चढ़ावा चोरी मामले की जांच के केंद्र में क्यों हैं अनिल मिश्रा?

SIT रिपोर्ट में सुरक्षा व्यवस्था और नकदी गिनती की निगरानी में गंभीर लापरवाही के आरोपों के बीच राम मंदिर ट्रस्ट के पूर्व ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा की भूमिका जांच के केंद्र में आ गई है

राम मंदिर में चढ़ावे की गिनती से लेकर कई स्तरों पर अनिल मिश्रा के पास जिम्मेदारियां थीं

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी का मामला अब केवल कुछ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रह गया है. जांच का फोकस अब उस प्रशासनिक और निगरानी तंत्र पर आ गया है, जिसकी जिम्मेदारी मंदिर में चढ़ावे की सुरक्षा और पारदर्शी गणना सुनिश्चित करना था. इसी कड़ी में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के वरिष्ठ ट्रस्टी और पूर्व सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा का नाम सबसे प्रमुखता से उभरकर सामने आया है.

विशेष जांच दल (SIT) की रिपोर्ट ने पहली बार स्पष्ट शब्दों में यह कहा है कि डॉ. मिश्रा की जिम्मेदारी सिर्फ औपचारिक नहीं थी बल्कि चढ़ावे की पूरी गणना प्रक्रिया, सुरक्षा व्यवस्था और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) के पालन की निगरानी उनके स्तर पर सुनिश्चित की जानी थी. जांच एजेंसियों के सूत्रों का कहना है कि SIT की रिपोर्ट को पुलिस जांच का हिस्सा बना लिया गया है और अंतिम रिपोर्ट में डॉ. मिश्रा को आपराधिक साजिश का आरोपी बनाए जाने की संभावना पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है.

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि अब तक चर्चा का केंद्र केवल चढ़ावे की कथित चोरी थी, लेकिन SIT ने सवाल यह उठाया है कि आखिर चोरी संभव कैसे हुई? रिपोर्ट के अनुसार, यदि SOP का कड़ाई से पालन कराया जाता, कर्मचारियों की नियमित तलाशी होती, बायोमीट्रिक उपस्थिति लागू रहती, निर्धारित वेशभूषा का पालन कराया जाता और नकदी गणना की दोहरी प्रणाली प्रभावी रहती तो चोरी की परिस्थितियां पैदा ही नहीं होतीं. SIT का निष्कर्ष है कि इन सभी बिंदुओं पर गंभीर खामियां रहीं और इसकी जवाबदेही उच्च स्तर पर तय होती है.

रिपोर्ट में यह भी जिक्र किया गया है कि डॉ. अनिल मिश्रा को आंतरिक माध्यमों से पहले ही शिकायतें मिल चुकी थीं कि गणनाकर्मियों की तलाशी नहीं हो रही है और सुरक्षा संबंधी कई नियमों का पालन नहीं किया जा रहा. इसके बावजूद उन्होंने कोई प्रभावी लिखित निर्देश जारी नहीं किया और न ही व्यवस्था को सुधारने के लिए कोई ठोस कदम उठाया. इस आधार पर जांच एजेंसियां मान रही हैं कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं रह गया बल्कि परिस्थितियों ने इसे आपराधिक साजिश की दिशा में भी खड़ा कर दिया है.

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि SIT ने डॉ. मिश्रा को उस SOP का प्रमुख सूत्रधार माना है जो ट्रस्ट और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के बीच नकदी की गिनती के लिए तैयार की गई थी. ट्रस्ट की ओर से बैंक के साथ कोऑर्डिनेशन, नकदी की साज-संभाल और पूरी प्रक्रिया की निगरानी में उनकी सीधी भूमिका बताई गई है. ऐसे में वही व्यक्ति यदि नियमों के पालन को सुनिश्चित नहीं कर पाया तो स्वाभाविक रूप से जांच का दायरा उसके निर्णयों और जिम्मेदारियों तक पहुंचना तय था.

