अपने देसी आमों की विरासत कैसे बचा रहा गोवा?
अल्फांसो जैसी व्यावसायिक किस्मों के बढ़ते वर्चस्व के बीच कई देशी आम विलुप्ति की कगार पर पहुंच गए हैं. गोवा सरकार अब उनके जर्मप्लाज्म के संरक्षण और बड़े पैमाने पर खेती की तैयारी में जुटी है

गोवा का कृषि विभाग देसी आम की किस्मों को संरक्षित करने की पहल के तहत आम की 40 किस्मों के पौधे लगा चुका है और किसानों को इनकी खेती के लिए प्रोत्साहित कर रहा है. विभाग का लक्ष्य इन आमों का निर्यात बढ़ाना भी है, खासकर उन देशों में जहां गोवा से जुड़े प्रवासी समुदाय की बड़ी मौजूदगी है.
आम के ये पौधे फोंडा के पास कोडार स्थित सरकारी कृषि फार्म में लगाए गए हैं. इनमें प्रसिद्ध मांकुराद के अलावा बिशप, कोलेको, बैरेटो, कार्डोज मालकुराद, कोटा, रत्ना, नीलम, अमरपाली, कोस्टा, मिरांडा, फर्नांडिन, कुलास, रेनॉल्ड, मालगोआ, पैरी, पापेल, मालगेश, मोंटेइरो, मांगा रोजा, अफोसिन, रेनॉल्ड, रेबेलो, मुसर्रत (बारदेज), मुसर्रत (साल्सेटे), फुर्ताद और गोवा अल्फांसो जैसी स्थानीय किस्में शामिल हैं.
आम उत्पादकों का कहना है कि अल्फांसो जैसी व्यावसायिक किस्मों की खेती बढ़ने से इन कम चर्चित किस्मों पर प्रतिकूल असर पड़ा है. अल्फांसो की भारत और विदेशों में काफी मांग है.
कृषि विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, "हमने इन देसी और अन्य आम की किस्मों के पौधे लगाने शुरू किए हैं ताकि भविष्य में किसान इनका अधिक उत्पादन कर सकें. इनमें से कुछ आम की किस्में विलुप्त होने की कगार पर हैं और इनके जर्मप्लाज्म का संरक्षण जरूरी है."
जर्मप्लाज्म किसी पौधे या फसल की आनुवंशिक (जेनेटिक) विरासत होती है. इसमें बीज, टिश्यू या पौधों की ऐसी जीवित सामग्री शामिल होती है, जिससे भविष्य में उस किस्म को दोबारा उगाया या विकसित किया जा सके. इसका संरक्षण करने से दुर्लभ और विलुप्त होती किस्मों को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है.
कोडार फार्म करीब 110 हेक्टेयर में फैला है, जहां मुख्य रूप से काजू की खेती होती है. इनमें से लगभग 15 हेक्टेयर क्षेत्र में आम की खेती की जा रही है.
संबंधित अधिकारी के मुताबिक, "हम मांकुराद पर इसलिए विशेष ध्यान दे रहे हैं क्योंकि इसमें व्यावसायिक संभावनाएं हैं. गोवा के लोग इसे पसंद करते हैं और इसका निर्यात यूनाइटेड किंगडम तथा खाड़ी देशों में भी होता है. लेकिन निर्यात के लिए इसकी उपलब्धता कम है." उन्होंने बताया कि इस आम की कम शेल्फ लाइफ यानी लगभग छह दिन होने के कारण इसकी बाजार क्षमता और व्यावसायिक संभावनाएं भी प्रभावित होती हैं.
विभाग अन्य किस्मों की खेती बढ़ाकर उनके निर्यात की संभावनाएं भी तलाश रहा है. इस परियोजना का उद्देश्य उन पारंपरिक किस्मों के जर्मप्लाज्म को संरक्षित करना भी है, जिनकी खेती लगातार घट रही है. उदाहरण के लिए, बिशप आम की राज्य के कुछ हिस्सों में मांग है, लेकिन इसकी आपूर्ति पर्याप्त नहीं है.
अधिकारी ने बताया, "मांकुराद की भी अभी बड़े व्यावसायिक स्तर पर खेती नहीं होती." हालांकि विभाग इसकी खेती को बढ़ावा देने की योजना बना रहा है. कोडार में इस किस्म के करीब 350 पौधे लगाए गए हैं.
माना जाता है कि आम की उत्पत्ति भारत में हुई थी. अल्फांसो किस्म के विकास का बड़ा श्रेय गोवा में आई ईसाई मिशनरियों को दिया जाता है. इतिहासकार डी.डी. कोसांबी के अनुसार, 16वीं शताब्दी में जेसुइट पादरियों ने आम के पेड़ों में कलम लगाने की तकनीक शुरू की थी.
माना जाता है कि अल्फांसो का नाम पुर्तगाली जनरल अफोंसो द अल्बुकर्क के नाम पर रखा गया. पुर्तगालियों ने आम के पेड़ों पर कलम लगाकर इस किस्म को विकसित किया. इसके बाद यह कोंकण क्षेत्र तक पहुंच गई. गोवा में लोग इस आम को 'अफूस' कहते थे, जबकि महाराष्ट्र में इसका उच्चारण 'हापुस' हो गया.