गोवा में BJP के लिए दोहरी चुनौती, MGP से तकरार और शिवसेना की तैयारी
महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (MGP) के अलग राह पकड़ने के संकेत और शिवसेना की 21 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी से गोवा में BJP के सामने गठबंधन और वोटों के बंटवारे की नई चुनौती बन रही है

गोवा के मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत (फाइल फोटो)
गोवा में विपक्षी दलों का महागठबंधन मुश्किलों से जूझ ही रहा है लेकिन मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत की सरकार के लिए भी चीजें इतनी आसान नहीं हैं. भारतीय जनता पार्टी (BJP) और गठबंधन की सहयोगी पार्टी महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (MGP) के बीच लगातार खींचतान चल रही है. माना जा रहा है कि 2027 की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव में MGP अकेले चुनाव लड़ना चाहती है और इसी दिशा में उसने शुरुआती तैयारियां शुरू कर दी हैं.
मुख्यमंत्री सावंत ने एक स्थानीय न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में इस संभावना का मजाक उड़ाया. उन्होंने कहा कि 40 सदस्यों वाली गोवा विधानसभा में MGP के अभी सिर्फ दो विधायक हैं और यही उसकी चुनावी ताकत की सबसे बड़ी सीमा है. इनमें बिजली मंत्री रामकृष्ण ‘सुदीन’ धवलीकर मडकई सीट से विधायक हैं जबकि जीत अरोलकर ने मांड्रेम सीट जीती थी.
सावंत ने कहा, “उन्हें अपनी सीमाएं पता होनी चाहिए.” उन्होंने याद दिलाया कि 2017 में MGP ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व पदाधिकारी सुभाष वेलिंगकर के नेतृत्व वाले गोवा सुरक्षा मंच (GSM), शिवसेना और छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा था लेकिन एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई थी. 2022 में भी MGP ने तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन किया लेकिन तब भी उसे कोई सीट नहीं मिली.
हालांकि धवलीकर ने तुरंत इसका जवाब दिया. उन्होंने कहा कि 2008 में पाले सीट पर हुए उपचुनाव में सावंत की हार की एक वजह MGP की मौजूदगी भी थी. पाले सीट अब सांकेलिम विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा है और सावंत यहां से लगातार तीसरी बार विधायक हैं. धवलीकर ने कहा, “गोवा में MGP मजबूत है और हर सीट पर उसे कम से कम 3,000 वोट मिलते हैं. हमें सिर्फ ऐसे कार्यकर्ताओं की जरूरत है जो वोटरों को जागरूक कर सकें. इसके बाद गोवा में किसी दूसरी पार्टी के लिए जगह नहीं बचेगी.
उनका दावा है कि बहुत से लोग पुर्तगाली शासन खत्म होने के बाद गोवा में MGP के 17 साल के शासन को आज भी याद करते हैं. उन्होंने बताया कि चुनाव के बाद BJP के साथ MGP का गठबंधन 'केंद्रीय स्तर' पर वरिष्ठ नेताओं ने तय किया था. इनमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल थे.
2002 से MGP कभी BJP तो कभी कांग्रेस के साथ सरकार में रही है. 2019 में सावंत सरकार में धवलीकर को उपमुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया था. तब MGP के बाकी तीन विधायकों में से दो (मनोहर ‘बाबू’ आजगांवकर और दीपक पाऊसकर) BJP में शामिल हो गए थे.
धवलीकर ने पोंडा विधानसभा क्षेत्र में MGP का आधार मजबूत करने के लिए अभियान शुरू कर दिया है. इसके बाद यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या वे पोंडा से चुनाव लड़ेंगे और अपनी मडकई सीट अपने बेटे मिथिल के लिए छोड़ देंगे. उनके भाई पांडुरंग उर्फ दीपक, जो MGP के अध्यक्ष और पूर्व मंत्री हैं, शिरोडा या प्रियोल में से किसी एक सीट से चुनाव लड़ सकते हैं. पोंडा, शिरोडा और प्रियोल तीनों सीटें BJP के पास हैं जबकि प्रियोल के विधायक और पूर्व मंत्री गोविंद गौड़े धवलीकर भाइयों के कड़े आलोचक माने जाते हैं.
