GI टैग पाने वाली लोनावला चिक्की और माहूर 'तांबूल' का क्या है इतिहास?
लोनावला की चिक्की और माहूर के तांबूल को उनकी विशिष्ट परंपरा, स्थानीय पहचान और पारंपरिक निर्माण प्रक्रिया के आधार पर GI टैग मिला है. इससे इन उत्पादों की नकल रोकने और इन्हें नए बाजार दिलाने में मदद मिल सकती है

महाराष्ट्र में चिक्की बनाने वालों के संगठन 'द चिक्की ऑफ लोनावला एसोसिएशन' को उसकी चिक्की के लिए भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication) यानी GI टैग मिला है. वहीं, नांदेड़ जिले के माहूर में देवी रेणुका को चढ़ाए जाने वाले 'तांबूल' को भी GI टैग दिया गया है.
लातूर के उदगीर स्थित मराठवाड़ा GI संवर्धन संघ को 'रेणुका माता तांबूल' का पंजीकृत स्वामित्व मिला है. राज्य को मिली इस खास पहचान के पीछे ‘मराठवाड़ा GI संवर्धन संघ’ है. यह महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र के पारंपरिक, कृषि, और हस्तशिल्प उत्पादों को GI टैग दिलाने और उनके संरक्षण के लिए काम करने वाला एक संगठन है.
ग्रेट मिशन ग्रुप कंसल्टेंसी के संस्थापक और अध्यक्ष तथा बौद्धिक संपदा अधिकारों के जानकार अधिवक्ता गणेश हिंगमिरे ने ये दोनों GI टैग दिलाने में अहम भूमिका निभाई. उनका कहना है कि इससे लोनावला चिक्की के निर्यात की संभावनाएं बढ़ेंगी. राज्य के दूर-दराज के इलाकों में कई कारोबार और लोगों की आजीविका इसी पर निर्भर है. हिंगमिरे ने कहा, "तिरुपति लड्डू के बाद GI टैग पाने वाला तांबूल दूसरा प्रसाद है."
साल 1882 में भीवराज अग्रवाल और उनके बेटे मगनलाल बेहतर व्यापार की तलाश में आगरा के पास स्थित अपने पैतृक घर से मुंबई आ गए. 1900 के दशक में मुंबई और पुणे के बीच करजत-खंडाला रेल लाइन बिछाई जा रही थी. इस दौरान हजारों ग्रामीण सुरंग खोदने के कठिन काम में लगे थे.
अग्रवाल परिवार ने इसमें व्यापार का मौका देखा और 'गुड़ दानी' बेचना शुरू किया. यह गुड़ और मूंगफली का मिश्रण था. इसका एक रूप कुरमुरा या मुरमुरा के साथ भी बनाया जाता था. चीनी और प्रोटीन का यह सस्ता मिश्रण मजदूरों को तुरंत ऊर्जा देता था.
यह एंग्लो-इंडियन और ब्रिटिश रेलवे अधिकारियों व इंजीनियरों के बीच भी लोकप्रिय हो गया. एक तरह से रेलवे नेटवर्क के विस्तार में चिक्की ने भी अपनी भूमिका निभाई. बाद में रेलवे ने पैक की हुई गुड़ दानी बेचने का फैसला किया. अग्रवाल परिवार ने इसका नाम 'मगनलाल चिक्की' रखा.
भुनी हुई मूंगफली, गुड़ और घी से बनने वाली यह चिक्की आज भी कई घरों की पसंद है. समय के साथ काजू, अदरक, मूंगफली, पुदीना, शहद, आम और स्ट्रॉबेरी फ्लेवर के साथ-साथ शुगर-फ्री चिक्की भी लोकप्रिय हो गई. चिक्की में विटामिन-ई, जिंक और मैग्नीशियम होते हैं जो त्वचा को बेहतर बनाने और कोलेजन बनने में मदद करते हैं. इसे आयरन का भी अच्छा स्रोत माना जाता है.
‘नेशनल चिक्की’ बनाने वाली कंपनी के निदेशक अभयकुमार पारख बताते हैं GI टैग से लोनावला चिक्की की अलग पहचान और मजबूत होगी. उन्होंने कहा, "इससे इसके निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा. आज कई जगह लोनावला के बाहर भी चिक्की बनाई जाती है और उसे असली लोनावला चिक्की बताकर बेचा तथा निर्यात किया जाता है."
