ग्लास्गो में मिली सफलता के बीच यूपी के खेल मॉडल पर उठे सवाल

ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व सिर्फ दो खेलों तक सिमट गया. गुलवीर सिंह और अस्मिता डे ने पदकों से प्रदेश का मान बढ़ाया लेकिन अधिकांश खेलों से खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी ने खेल तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए

Gulveer Singh Commonwealth Games 2026
अलीगढ़ के गुलवीर सिंह ने ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में एथलेटिक्स में दो पदक जीते हैं

उत्तर प्रदेश कभी भारतीय एथलेटिक्स, हॉकी, कुश्ती और कई अन्य खेलों में प्रतिभाओं की सबसे बड़ी नर्सरी माना जाता था. खासकर लंबी दूरी की दौड़ में प्रदेश की पहचान राष्ट्रीय सीमाओं से निकलकर एशियाई स्तर तक बनी. 

मऊ के बहादुर प्रसाद और वाराणसी के गुलाब चंद जैसे धावकों ने जिस विरासत की नींव रखी थी, उसे अब अलीगढ़ के गुलवीर सिंह ने ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में नई ऊंचाई दी है. लेकिन गुलवीर और जूडोका अस्मिता डे की व्यक्तिगत सफलता के पीछे एक बड़ा और चिंताजनक सवाल भी खड़ा हो गया है. 

ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों में जिन 10 खेलों में भारत ने हिस्सा लिया, उनमें से केवल दो खेलों में ही उत्तर प्रदेश के खिलाड़ी दिखाई दिए. कभी राष्ट्रीय टीमों में बड़ी संख्या में प्रतिनिधित्व करने वाला प्रदेश अब कई खेलों में पूरी तरह गायब होता नजर आ रहा है.

ग्लास्गो में उत्तर प्रदेश की पहचान मुख्य रूप से एथलेटिक्स और जूडो तक सीमित रही. अलीगढ़ के सेना के जवान गुलवीर सिंह ने 10,000 मीटर में रजत और 5,000 मीटर में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रच दिया. वे एक ही राष्ट्रमंडल खेलों में एथलेटिक्स की दो स्पर्धाओं में पदक जीतने वाले भारत के पहले खिलाड़ी बने. उनकी सफलता ने न केवल भारतीय डिस्टेंस रनिंग को नई ऊर्जा दी बल्कि यह भी साबित किया कि उत्तर प्रदेश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है. 

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के रूप में तैनात अस्मिता डे ने महिलाओं के 48 किलोग्राम जूडो वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर भारत का गौरव बढ़ाया. हालांकि अस्मिता मूल रूप से त्रिपुरा की रहने वाली हैं लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वह उत्तर प्रदेश के खेल तंत्र का हिस्सा हैं.

अस्मिता डे ने जूडो में स्वर्ण पदक जीता है

इन दो उपलब्धियों के अलावा तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं रही. प्रदेश की स्टार धाविका और एशियाई खेलों की चैंपियन पारुल चौधरी 5,000 मीटर में 13वें स्थान पर रहीं, जबकि 3,000 मीटर स्टीपलचेज़ में पांचवां स्थान हासिल कर सकीं. बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों की रजत पदक विजेता प्रियंका गोस्वामी इस बार 10,000 मीटर रेस वॉक में चौथे स्थान पर रहकर पदक से चूक गईं. 

नीरू पाठक 4×400 मीटर मिश्रित रिले टीम का हिस्सा थीं, जिसने फाइनल तक पहुंचकर छठा स्थान प्राप्त किया. भाला फेंक खिलाड़ी रोहित यादव अपने सीजन के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन से काफी पिछड़ गए और सातवें स्थान पर रहे. पैरा एथलीट सागर थायत और लखनऊ के श्रेयांश त्रिवेदी भी फाइनल तक पहुंचे लेकिन पदक हासिल नहीं कर सके. बॉक्सर आदित्य प्रताप यादव का सफर अंतिम-16 में ही समाप्त हो गया. 

इन व्यक्तिगत प्रदर्शन से अलग सबसे बड़ा सवाल प्रदेश के समग्र प्रतिनिधित्व को लेकर है. बॉक्सिंग, वेटलिफ्टिंग, जिम्नास्टिक, ट्रैक साइकिलिंग, तैराकी, बाउल्स, 3×3 बास्केटबॉल और नेटबॉल जैसे खेलों में उत्तर प्रदेश का एक भी खिलाड़ी भारतीय टीम में जगह नहीं बना सका. जबकि इन सभी खेलों की जिला और राज्य स्तर पर नियमित प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं. 

खेल विभाग इनके लिए स्टेडियम, प्रशिक्षण केंद्र, छात्रावास और अन्य सरकारी सुविधाएं भी उपलब्ध कराता है. इसके बावजूद राष्ट्रीय टीम तक खिलाड़ियों का नहीं पहुंचना पूरे खेल ढांचे पर सवाल खड़े करता है. दिलचस्प यह भी है कि वर्ष 2022 के बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में उत्तर प्रदेश के लगभग आठ खिलाड़ियों का चयन हुआ था. 

हालांकि इस संख्या की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी फिर भी प्रदेश का प्रतिनिधित्व इस बार की तुलना में कहीं बेहतर था. ग्लास्गो में खेलों की संख्या 19 से घटाकर 10 जरूर कर दी गई लेकिन जिन खेलों को रखा गया, उनमें भी उत्तर प्रदेश का प्रभाव बेहद सीमित दिखाई दिया. इससे साफ संकेत मिलता है कि समस्या केवल प्रतियोगिताओं की संख्या कम होने की नहीं बल्कि खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर तक तैयार करने की भी है.

