फर्जी-दागी वकीलों ने बिगाड़ा अदालती सिस्टम! हाई कोर्ट की सख्ती से क्या बदलेगा?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में दागी और फर्जी डिग्रीधारी वकीलों पर चिंता जताते हुए कई बड़े निर्देश दिए हैं. जानिए कोर्ट ने किन खामियों की ओर इशारा किया और इससे न्याय व्यवस्था में क्या बदलाव आ सकते हैं

Top Court orders one-third women's quota in Supreme Court Bar Association posts
सांकेतिक तस्वीर

उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐसी तल्ख टिप्पणी की है, जिसने न सिर्फ बार काउंसिल और बार एसोसिएशनों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र के सामने एक गंभीर चुनौती भी रख दी है. अदालत ने 17 जुलाई को साफ शब्दों में कहा कि अगर कानून की रक्षा करने वाले ही कानून तोड़ने लगें और अदालतें इस पर चुप्पी साध लें, तो कानून का राज खत्म होने लगता है.

जस्टिस विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने इटावा के अधिवक्ता मोहम्मद कफील की याचिका खारिज करते हुए जो विस्तृत आदेश पारित किया, उसमें सिर्फ एक याचिका का निपटारा नहीं हुआ बल्कि प्रदेश की वकालत व्यवस्था में वर्षों से जमा होती जा रही गंदगी की परतें भी उघाड़ दी गईं. अदालत ने कहा, "कानून दो बार मरता है, एक बार जब उसके अधिकारी अपराधी बन जाते हैं और दूसरी बार जब न्यायाधीश अदालत की हिम्मत के बजाय चुप्पी चुनते हैं. दोनों ही स्थितियों में सबसे पहले कानून का शासन समाप्त होता है."

कोर्ट ने इस पूरे मामले को व्यक्तिगत विवाद से कहीं बड़ा मानते हुए स्वतः संज्ञान की तरह व्यापक निर्देश जारी किए हैं. अदालत ने कहा कि जिन अधिवक्ताओं के खिलाफ आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं, उन्हें अदालतों में प्रैक्टिस की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. इतना ही नहीं, ऐसे मामलों का ट्रायल संबंधित जिले से कम से कम 100 किलोमीटर दूर स्थित अदालतों में स्थानांतरित किया जाना चाहिए ताकि स्थानीय प्रभाव और दबाव से न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो.

4,157 दागी वकील, 5,056 मुकदमे और 46 एफआईआर वाला एडवोकेट

हाई कोर्ट के सामने पुलिस महानिदेशक, अभियोजन निदेशालय और उत्तर प्रदेश बार काउंसिल द्वारा दाखिल आंकड़ों ने अदालत को भी हैरान कर दिया. प्रदेश में बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश में 5,14,439 अधिवक्ता पंजीकृत हैं. इनमें 2,49,809 वकीलों के पास ही वैध सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस (COP) है. इसी रिकॉर्ड के अनुसार 4,157 अधिवक्ताओं के खिलाफ कुल 5,056 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं. इनमें 418 अधिवक्ता ऐसे हैं जिनके खिलाफ तीन या उससे अधिक मुकदमे दर्ज हैं, जबकि 28 अधिवक्ताओं पर 11 या उससे अधिक एफआईआर दर्ज हैं. अदालत ने विशेष रूप से उस मामले का उल्लेख किया जिसमें एक अधिवक्ता के खिलाफ अकेले 46 एफआईआर दर्ज होने के बावजूद वह अदालत में प्रैक्टिस कर रहा है. अदालत ने इसे 'गंभीर चिंता' का विषय बताया.

याचिका दायर करने वाले इटावा के अधिवक्ता मोहम्मद कफील स्वयं तीन आपराधिक मामलों में आरोपी हैं, जबकि उनके पांच सगे भाइयों पर कुल 31 आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं. इनमें मारपीट, धमकी, धोखाधड़ी, गैंगस्टर एक्ट और पॉक्सो एक्ट जैसी गंभीर धाराएं शामिल हैं. अदालत ने पाया कि जिस पुलिस अधिकारी के खिलाफ कफील कार्रवाई की मांग कर रहे थे, वह केवल न्यायालय के आदेशों का पालन कर रहा था. इसलिए उनकी याचिका खारिज कर दी गई.

लखनऊ से गोरखपुर तक, अदालतों के आसपास सक्रिय 'गैंग' पर कोर्ट की चिंता

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सबसे गंभीर टिप्पणी उन संगठित समूहों को लेकर की है, जो अदालत परिसरों के आसपास सक्रिय हैं. अदालत ने कहा कि कई जिला अदालतों में कानून की पढ़ाई कर चुके लोगों के संगठित गिरोह सक्रिय हैं, जो केवल मुकदमे नहीं लड़ते बल्कि अदालतों के आदेशों को लागू कराने, दबाव बनाकर समझौते कराने, कमजोर पक्षकारों को डराने और किरायेदारों तथा संपत्ति पर कब्जे के विवादों में जबरन बेदखली जैसे कामों में भी शामिल हैं.

कोर्ट ने कहा कि गोरखपुर और कानपुर जैसी प्रमुख बार एसोसिएशनों में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग पदाधिकारी बने हुए हैं. इससे पूरे पेशे की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है. अदालत ने यह भी कहा कि जिला न्यायालयों के कई न्यायिक अधिकारी ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई करने से बचते हैं क्योंकि इन समूहों को सामाजिक और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होने की धारणा बनी हुई है. नतीजा यह होता है कि युवा अधिवक्ता और नए नियुक्त न्यायिक अधिकारी भय और दबाव के माहौल में स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर पा रहे.