SOP से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक, हर सवाल के केंद्र में डॉ. मिश्रा

SIT की रिपोर्ट का सबसे गंभीर हिस्सा वह है जिसमें सुरक्षा व्यवस्था को व्यवस्थित ढंग से कमजोर पड़ने देने की बात कही गई है. रिपोर्ट के अनुसार, नकदी गणना से जुड़े कर्मचारियों की तलाशी, जेब रहित वर्दी, बायोमीट्रिक उपस्थिति, गणना कक्ष में प्रवेश-निकास की निगरानी, प्रतिबंधित वस्तुओं पर रोक, मूल्यवर्गवार अभिलेखीकरण और डबल काउंटिंग जैसी व्यवस्थाएं केवल कागजों तक सीमित रह गईं. जांच में यह भी सामने आया कि गणना प्रभारी सुभाष श्रीवास्तव को यह जिम्मेदारी डॉ. अनिल मिश्रा की सिफारिश पर मिली थी.

SIT ने माना कि सुभाष श्रीवास्तव गणना प्रक्रिया के संचालन में केंद्रीय भूमिका निभा रहे थे और उनके स्तर पर सबसे बड़ी चूक कर्मचारियों की तलाशी नहीं कराना रही. लेकिन रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि सुभाष की निगरानी और उनके कामों की निगरानी भी डॉ. मिश्रा की थी.

जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि चढ़ावा पेटियों की चाबियां कुछ ऐसे लोगों के पास भी थीं जिन्हें औपचारिक अधिकार प्राप्त नहीं था. इस प्रकार की अनियमितताओं ने पूरे सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. SIT का कहना है कि अगर वरिष्ठ स्तर पर प्रभावी निगरानी होती तो ऐसी व्यवस्था विकसित ही नहीं होती. पुलिस सूत्रों के अनुसार बैंक कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आई है. कई बैंक अधिकारियों और कर्मचारियों की कथित मिलीभगत के संकेत मिले हैं और उनके खिलाफ भी कार्रवाई की तैयारी चल रही है. जांच एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि सुरक्षा नियमों की अनदेखी केवल लापरवाही थी या सुनियोजित तरीके से की गई थी.

इसी बीच एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया जब चंपत राय ने SIT के समक्ष दिए बयान में वर्ष 2025 के उस दस्तावेज से ही इनकार कर दिया जिसमें नकदी गणना की संयुक्त गाइडलाइंस निर्धारित की गई थीं. चंपत राय ने कहा कि उन्होंने केवल 9 फरवरी 2024 के उस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जिसमें सीसीटीवी कैमरे, लोहे के सुरक्षा दरवाजे और अन्य सुरक्षा उपायों का उल्लेख था. लेकिन 6 फरवरी 2025 के जिस दस्तावेज पर डॉ. अनिल मिश्रा और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की नया घाट शाखा के तत्कालीन प्रबंधक के हस्ताक्षर हैं, उसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी.

चंपत राय ने अपने बयान में यह भी कहा कि यदि उस दस्तावेज की प्रति वास्तव में महासचिव को भेजी गई थी तो उन्हें उसकी जानकारी क्यों नहीं दी गई. उन्होंने सवाल उठाया कि अगस्त 2020 से जून 2026 तक हुए सभी महत्वपूर्ण समझौतों पर उनके हस्ताक्षर रहे लेकिन इस दस्तावेज पर उन्हें दरकिनार क्यों किया गया. उन्होंने इस पूरे दस्तावेज को खारिज करते हुए बैंक पर भी आरोप लगाया कि उसने अपने ही चेस्ट रूम संबंधी सुरक्षा नियमों का पालन नहीं कराया. चंपत राय के इस बयान ने मामले को और जटिल बना दिया है क्योंकि अब जांच केवल सुरक्षा चूक तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रस्ट के भीतर निर्णय लेने की समानांतर प्रक्रिया चल रही थी और यदि ऐसा था तो उसमें डॉ. अनिल मिश्रा की भूमिका क्या थी.

संघ से राम मंदिर ट्रस्ट तक, प्रभावशाली सफर और बढ़ती जिम्मेदारियां

डॉ. अनिल मिश्रा का सार्वजनिक जीवन किसी सामान्य ट्रस्टी का नहीं रहा है. उनका पूरा जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठनात्मक कार्यों और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ा रहा है. वर्ष 1958 में अंबेडकरनगर जिले के पतौना गांव में जन्मे डॉ. मिश्रा का पैतृक निवास गोंडा जिले के महबूबपुर गांव में है. प्रारंभिक शिक्षा जौनपुर के जयहिंद इंटर कॉलेज में प्राप्त करने के बाद उन्होंने फैजाबाद के बृजकिशोर होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज से बीएचएमएस की डिग्री हासिल की. छात्र जीवन में ही उन्होंने होम्योपैथी चिकित्सकों के अधिकारों को लेकर चले आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की. इसी आंदोलन के दौरान जेल जाने पर उनका संपर्क संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों से हुआ. यही संपर्क आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ.