इन हिल स्टेशनों पर करीब 15 इकाइयां व्हाइट लेबल बिक्री के लिए चिक्की बनाती हैं. लोनावला, खंडाला और कार्ला में करीब 800 दुकानें यह चिक्की बेचती हैं और हजारों लोगों की आजीविका इस उद्योग पर निर्भर है.
माहूर में देवी रेणुका को चढ़ाया जाने वाला तांबूल महाराष्ट्र का पहला धार्मिक प्रसाद है, जिसे GI टैग मिला है. मान्यता है कि देवी रेणुका अपने भक्त विष्णुकवि महाराज के सपने में आई थीं और उन्होंने अपने नैवेद्य में तांबूल चढ़ाने के लिए कहा था.
माहूर को भारतीय उपमहाद्वीप में माता के 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है. महाराष्ट्र में यह चुनिंदा शक्तिपीठों में शामिल है. इनमें कोल्हापुर का अंबाबाई (महालक्ष्मी) मंदिर, तुलजापुर का तुलजा भवानी मंदिर, माहूर का रेणुका देवी मंदिर और नासिक जिले के वणी स्थित सप्तशृंगी मंदिर का अर्ध पीठ शामिल हैं.
रेणुका देवी मंदिर नांदेड़ जिले में माहूर गांव से 2-3 किलोमीटर दूर माहूर किले पर स्थित है. माना जाता है कि इसका निर्माण करीब 800-900 साल पहले देवगिरी के सेउना यादव राजा ने कराया था. माहूर में तीन पहाड़ हैं. एक पर रेणुका देवी मंदिर है, जबकि दूसरे दो पहाड़ों पर भगवान दत्तात्रेय और उनके माता-पिता अत्रि और अनसूया के मंदिर हैं. हिंदू ग्रंथों में माहूर का उल्लेख 'मातापुर' के नाम से भी मिलता है.
मंदिर के पुजारी और ट्रस्टी चंद्रकांत भोपी कहते हैं, "मंदिर में चढ़ाया जाने वाला तांबूल बहुत प्रसिद्ध है. यह मुख्य प्रसाद का हिस्सा है. GI टैग मिलने से इस उत्पाद का बाजार बढ़ेगा और स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा."
उन्होंने बताया, "नैवेद्य के बाद सभी देवी-देवताओं को तांबूल चढ़ाया जाता है. आमतौर पर इसमें पान का पत्ता, सौंफ, सुपारी और एक लौंग होती है, जिससे पान का पत्ता बंद किया जाता है. लेकिन केवल माहूर में इन सभी चीजों को पीसकर देवी की मूर्ति के मुंह में रखा जाता है."
तांबूल के लिए इस्तेमाल होने वाले पान के पत्ते विदर्भ के उमरखेड़ से लाए जाते हैं. देवी को रोजाना नैवेद्य में पूरणपोली चढ़ाई जाती है. हालांकि एकादशी के दिन 'पंचखाद्य' यानी पांच तरह की मिठाइयां चढ़ाई जाती हैं. मान्यता है कि तांबूल इसे पचाने में मदद करता है.
तांबूल 13 या उससे अधिक सामग्री से तैयार किया जाता है. इनमें पान के पत्ते, सुपारी, चूना, लौंग, इलायची, अजवाइन, सौंफ, धनिया, कसा हुआ सूखा नारियल, दालचीनी, जायफल, मुलैठी, केसर और गुलकंद शामिल हैं.
इन सभी चीजों को एक खास पत्थर के मूसल पर पीसा जाता है. यह स्थानीय 'कोडवा दगड़' पत्थर से बना होता है. इसमें घर्षण कम होता है और यह करीब 20 साल तक चलता है. माना जाता है कि तांबूल प्रसाद में कई आयुर्वेदिक गुण भी होते हैं.
तांबूल बनाने वाले सात परिवारों में शामिल अमोल गावंडे ने कहा कि GI टैग मिलने से तांबूल की नकल पर रोक लगेगी. उन्होंने कहा, "कुछ कंपनियां और लोग अपने उत्पाद को असली तांबूल बताकर बेचने की कोशिश करते हैं. अब ऐसा नहीं हो सकेगा और इस प्रसाद की पवित्रता बनी रहेगी."