मोबाइल और AI, बस इतने से होगी मुंह के कैंसर की पहचान!

भारतीय विज्ञान संस्थान के AI टूल ‘आरोग्य आरोहण’ की मदद से मुंह के कैंसर की शुरुआती पहचान की कोशिश की जा रही है. यह टूल इंटरनेट के बिना भी काम कर सकता है

सांकेतिक तस्वीर

गोवा सरकार का स्वास्थ्य सेवा निदेशालय (DHS) मुंह के कैंसर के मरीजों की पहचान और इलाज के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल कर रहा है. पायलट प्रोजेक्ट राजधानी पणजी और पोंडा के पास बेतकी गांव में शुरू किया गया है.

इस परियोजना में भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु का विकसित AI आधारित मुंह के कैंसर की जांच वाला टूल ‘आरोग्य आरोहण’ इस्तेमाल किया जा रहा है. 

स्वास्थ्य सेवा निदेशालय के एक अधिकारी जानकारी देते हैं, "मोबाइल आधारित इस टूल से मुंह के अंदर की तस्वीरें ली जाएंगी और अल्सर जैसी असामान्यताओं की पहचान की जाएगी. अल्सर के प्रकार और उसके रंग जैसी कुछ जानकारियों के आधार पर जिन मरीजों में जोखिम ज्यादा पाया जाएगा, उन्हें टेलीमेडिसिन के जरिए आगे की जांच के लिए डेंटिस्ट के पास भेजा जाएगा. जरूरत पड़ने पर मरीजों को बायोप्सी के लिए गोवा डेंटल कॉलेज भेजा जा सकता है."

‘आरोग्य आरोहण’ को करीब दो महीने पहले पणजी के शहरी स्वास्थ्य केंद्र और बेतकी के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में शुरू किया गया था. इसे आगे और जगहों तक पहुंचाने की योजना है. गोवा में 40 स्वास्थ्य केंद्र हैं. इनमें दो जिला अस्पताल, दो उप-जिला अस्पताल, चार शहरी स्वास्थ्य केंद्र, छह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और बाकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं.

एक अन्य अधिकारी ने बताया, "आमतौर पर मुंह के अंदर लालिमा, सफेद धब्बे, अल्सर या किसी तरह की गांठ का पता लगाने के लिए आंखों से जांच की जाती है. इसके अलावा हम एक अतिरिक्त जांच टूल का भी इस्तेमाल करते हैं, जिससे तस्वीरें लेकर असामान्यताओं की पहचान की जा सके."

इस टूल का इस्तेमाल दोनों स्वास्थ्य केंद्रों में आने वाले मरीजों के लिए किया जाता है. इसके अलावा घर-घर जाकर जांच करने वाले अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मी भी इसका इस्तेमाल कर रहे हैं. 

किसी असामान्यता की स्थिति में स्क्रीन पर ‘नारंगी’ संकेत दिखाई देता है. अगर मरीज को आगे किसी विशेषज्ञ के पास भेजने की जरूरत नहीं होती तो स्क्रीन पर ‘नीला’ संकेत दिखाई देता है.

अब तक गोवा में इस ऐप आधारित सेवा के जरिए करीब 259 लोगों की जांच की जा चुकी है. इनमें 114 मामले संदिग्ध पाए गए. आठ लोगों में मुंह के कैंसर की पुष्टि हुई.

इस जांच टूल को भारत में तमिलनाडु के तंजावुर, उत्तर प्रदेश के मथुरा और गोवा में इस्तेमाल किया जा रहा है. अब इसे दो और जगहों पर शुरू करने की योजना है, जिनमें नागालैंड भी शामिल है. 

अगर यह संभव हुआ तो इसे गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम में शामिल करने और डिजिटल सार्वजनिक टूल के रूप में उपलब्ध कराने की योजना है.

‘आरोग्य आरोहण’ को भारतीय विज्ञान संस्थान के AI सेंटर ऑफ एक्सीलेंस- ट्रांसलेशनल आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस फॉर नेटवर्क्ड यूनिवर्सल हेल्थ केयर (TANUH) ने IISc के AI-रोबोटिक्स टेक्नोलॉजी इनीशिएटिव (ARTPARK) और AI सॉल्यूशंस ब्रांड Triveous के साथ मिलकर विकसित किया है. 

इसे मुंह में ऐसे विकारों और मुंह के कैंसर का शुरुआती स्तर पर पता लगाने के लिए बनाया गया है, जिनमें आगे चलकर कैंसर होने की आशंका रहती है. इसे जांच के दौरान तुरंत इस्तेमाल किए जा सकने वाले, AI आधारित, सफेद रोशनी और मोबाइल फोन पर काम करने वाले टूल के रूप में बताया गया है. 

इस परियोजना को अन्य संस्थानों के अलावा केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के AI सेंटर ऑफ एक्सीलेंस कार्यक्रम के तहत वित्तीय मदद मिली है.

‘आरोग्य आरोहण’ मोबाइल फोन से सफेद रोशनी में ली गई तस्वीरों का इस्तेमाल करता है. यह तुरंत घावों को संदिग्ध या गैर-संदिग्ध श्रेणी में बांट देता है. संदिग्ध घावों वाले मरीजों डेंटिस्ट के पास भेजा जाता है. 

यह टूल इंटरनेट कनेक्शन के बिना भी काम कर सकता है. दावा है कि यह दुनिया में अपनी तरह का एकमात्र टूल है, जो इंटरनेट कनेक्शन के बिना जांच के स्थान पर तुरंत नतीजे देता है. इसे सरकार के केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) से परीक्षण लाइसेंस मिल चुका है और इसे मार्केटिंग लाइसेंस देने की प्रक्रिया चल रही है.

अधिकारियों ने बताया कि गोवा के दूसरे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी इस टूल का इस्तेमाल बढ़ाने की योजना बनाई जा रही है.

भारत और दुनिया में होने वाले सभी कैंसर के मामलों में करीब एक तिहाई मामले मुंह के कैंसर के होते हैं. भारत में हर साल इसके 1.4 लाख से अधिक नए मामले सामने आते हैं और 80,000 लोगों की मौत होती है. जागरूकता की कमी और विशेषज्ञ डॉक्टरों तक सीमित पहुंच के कारण करीब 70 फीसदी मुंह के कैंसर का पता बीमारी के गंभीर चरण में ही चलता है. ग्रामीण इलाकों में यह समस्या और ज्यादा है.

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