गोवा में आदिवासी आरक्षण का मुद्दा बना BJP के गले की फांस

गोवा के आदिवासी संगठनों ने 10 दिसंबर तक आरक्षण लागू करने का अल्टीमेटम दिया है और मांग पूरी न होने पर 2027 के विधानसभा चुनाव में BJP का विरोध करने की चेतावनी दी है

गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत (फाइल फोटो)

गोवा में अनुसूचित जनजातियों (ST) के एक प्रमुख संगठन ने मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत के नेतृत्व वाली BJP सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. यूनाइटेड ट्राइबल्स एसोसिएशंस अलायंस (UTAA) ने अनुसूचित जनजातियों के लिए राजनीतिक आरक्षण लागू करने का अल्टीमेटम दिया है. 

संगठन ने मांग की है कि विधानसभा चुनावों में यह आरक्षण 10 दिसंबर तक लागू हो जाए. गोवा में विधानसभा चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं. UTAA के अध्यक्ष और पूर्व विधायक प्रकाश वेलेप ने कहा है, "यह प्रक्रिया हर हाल में 10 दिसंबर तक पूरी होनी चाहिए." उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने इस तारीख तक आरक्षण प्रक्रिया पूरी करने का वादा किया था.

UTAA इस मुद्दे पर राज्य की करीब 750 आदिवासी बस्तियों तक पहुंचने के लिए अभियान शुरू करेगा. संगठन के नेताओं ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वह उन्हें राजनीतिक आरक्षण देने के मामले में ‘गंभीर नहीं’ है. इस बीच मुख्यमंत्री सावंत प्रक्रिया की खामियों को दूर करने और असंतोष को शांत करने की कोशिश के तहत एक प्रतिनिधिमंडल के साथ नई दिल्ली पहुंचे हैं.

अगस्त 2025 में संसद ने 'गोवा राज्य के विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधित्व के पुनर्समायोजन विधेयक, 2025' को मंजूरी दी थी. इसके तहत राज्य की आदिवासी आबादी को 10 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया गया. काफी देरी के बाद केंद्र सरकार ने इस कानून की अधिसूचना जारी की. 

गोवा की आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी 10.23 फीसदी है (सांकेतिक फोटो)

इससे विधानसभा में आदिवासी समुदायों के लिए चार सीटें आरक्षित होने का रास्ता खुलने की उम्मीद थी. इसके साथ ही उनकी लंबे समय से चली आ रही मांग पूरी होने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया.

गोवा की आबादी में आदिवासियों की हिस्सेदारी करीब 10.23 फीसदी है. फिलहाल राज्य में चार आदिवासी विधायक हैं. ये सभी सामान्य श्रेणी की सीटों से चुनाव जीतकर आए हैं. इनमें मंत्री रमेश तवड़कर (काणकोण), पूर्व मंत्री गोविंद गावड़े (प्रियोल), विधानसभा अध्यक्ष और BJP नेता गणेश गांवकर (सांगेम) तथा निर्दलीय विधायक एंटोनियो वास (कोरटालिम) शामिल हैं. वास सत्तारूढ़ दल का समर्थन करते हैं.

सरकारी नौकरियों और शिक्षा में अनुसूचित जनजातियों (ST) को 12.5 फीसदी और अनुसूचित जातियों (SC) को 2 फीसदी आरक्षण मिला हुआ है. लेकिन विधानसभा में ST समुदायों को अब तक राजनीतिक आरक्षण नहीं दिया गया है. 40 सदस्यीय विधानसभा में SC समुदाय के लिए एक सीट आरक्षित है. यह सीट उत्तरी गोवा में महाराष्ट्र की सीमा से सटा पेरनेम है. यहां से BJP के प्रवीण आरलेकर विधायक हैं.