सरकारी नौकरी में जाने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार में होम्योपैथिक चिकित्सा अधिकारी के रूप में काम किया. सुल्तानपुर, गोंडा और अयोध्या जैसे जिलों में उनकी तैनाती रही. बाद में वे उत्तर प्रदेश होम्योपैथिक मेडिसिन बोर्ड में रजिस्ट्रार भी बने. सरकारी सेवा के साथ-साथ संघ में उनकी सक्रियता लगातार बढ़ती गई. स्वयंसेवक से जिला कार्यवाह, विभाग कार्यवाह, अवध प्रांत कार्यवाह, सह प्रांत कार्यवाह और आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री, अंतरराष्ट्रीय महामंत्री तथा अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक की जिम्मेदारियां उन्होंने निभाईं.

राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान भी वे सक्रिय रहे. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जब 5 फरवरी 2020 को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ तो उन्हें ट्रस्टी बनाया गया. ट्रस्ट में वे प्रशासनिक समन्वय, निर्माण कार्यों की निगरानी, संघ और ट्रस्ट के बीच संवाद तथा नीतिगत निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे. रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान उन्हें और उनकी पत्नी उषा मिश्रा को मुख्य यजमान बनाया जाना उनकी संगठनात्मक स्वीकार्यता और महत्व का प्रतीक माना गया. यही कारण है कि ट्रस्ट के भीतर उनकी भूमिका केवल एक सदस्य की नहीं बल्कि निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले वरिष्ठ पदाधिकारी की मानी जाती रही.

यही पृष्ठभूमि अब उनके खिलाफ उठ रहे सवालों को और अधिक गंभीर बना रही है क्योंकि SIT भी यही कह रही है कि जिनके पास अधिकार अधिक थे, उनकी जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी थी.

कानूनी मोड़ पर मामला, आगे क्या होगा?

पुलिस सूत्रों का कहना है कि SIT की रिपोर्ट में जिन तथ्यों का उल्लेख किया गया है, उनकी स्वतंत्र पुष्टि की जा रही है. अगर जांच के दौरान उपलब्ध सबूत SIT के निष्कर्षों से मेल खाते हैं तो डॉ. अनिल मिश्रा का नाम औपचारिक रूप से आरोपियों की सूची में जोड़ा जा सकता है. जानकारी के अनुसार जांच एजेंसियों के पास ऐसे कई दस्तावेज और गवाहों के बयान हैं जिनसे यह संकेत मिलता है कि सुरक्षा संबंधी शिकायतों की जानकारी वरिष्ठ स्तर तक पहुंच चुकी थी. इसके बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई. यदि यह साबित होता है कि जानबूझकर नियमों को शिथिल रखा गया या शिकायतों को अनदेखा किया गया तो मामला केवल लापरवाही का नहीं रहेगा.

दूसरी ओर, ट्रस्ट के भीतर भी यह प्रकरण नए समीकरण बना रहा है. महासचिव पद से चंपत राय और अनिल मिश्रा की विदाई के बाद ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर नए सिरे से बहस शुरू हो चुकी है. चंपत राय द्वारा 2025 के गाइडलाइन दस्तावेज से सार्वजनिक रूप से असहमति जताने के बाद यह विवाद और गहरा गया है कि आखिर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर अंतिम निर्णय किस स्तर पर लिए गए और उनकी निगरानी किसके जिम्मे थी.

बैंक अधिकारियों की भूमिका की जांच भी इस मामले का अहम पहलू बनती जा रही है. यदि बैंक और ट्रस्ट दोनों स्तरों पर सुरक्षा प्रोटोकॉल की अनदेखी सिद्ध होती है तो यह मामला केवल ट्रस्ट के भीतर की जवाबदेही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संस्थागत विफलता का उदाहरण बन सकता है. 

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