गोवा के कितने झरने खतरे की जद में, पहली बार हुई गिनती में क्या पता चला?
झरनों की गिनती यानी स्प्रिंग सेंसस पर जल शक्ति मंत्रालय की पहली रिपोर्ट में गोवा के 60 से ज्यादा ऐसे झरनों की पहचान की गई है, जिन पर खतरा मंडरा रहा है

गोवा में झरनों के लिए एक उभरता हुआ खतरा सामने आया है, पहली बार किए गए झरनों के सेंसस (स्प्रिंग सेंसस) और मैपिंग से इन संसाधनों पर बढ़ते दबाव का संकेत मिलता है. जल शक्ति मंत्रालय के जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग की 'फर्स्ट स्प्रिंग्स सेंसस रिपोर्ट’ के अनुसार, “झरनों के लिए संसाधन संबंधी खतरे” से जुड़े एक सर्वेक्षण में 1,171 झरनों (सूख चुके और गर्म झरनों को छोड़कर) की खतरे की स्थिति का विश्लेषण किया गया.
रिपोर्ट के अनुसार, “इनमें से 94.8 फीसदी (1,110) झरनों में कोई खतरा नहीं पाया गया है जबकि 5.2 फीसदी (61) झरनों की पहचान खतरे से प्रभावित के रूप में की गई है. जिन झरनों में खतरे की पहचान की गई उनमें से 41 फीसदी (25) में खतरे का स्तर कम, 36.1 फीसदी (22) में मध्यम और 23 फीसदी (14) में खतरे का स्तर उच्च पाया गया है.”
मंत्रालय के अनुसार, झरनों को भूजल के उन प्राकृतिक निकास बिंदुओं के रूप में परिभाषित किया जाता है जहां से पानी सतह पर निकलता है. ये देश के पहाड़ी क्षेत्रों में पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं. झरने बड़ी संख्या में लोगों को पीने का पानी, घरेलू उपयोग के लिए पानी और आजीविका का सहारा प्रदान करते हैं, खासकर भारतीय हिमालयी क्षेत्र, पश्चिमी घाट (सह्याद्रि पर्वतमाला), पूर्वी घाट और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में, जिनमें सतपुड़ा और विंध्य पर्वतमालाएं शामिल हैं.
नीति आयोग द्वारा अपनी 2018 की रिपोर्ट ‘इन्वेंट्री एंड रिवाइवल ऑफ स्प्रिंग्स इन द हिमालयाज फॉर वॉटर सिक्योरिटी’ में गठित कार्य समूह के अनुमान के अनुसार देश की लगभग 15% (करीब 20 करोड़) आबादी अपनी पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से झरनों के पानी पर निर्भर है.
गोवा क्षेत्रफल के हिसाब से भारत का सबसे छोटा राज्य है, जो लगभग 3,702 वर्ग किलोमीटर में फैला है. भारत की 2011 की जनगणना के अनुसार, इसकी आबादी 14,58,545 है. राज्य में तीन प्रशासनिक जिले हैं- उत्तरी गोवा, दक्षिणी गोवा और नवगठित कुशावती.
पहली स्प्रिंग सेंसस में गोवा में 1,196 झरनों की गणना की गई, जिनमें से 93.4% (1,117) ग्रामीण क्षेत्रों में और 6.6% (79) शहरी क्षेत्रों में हैं. ये झरने पहाड़ी और वन क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैले हुए हैं, खासकर पश्चिमी घाट और उसके तलहटी तथा ऊंचाई वाले जलग्रहण क्षेत्रों में.
दक्षिण गोवा (861) और उत्तरी गोवा (335) जैसे जिलों में झरनों की प्रमुख उपस्थिति दर्ज की गई है, जहां अधिक वर्षा, लेटेराइट संरचनाएं, अपक्षयित एवं खंडित जलभृत (Weathered and Fractured Aquifers) और पथरीला या ऊबड़-खाबड़ इलाका झरनों के निकलने के अनुकूल परिस्थितियां बनाते हैं. कई ग्रामीण समुदायों में ये झरने पीने के पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं.
बहाव के प्रकार के लिहाज से 88.1 फीसदी (1,054) झरने रिसाव वाले (सीप टाइप) हैं, जबकि 11.9 फीसदी (142) झरनों से पानी लगातार बहता रहता है. गिने गए कुल झरनों में से 92.4 फीसदी (1,105) बारहमासी हैं, 5.5 फीसदी (66) मौसमी हैं और 2.1 फीसदी (25) के सूख जाने की जानकारी दी गई है. स्वामित्व के मामले में, 56.5 फीसदी (662) झरने सार्वजनिक हैं जबकि 43.5 फीसदी (509) निजी स्वामित्व में हैं.
झरनों पर निर्भरता के इस सर्वेक्षण में तीन मुख्य समूहों यानी स्थानीय निवासियों, गैर-निवासियों और जंगली जानवरों के बीच उपयोग और निर्भरता के पैटर्न का विश्लेषण किया गया. गिने गए कुल झरनों (सूखे और गर्म झरनों को छोड़कर) में से 23.7 फीसदी (277) का उपयोग गैर-निवासी करते हैं, जबकि 11.9 फीसदी (139) तक जंगली जानवरों की पहुंच है. अलग-अलग स्तर की निर्भरता दिखाने वाले निवासी बाकी झरनों का उपयोग करते हैं. निवासी समूह के भीतर, 38 फीसदी (287) झरनों पर निर्भरता का स्तर मध्यम, 58 फीसदी (438) पर कम और 4 फीसदी (30) पर निर्भरता का स्तर अधिक बताया गया है.
जल संसाधन पर संसदीय स्थायी समिति की 23वीं रिपोर्ट (2022–23) में जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग से देश के पहाड़ी क्षेत्रों में झरनों के पुनरुद्धार और उनके सतत प्रबंधन के लिए आवश्यक कदम उठाने का आग्रह किया गया जहां बड़ी आबादी पीने, घरेलू और कृषि संबंधी जरूरतों के लिए पूरी तरह झरनों के पानी पर निर्भर है.