसके गोल्डी बराड़ और रोहित गोदारा से संपर्क में होने की जानकारी मिलने की बात एसटीएफ ने कही है. 

गिरफ्तार किए गए श्रेयांश यादव और शशांक के पुराने संबंधों की बात भी सामने आई है. एसटीएफ के अनुसार शशांक ने ही श्रेयांश को असलहा तस्करी के नेटवर्क से जोड़ा और उसे इस कारोबार में आगे बढ़ाया. पुलिस उसे श्रेयांश का आपराधिक गुरु और साथी बता रही है. इसके बाद श्रेयांश मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक फैले हथियार तस्करी नेटवर्क से जुड़ गया.

श्रेयांश का आपराधिक रिकॉर्ड भी जांच का हिस्सा है. पुलिस के मुताबिक वह मध्य प्रदेश के बड़वानी और मुंबई में असलहा तस्करी के मामलों में जेल जा चुका है. महाराष्ट्र में उसे साथियों के साथ सात पिस्टल और 21 कारतूस के साथ पकड़े जाने की जानकारी भी सामने आई है. 

एसटीएफ अब यह पता लगा रही है कि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में उसके संपर्क किस तरह गोरखपुर के नेटवर्क से जुड़े और इन राज्यों से हथियारों की आपूर्ति का पूरा तंत्र कैसे संचालित होता था. पुलिस शशांक समेत करीब 10 अन्य लोगों की तलाश कर रही है. 

जांच का दायरा अब उत्तर प्रदेश से बाहर हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक पहुंच चुका है. एसटीएफ हथियारों के स्रोत से लेकर स्थानीय खरीदारों और सप्लायरों तक पूरी कड़ी जोड़ने में जुटी है.

इंस्टाग्राम पर ग्राहक

जांच में सामने आया नेटवर्क सिर्फ हथियार खरीदने और बेचने तक सीमित नहीं था. एसटीएफ के अनुसार पकड़े गए लोगों ने सोशल मीडिया को ग्राहक तलाशने का माध्यम बनाया. खासकर इंस्टाग्राम पर फर्जी आईडी बनाकर संभावित खरीदारों से संपर्क किया जाता था. बातचीत के बाद हथियारों की कीमत, डिलीवरी और भुगतान का रास्ता तय किया जाता था. 

पुलिस के मुताबिक श्रेयांश मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के सेंधवा से पिस्टल खरीदता था. हथियार की बोर और गुणवत्ता के आधार पर वहां उसकी कीमत करीब 15 से 40 हजार रुपए तक होती थी. इसके बाद यही पिस्टल गोरखपुर और आसपास के जिलों में 15 से 20 हजार रुपए तक के मुनाफे पर बेची जाती थी. 

एसटीएफ के मुताबिक राजकुमार चौहान की हत्या भी ऐसे ही तस्करी वाले हथियार से हुई थी (फाइल फोटो)

यानी एक हथियार पर तस्करों को अच्छा मार्जिन मिल रहा था और स्थानीय स्तर पर इसकी मांग भी बनी हुई थी. इस नेटवर्क की संरचना में गोरखपुर महत्वपूर्ण ट्रांजिट प्वाइंट के तौर पर सामने आया है. 

बाहर से आने वाली पिस्टल सीधे खरीदारों तक पहुंचाने के बजाय स्थानीय सदस्यों को दी जाती थीं. ये सदस्य अपने संपर्कों और सोशल मीडिया के जरिये ग्राहक तलाशते थे. पुलिस का दावा है कि इस व्यवस्था के जरिये पूर्वांचल के कई जिलों में 100 से 150 पिस्टल तक बेची गईं.

स्थानीय खरीदारों के बारे में जांच में कई नाम सामने आए हैं. एसटीएफ के अनुसार बांसगांव के उनौला खास निवासी प्रमोद यादव, सोनारी शंकर निवासी सूरज यादव और खोराबार के मिर्जापुर बाजार निवासी राजू यादव ने नेटवर्क से एक-एक पिस्टल 40-40 हजार रुपए में खरीदी थी. इन लोगों तक हथियार पहुंचाने में हरपुर बुदहट क्षेत्र के गोसाईपुर मुरदेवा बाजार निवासी आदर्श यादव की भूमिका सामने आई है.

पुलिस के मुताबिक प्रमोद यादव स्थानीय स्तर पर पिस्टल की सप्लाई भी करता था. वह इंस्टाग्राम पर फर्जी आईडी बनाकर ग्राहकों से संपर्क और लेनदेन करता था. राजू यादव को उसका सहयोगी बताया गया है. इस नेटवर्क में पीएसी से निलंबित सिपाही सूरज यादव की भूमिका की भी जांच की जा रही है.