1963 में दयानंद ‘भाऊसाहेब’ बांदोडकर ने गोवा, दमन और दीव विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के खिलाफ MGP को शानदार जीत दिलाई थी. यह पहली बार था जब भारत के किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में कोई पार्टी बहुजन समाज के मुद्दे के आधार पर सत्ता में आई थी. बांदोडकर छोटे लेकिन प्रभावशाली गोमांतक मराठा समाज के सदस्य थे और बड़ी संख्या में ‘पिछड़े’ और मध्यम जाति के हिंदू वोटरों के बीच उनकी मजबूत पकड़ थी.
बांदोडकर के निधन के बाद उनकी बेटी शशिकला काकोडकर उर्फ ताई ने पूर्व पुर्तगाली उपनिवेश गोवा में MGP सरकार का नेतृत्व किया. BJP के हिंदू बहुजन समाज के बड़े हिस्से को अपने साथ जोड़ लेने के बाद MGP पहले जैसी मजबूत पार्टी नहीं रह गई. आज MGP का नेतृत्व धवलीकर बंधु कर रहे हैं जो मंदिर के पुजारियों के परिवार से आते हैं.
अगर MGP अकेले चुनाव लड़ती है तो हिंदू बहुजन वोटों का एक हिस्सा उसके साथ जा सकता है. इससे BJP के मुख्य वोट बैंक पर असर पड़ सकता है. BJP की मुश्किलें इसलिए भी बढ़ सकती हैं क्योंकि महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने गोवा की 21 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की योजना बनाई है. शिंदे की शिवसेना BJP के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का हिस्सा है. पार्टी गोवा में महाराष्ट्र के बाहर अपनी पहली राजनीतिक जमीन बनाने की कोशिश कर रही है.
पार्टी ने गोवा में इस अभियान की जिम्मेदारी पूर्व लोकसभा सांसद गजानन कीर्तिकर और मुंबई के पूर्व पार्षद राजू पेडणेकर और दिलीप नाइक को दी है. पेडणेकर के पास उत्तर गोवा और नाइक के पास दक्षिण गोवा की जिम्मेदारी है. पार्टी का फोकस हिंदू और मराठी वोटों पर रहने वाला है.
महाराष्ट्र के बाहर किसी विधानसभा सीट पर शिवसेना का उम्मीदवार सिर्फ एक बार चुनाव जीत सका है. यह 1991 में हुआ था, जब राम जन्मभूमि आंदोलन अपने चरम पर था. उस समय पवन कुमार पांडे ने उत्तर प्रदेश की अकबरपुर सीट से जीत हासिल की थी. इसके बाद शिवसेना को ऐसी सफलता फिर नहीं मिली. इसकी एक बड़ी वजह यह मानी गई कि उस समय की अविभाजित शिवसेना महाराष्ट्र में अपने स्थानीय और मराठी समर्थक रुख के साथ 1980 के दशक में हिंदुत्व की ओर बढ़ती राजनीति के बीच संतुलन नहीं बना सकी. इसी दौर में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की पहचान एक हिंदू नेता के तौर पर बनी.
2022 में अविभाजित शिवसेना ने गोवा में 10 उम्मीदवार उतारे थे और अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था. उस चुनाव में NCP ने 13 सीटों पर चुनाव लड़ा था जबकि शिवसेना को कुल 1,726 वोट मिले थे जो कुल पड़े वोटों का 0.18 फीसदी था.
महाराष्ट्र और गोवा के बीच लंबे समय से मजबूत ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं. गोवा के मराठी भाषी हिंदू मुंबई और दूसरे इलाकों में शिवसेना के समर्थक समूह का हिस्सा हैं. एकतरफ उद्धव बालासाहेब ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना के नेता अनिल देसाई (मुंबई दक्षिण-मध्य से लोकसभा सांसद), विधायक संजय पोतनीस और पूर्व विधायक प्रकाश फातरपेकर की जड़ें गोवा से जुड़ी हैं तो शिंदे की शिवसेना में भी पेडणेकर और नाइक का संबंध भी गोवा से रहा है.