आंकड़ों ने भी स्थिति की गंभीरता को उजागर किया. लखनऊ के वजीरगंज थाना क्षेत्र में अकेले 422 अधिवक्ताओं के खिलाफ 236 एफआईआर दर्ज हैं. अदालत ने कहा कि यह पूरे प्रदेश में सबसे चिंताजनक स्थिति है और किसी भी अन्य थाने की तुलना में तीन गुना अधिक है. वहीं बरेली जोन में 534 वकीलों पर 762 मुकदमे, जबकि गोरखपुर जोन में 359 वकीलों पर 476 मुकदमे दर्ज हैं. केवल हरदोई ऐसा जिला मिला जहां किसी अधिवक्ता के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज नहीं पाया गया.

105 फर्जी डिग्री और तीन दशक की नियम-कायदों की विफलता

हाई कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश की कार्यप्रणाली पर भी तीखी टिप्पणी की. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुई सत्यापन प्रक्रिया में 105 अधिवक्ताओं की शैक्षणिक डिग्रियां फर्जी पाई गईं. इनमें 65 अधिवक्ताओं की एलएलबी, 28 की स्नातक, पांच की इंटीग्रेटेड बीए-एलएलबी, तीन-तीन के हाईस्कूल और इंटरमीडिएट प्रमाणपत्र, जबकि एक अधिवक्ता की बीसीए डिग्री भी फर्जी मिली. सबसे अधिक फर्जी डिग्रियां इलाहाबाद विश्वविद्यालय के नाम पर तैयार की गईं, जिनकी संख्या 52 है. इसके बाद श्रीधर विश्वविद्यालय, पिलानी (राजस्थान) का नाम सामने आया. लेकिन अदालत की सबसे बड़ी आपत्ति केवल 105 फर्जी डिग्रियों तक सीमित नहीं रही.

न्यायमूर्ति दिवाकर ने कहा कि पांच लाख से अधिक अधिवक्ताओं में केवल 105 फर्जी डिग्रीधारकों का मिलना सांख्यिकीय दृष्टि से अविश्वसनीय है. प्रथम दृष्टया यह सत्यापन प्रक्रिया केवल दिखावटी प्रतीत होती है. कोर्ट ने कहा कि फर्जी डिग्रीधारकों में कुछ अधिवक्ता 1991 और 1992 से पंजीकृत हैं. इसका अर्थ है कि लगभग 35 वर्षों तक वे अदालतों में पेश होते रहे, वकालतनामे दाखिल करते रहे और न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बने रहे, जबकि उनके पास वैध शैक्षणिक योग्यता ही नहीं थी.

अदालत ने टिप्पणी की कि ऐसे मामलों में पारित न्यायिक आदेशों पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े हो सकते हैं क्योंकि न्यायालय के समक्ष पेश होने वाला व्यक्ति विधिक रूप से अधिवक्ता बनने का पात्र ही नहीं था. कोर्ट ने यह भी कहा कि बार काउंसिल की तरफ से सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस जारी करते समय पुलिस सत्यापन नहीं किया जाता, जबकि डॉक्टर, शिक्षक, चार्टर्ड अकाउंटेंट और सिविल सेवा जैसे अन्य विनियमित पेशों में चरित्र और आपराधिक पृष्ठभूमि की जांच आवश्यक होती है. अदालत ने इसे नियामकीय ढांचे की ऐसी ढांचागत कमी बताया जो कई माफी लायक नहीं है.

बार काउंसिल पर सवाल और कड़े निर्देशों की पूरी रूपरेखा

अदालत ने बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश की अनुशासनात्मक व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा किया. रिकॉर्ड के अनुसार बार काउंसिल ने 98 अधिवक्ताओं के खिलाफ स्वतः संज्ञान लिया था और 23 मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई चल रही थी, लेकिन बार काउंसिल चुनाव की घोषणा होते ही अनुशासन समितियां भंग हो गईं. हाई कोर्ट के मुताबिक यह 'संस्थागत लकवा’ की स्थिति है.

कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि 105 फर्जी डिग्रीधारी अधिवक्ताओं के खिलाफ जालसाजी, धोखाधड़ी और अन्य उपयुक्त धाराओं में तत्काल एफआईआर दर्ज कर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए. साथ ही अदालत ने कई दूरगामी निर्देश भी जारी किए हैं. अब प्रत्येक पुलिस कमिश्नर और एसएसपी यह सुनिश्चित करेंगे कि किसी अधिवक्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने तथा चार्जशीट दाखिल होने, दोनों चरणों पर इसकी सूचना संबंधित जिला जज, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, संयुक्त निदेशक अभियोजन और बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को भेजी जाए. इसके लिए हर थाने में अलग रजिस्टर भी बनाया जाएगा.

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि हर अधिवक्ता को प्रतिवर्ष शपथपत्र देकर यह घोषित करना होगा कि उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज हुआ है या नहीं, उस पर चार्जशीट दाखिल हुई है या मुकदमा चल रहा है. यदि कोई अधिवक्ता तथ्य छिपाता है या गलत जानकारी देता है तो उसका पंजीकरण स्वतः निलंबित माना जाएगा. बार काउंसिल को इन घोषणाओं का पुलिस रिकॉर्ड और न्यायालय के रिकॉर्ड से मिलान करने का अधिकार भी दिया गया है. न्यायालय ने न्याय मंत्रालय और संबंधित एजेंसियों को 30 दिन के भीतर अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त 2026 को होगी.

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