एसटीएफ के अनुसार प्रमोद और सूरज ने पुरानी रंजिश में एक युवक की हत्या कराने के लिए इसी नेटवर्क से करीब डेढ़ लाख रुपए में चार पिस्टल मंगाई थीं. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि इन हथियारों का इस्तेमाल किस वारदात के लिए होना था और बाहर से बुलाए गए शूटर की इसमें क्या भूमिका थी. आरोपितों के मोबाइल फोन और बैंक लेनदेन की जांच के जरिये इन दावों की पुष्टि की जा रही है.

इस नेटवर्क की गंभीरता केवल हथियारों की बरामदगी तक सीमित नहीं है. एसटीएफ का दावा है कि गोरखनाथ क्षेत्र के चर्चित राजकुमार चौहान हत्याकांड में इस्तेमाल किया गया असलहा भी इसी नेटवर्क से उपलब्ध कराया गया था.

इस दावे की जांच के आधार पर पुलिस यह समझने की कोशिश कर रही है कि नेटवर्क ने कितनी आपराधिक घटनाओं को सीधे या परोक्ष रूप से प्रभावित किया.

कितनी गहरी हैं नेटवर्क की जड़ें?

एसटीएफ अब पहले से बरामद हो चुके अवैध हथियारों का स्रोत भी खंगाल रही है. पुलिस के मुताबिक कैंपियरगंज और संतकबीरनगर के खलीलाबाद में बरामद पिस्टलों का संबंध भी इसी नेटवर्क से सामने आया है. कैंपियरगंज के आर्म्स एक्ट मामले में महाराजगंज के फरेंदा फुलवरिया निवासी सिद्धार्थ के पास से बरामद पिस्टल इसी नेटवर्क से सप्लाई होने की जानकारी मिली है.

इसी तरह खलीलाबाद के मामले में संतकबीरनगर के मेंहदावल निवासी चंद्रप्रकाश सिंह, सहजनवां के बघौरा निवासी ऋतिक सिंह और कुशीनगर के रामकोला निवासी अनुराग सिंह के पास से बरामद दो पिस्टलों के स्रोत को भी एसटीएफ इसी नेटवर्क से जोड़कर देख रही है. 

पूछताछ में सामने आई जानकारी और बरामदगी के आधार पर एसटीएफ की जांच अब एक बड़े सवाल पर टिक गई है. क्या गोरखपुर में बिश्नोई गैंग के नाम का इस्तेमाल केवल हथियारों की खरीद-फरोख्त और स्थानीय अपराधियों को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा था, या वास्तव में इसका कोई संगठित नेटवर्क यहां सक्रिय है? 

फिलहाल पुलिस के पास इसके कई कनेक्शन और दावे हैं, लेकिन इन दावों की विस्तृत पुष्टि जांच के आगे बढ़ने के साथ ही होगी.

प्रभारी एसटीएफ गोरखपुर इकाई सत्यप्रकाश सिंह के मुताबिक, पांचों आरोपियों के खिलाफ शस्त्र अधिनियम, गंभीर आपराधिक साजिश, उकसावे और हथियारों की तस्करी से संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज की गई है. 

फिलहाल गोरखपुर में खुली यह कड़ी बताती है कि अवैध हथियारों का कारोबार स्थानीय स्तर पर कितना संगठित हो सकता है. बाहर के राज्यों से हथियार मंगाने, गोरखपुर को केंद्र बनाकर उन्हें पूर्वांचल में पहुंचाने, सोशल मीडिया से खरीदार तलाशने और फिर इन हथियारों के आपराधिक मामलों में सामने आने की कड़ियां एक साथ जांची जा रही हैं. एसटीएफ की अगली चुनौती उन 10 से अधिक फरार लोगों तक पहुंचना और यह पता लगाना है कि इस नेटवर्क की वास्तविक पहुंच कितनी है.

जांच का दायरा अब सिर्फ पांच गिरफ्तार आरोपितों तक सीमित नहीं है. यह पता लगाना बाकी है कि बड़वानी और सोनीपत से आने वाली पिस्टलों की पूरी सप्लाई चेन कौन चला रहा था, गोरखपुर में उन्हें किन लोगों तक पहुंचाया जाता था, सोशल मीडिया पर कितने खरीदार बनाए गए और बिश्नोई गैंग से बताए जा रहे संपर्कों का वास्तविक स्वरूप क्या था.

इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि गोरखपुर में सामने आया यह नेटवर्क स्थानीय असलहा तस्करी का मामला है या किसी बड़े आपराधिक नेटवर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी.

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