प्रियोल, नुवेम, सांगेम और क्यूपेम विधानसभा सीटों को ST समुदायों के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव है. हालांकि बॉम्बे हाई कोर्ट ने 26 अक्टूबर को अधिसूचना पर अंतरिम रोक लगा दी. इससे आरक्षण की प्रक्रिया फिलहाल रुक गई है. याचिकाकर्ता एडविन लुसियो फर्नांडिस ने कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है. उन्होंने कहा है कि यह प्रक्रिया मौजूदा सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना पूरी होने के बाद होनी चाहिए. वेलेप ने मांग की है कि हाई कोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाए.

हालांकि UTAA के उपाध्यक्ष और आदिवासी कार्यकर्ता गोविंद शिरोडकर ने कहा कि आदिवासियों के लिए राजनीतिक आरक्षण लागू करने में किसी भी तरह की देरी स्वीकार नहीं की जा सकती. उनके मुताबिक अगर अधिसूचना मौजूदा जनगणना के आधार पर जारी की जाती है तो आरक्षण की प्रक्रिया 2032 के विधानसभा चुनाव तक टल सकती है. शिरोडकर भी सावंत के नेतृत्व में नई दिल्ली गए उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे. राज्य सरकार हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी.

शिरोडकर का कहना है, "हमें 2003 में अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किया गया था. दूसरे राज्यों के आदिवासी समुदायों को राजनीतिक आरक्षण मिल चुका है लेकिन हमें पिछले 23 साल से इंतजार कराया जा रहा है." उन्होंने चेतावनी दी कि अगर 2027 के विधानसभा चुनाव आदिवासी आरक्षण के बिना कराए गए तो आदिवासी समुदाय BJP के खिलाफ मतदान करेंगे.

शिरोडकर ने कहा कि केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी करने में देरी की. साथ ही चुनाव आयोग और भारत के महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त जैसे संस्थान हाई कोर्ट में अपना पक्ष सही तरीके से रखने में नाकाम रहे.

गौड़/गावड़ा, कुणबी और वेलेप समुदायों को 2003 में अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल किया गया था. इनमें हिंदू और कैथोलिक, दोनों धर्मों के लोग शामिल हैं. हालांकि दो दशक से ज्यादा समय बीतने के बावजूद इन समुदायों को विधानसभा में राजनीतिक आरक्षण नहीं मिला है. राज्य के छोटे आदिवासी समूहों में दुबला, सिद्दी, नाइकड़ा, वारली और धोडिया समुदाय शामिल हैं.

गोवा में आदिवासी समुदायों के लिए राजनीतिक आरक्षण लंबे समय से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है. मई 2011 में UTAA के नेतृत्व में बल्ली में हुआ प्रदर्शन हिंसक हो गया था. इसमें दो आदिवासी युवकों की मौत हो गई थी. उस समय सत्ता में रही कांग्रेस को 2012 के विधानसभा चुनाव में इसका भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा था. इसके बाद से BJP गोवा की सत्ता में बनी हुई है.

आरक्षण की मांग पूरी नहीं होने से आदिवासी समुदायों में नाराजगी का असर 2024 के लोकसभा चुनाव में दक्षिण गोवा सीट पर भी देखने को मिला. यहां BJP की उम्मीदवार पल्लवी डेम्पो को कांग्रेस के कैप्टन विरियाटो फर्नांडिस (रिटायर्ड) ने बड़े अंतर से हराया था.

आरक्षण में देरी की एक वजह अन्य जातीय समूहों का विरोध भी बताया जाता है. इनमें क्षत्रिय मराठा और भंडारी समुदाय शामिल हैं. ये जातिगत जनगणना, आरक्षण की चक्रीय व्यवस्था और नई जनसंख्या के आंकड़े उपलब्ध होने तक अधिसूचना टालने की मांग कर रहे हैं. 

क्षत्रिय मराठा और भंडारी समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों का कहना है कि आरक्षण मौजूदा जनगणना के नतीजे सार्वजनिक होने के बाद ही लागू किया जाना चाहिए. इस जनगणना में जातियों की गणना भी की जाएगी. अनुमान है कि इन दोनों समुदायों की संयुक्त आबादी गोवा की 16 लाख की कुल आबादी का करीब आधा हिस्सा है.