उत्तर प्रदेश की सबसे मजबूत पहचान अब भी एथलेटिक्स, विशेषकर लंबी दूरी की दौड़ में बनी हुई है. बहादुर प्रसाद ने 1989 की एशियाई चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर प्रदेश को अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर स्थापित किया था. 

उनके बाद गुलाब चंद ने 1998 बैंकॉक एशियाई खेलों में 10,000 मीटर में कांस्य पदक जीतकर इस परंपरा को आगे बढ़ाया. अब गुलवीर सिंह उसी विरासत के नए ध्वजवाहक बनकर उभरे हैं. उत्तर प्रदेश एथलेटिक्स के दिग्गज और 'ब्लैक रोज़' के नाम से प्रसिद्ध गुलाब चंद मानते हैं कि गुलवीर की सफलता केवल दो पदकों तक सीमित नहीं है. 

गुलाब चंद कहते हैं, "गुलवीर ने हम सभी को गौरवान्वित किया है. मैंने ग्लास्गो में उनके दोनों मुकाबले देखे. मुझे खुशी है कि वह डिस्टेंस रनिंग में हमारी विरासत को बड़े स्तर पर आगे बढ़ा रहे हैं. बहादुर प्रसाद और मेरे बाद कई प्रतिभाशाली धावक आए लेकिन वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को स्थापित नहीं कर सके. गुलवीर ने नई पीढ़ी में विश्वास पैदा किया है कि मेहनत और सही तैयारी से विश्व स्तर पर सफलता हासिल की जा सकती है."

गुलाब चंद की यह टिप्पणी एक सकारात्मक पहलू जरूर सामने लाती है लेकिन इसके साथ यह भी संकेत देती है कि प्रदेश में प्रतिभा और अंतरराष्ट्रीय सफलता के बीच की दूरी अभी भी बनी हुई है. खेल विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में प्रतिभा खोजने की व्यवस्था तो मौजूद है लेकिन उसे उच्च स्तरीय वैज्ञानिक प्रशिक्षण, पोषण, अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर और अनुभवी कोचिंग से जोड़ने की प्रक्रिया कमजोर है. 

उत्तर प्रदेश ओलंपिक एसोसिएशन के एक पदाधिकारी भी इसी समस्या की ओर इशारा करते हैं. उनका कहना है कि सीमित संसाधनों के बावजूद खिलाड़ियों ने अच्छा प्रदर्शन किया है. उनके अनुसार, "अस्मिता डे ने स्वर्ण पदक जीतकर देश और प्रदेश का नाम रोशन किया है. हमारे खिलाड़ियों ने उपलब्ध सुविधाओं में बेहतर प्रदर्शन किया है लेकिन अगर हम अनुभवी खिलाड़ियों को कोचिंग और प्रशिक्षण व्यवस्था से जोड़ें तथा आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराएं तो उत्तर प्रदेश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं अधिक पदक जीत सकता है." 

खेल विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार खिलाड़ियों को पदक जीतने पर आर्थिक पुरस्कार और सरकारी नौकरियां तो दे रही है लेकिन खेल विज्ञान, उच्च स्तरीय कोचिंग और दीर्घकालिक प्रशिक्षण ढांचे को मजबूत करना अभी भी सबसे बड़ी जरूरत है. यही कारण है कि बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली खिलाड़ी जूनियर स्तर से आगे नहीं बढ़ पाते.

प्रदेश सरकार भी अब इस गिरते प्रतिनिधित्व को गंभीरता से लेने के संकेत दे रही है. खेल विभाग के प्रमुख सचिव सुहास एलवाई ने साफ कहा है कि राष्ट्रमंडल खेलों में उत्तर प्रदेश के प्रदर्शन की सभी खेल संघों के साथ समीक्षा की जाएगी. जिन खेलों में प्रदेश का प्रतिनिधित्व नहीं रहा, वहां कारणों की विस्तार से पड़ताल होगी. 

उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि संबंधित खेल संघ संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए तो उन्हें दी जा रही सरकारी सुविधाओं और सहयोग में कटौती की जाएगी. सुहास एलवाई का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय से विभिन्न खेल संघों की कार्यप्रणाली, चयन प्रक्रिया, प्रतिभा विकास और संसाधनों के उपयोग को लेकर सवाल उठते रहे हैं. 

कई खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रदेश में आधारभूत ढांचा बनने के बावजूद उसका लाभ खिलाड़ियों तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पा रहा है. कई जिलों में प्रतियोगिताएं औपचारिकता बनकर रह जाती हैं, जबकि प्रशिक्षकों के नियमित मूल्यांकन और आधुनिक प्रशिक्षण पद्धतियों का अभाव बना हुआ है. 

ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल उत्तर प्रदेश के लिए दो विपरीत तस्वीरें लेकर आए हैं. एक ओर गुलवीर सिंह और अस्मिता डे जैसी सफलताएं बताती हैं कि प्रदेश में विश्व स्तर के खिलाड़ी तैयार करने की क्षमता मौजूद है. दूसरी ओर अधिकांश खेलों में प्रतिनिधित्व का लगभग समाप्त हो जाना यह संकेत देता है कि खेल विकास की मौजूदा व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं. यदि इन कमियों को समय रहते दूर नहीं किया गया तो उत्तर प्रदेश की पहचान कुछ चुनिंदा खेलों तक सीमित होकर रह जाएगी.

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