क्षत्रिय मराठा समुदाय का दावा है कि गोवा की आबादी में उसकी हिस्सेदारी 18 से 20 फीसदी है. हालांकि कुछ अनुमानों में यह करीब 10 फीसदी बताई गई है. सांगेम को छोड़कर राज्य की सभी विधानसभा सीटों पर इस समुदाय की अच्छी-खासी संख्या है. 

मुख्यमंत्री सावंत, मंत्री विश्वजीत राणे और सुभाष फल देसाई, विधायक उल्हास तुएंकर, राजेश फलदेसाई और डॉ. चंद्रकांत शेट्ये तथा राज्यसभा सांसद सदानंद शेट तानावडे इसी समुदाय से हैं. पूर्व केंद्रीय मंत्री रमाकांत खलप और गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पार्सेकर भी क्षत्रिय मराठा समुदाय से हैं.

भंडारी समुदाय, जिसकी आबादी गोवा की कुल जनसंख्या का करीब एक-तिहाई मानी जाती है, ने भी ST आरक्षण को लेकर चिंता जताई है. यह समुदाय अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी में आता है और इसे राज्य का सबसे बड़ा जातीय समूह माना जाता है.

तीन लगातार कार्यकाल से सत्ता में रहने के कारण BJP को सत्ता विरोधी रुझान का सामना करना पड़ रहा है. इसी बीच गौली-धनगर समुदाय का अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किए जाने की मांग को लेकर प्रदर्शन भी सरकार की मुश्किलें बढ़ा रहा है. 

यह मांग 1980 के दशक से उठाई जा रही है. भारत के महापंजीयक और केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय ने इस मांग को खारिज कर दिया है. इस आंदोलन का नेतृत्व गोवा के पूर्व उपमुख्यमंत्री चंद्रकांत 'बाबू' कवलेकर कर रहे हैं. वह कांग्रेस छोड़कर BJP में शामिल हुए थे. इस समुदाय ने सरकार को 26 नवंबर तक का अल्टीमेटम दिया है.

फिलहाल गौली-धनगर समुदाय अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी में आता है. इसकी आबादी करीब 25,000 मानी जाती है. गोवा में मतदाताओं की संख्या कम होने और जीत का अंतर अक्सर कम रहने के कारण यह समुदाय कई सीटों पर चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकता है. 

इसके कुछ उदाहरण भी मौजूद हैं. 2022 में मुख्यमंत्री सावंत ने सांखली सीट पर कांग्रेस के धर्मेश सगलानी को सिर्फ 666 वोटों से हराया था. वहीं पोंडा में भंडारी समुदाय के बड़े नेता और पूर्व मुख्यमंत्री रवि नाइक ने BJP के टिकट पर महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (MGP) के डॉ. केतन भाटीकर को महज 77 वोटों से हराया था.

युगांक नाइक जैसे विश्लेषकों और शिक्षाविदों का कहना है कि गोवा के आदिवासी समुदाय सामाजिक और राजनीतिक रूप से जागरूक और अपने अधिकारों के प्रति मुखर हैं. वे इसे "सामाजिक जागरूकता और मुक्ति का सफल मॉडल" बताते हैं. 

नाइक कहते हैं, "गोवा में आदिवासी ही एकमात्र ऐसा समूह है, जिसने अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरकर संघर्ष किया है." उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय के चार विधायक हैं, जो अन्य पिछड़ा वर्ग के भंडारी समुदाय के विधायकों की संख्या के बराबर है. BJP से भंडारी समुदाय की नाराजगी की बात कही जा रही है. ऐसे में आदिवासी मतदाताओं के साथ उसका मेल सत्तारूढ़ दल को नुकसान पहुंचा सकता है.

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