दिल्ली में वायु प्रदूषण घटाने के लिए इस बार क्या नया करेगी सरकार?
राष्ट्रीय राजधानी में प्रदूषण घटाने के दिल्ली सरकार के सालाना उपायों में कुछ पुराने हैं तो कुछ नए. लेकिन इस पूरी कवायद की असली परीक्षा यही होगी कि इनका जमीन पर कितना असर दिखता है.

सर्दियों के दौरान दिल्ली में वायु प्रदूषण (फाइल फोटो)
हर साल सितंबर के आखिर तक दिल्ली सर्दियों की हवा से निपटने की अपनी अब तक जानी-पहचानी कवायद शुरू कर देती है. एक्शन प्लान तैयार होते हैं और निगरानी के लिए टीमें तैनात की जाती हैं. सड़कों की सफाई और पानी का छिड़काव तेज हो जाता है.
साथ ही निर्माण स्थलों पर काम रुक जाता है. वाहनों पर पाबंदियां लागू होने लगती हैं. पार्किंग शुल्क बढ़ा दिया जाता है. इसके बाद ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) लागू होता है. यह प्रदूषण से निपटने के लिए उठाए जाने वाले आपात कदमों का एक सेट है, जिसके तहत हवा की गुणवत्ता बिगड़ने के साथ चार चरणों में पाबंदियां बढ़ती जाती हैं.
एक दशक से ज्यादा समय से लगभग वही उपाय दोहराए जाने के बाद कुछ नया करने के लिए बहुत कुछ बचता नहीं. लेकिन इस सर्दी के लिए दिल्ली की BJP सरकार ने प्रदूषण कम करने की अपनी योजना में एक नया उपाय जरूर जोड़ा है- ‘हीटिंग स्पॉट’.
यह कुछ हद तक गर्मियों में किए गए उपाय का उलटा है. सरकार के हीट एक्शन प्लान 2026 में बस स्टॉप पर धुंध छोड़ने वाली मशीनें लगाने के साथ लोगों को गर्मी से राहत देने के दूसरे इंतजाम शामिल थे. सर्दियों में अब इसका उलटा करने पर ध्यान है.
कचरा जलाने पर रोक लगाने वाली ‘जीरो बर्निंग’ पहल के तहत सरकार चाहती है कि रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) और बाजार संघों के स्तर पर रात में बाहर काम करने वाले लोगों के लिए गर्म रहने के इंतजाम किए जाएं.
इसके पीछे तर्क यह है कि जिन लोगों के पास खुद को गर्म रखने का कोई साधन नहीं होगा वे लकड़ी, पत्तियां या कचरा जलाकर गर्मी लेने की कोशिश कर सकते हैं. सरकार को उम्मीद है कि हीटिंग स्पॉट ऐसे लोगों को गर्म रखने के साथ सर्दियों के प्रदूषण के एक छोटे स्रोत को भी खत्म करने में मदद करेंगे.
इसके अलावा दिल्ली की सर्दियों से निपटने के कुछ आसान और पहले से तय उपाय भी हैं. ‘नो पीयूसीसी, नो फ्यूल’ पहल 1 अक्टूबर से शहर के 500 पेट्रोल पंपों पर शुरू होगी. कुछ छूट वाली श्रेणियों को छोड़कर बीएस-VI मानक से पहले के वाहनों को 1 नवंबर से 31 जनवरी तक चलने की अनुमति नहीं होगी.
1 नवंबर से 28 फरवरी तक पार्किंग शुल्क दोगुना कर दिया जाएगा. हालांकि दिल्ली मेट्रो परिसरों में यह लागू नहीं होगा. निर्माण और तोड़फोड़ पर रोक 10 दिसंबर से 20 जनवरी तक लागू रहेगी.
इसके बाद वर्क फ्रॉम होम है. 1 नवंबर से 31 जनवरी के बीच सरकारी और निजी दफ्तरों में सिर्फ 50 फीसदी कर्मचारी ही दफ्तर से काम करेंगे. दिल्ली के प्रदूषण कैलेंडर में अब एक ऐसा नियम भी जुड़ गया है जो महामारी के दिनों की याद दिलाता है: जब हवा की गुणवत्ता एक तय स्तर से ज्यादा खराब होगी तो आधे कर्मचारी घर से काम करेंगे.
दिल्ली ने 15 सड़क मार्गों को सिग्नल-फ्री करने की भी पहचान की है. उम्मीद है कि इससे बार-बार रुकने और इंजन चालू रहने की वजह से होने वाले ट्रैफिक जाम और वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण को कम करने में मदद मिलेगी. सरकार का कहना है कि इनमें से आठ मार्गों का काम पूरा हो चुका है और बाकी को अक्टूबर तक पूरा करने का लक्ष्य है.
सर्दियों का प्रदूषण खत्म होने के बाद भी इन सड़क मार्गों का फायदा मिलता रहेगा. ये योजना के उन गिने-चुने उपायों में हैं जिनका असर लंबे समय तक रह सकता है. सिग्नल-फ्री कॉरिडोर इसी साल की शुरुआत में केंद्र स्तर पर चर्चा किए गए एक बड़े कार्यक्रम का हिस्सा थे. अब अधिकारी ऐसे मार्गों की पहचान कर उन्हें तैयार करने की दिशा में काम कर रहे हैं.
दिल्ली इस बात को मापने पर भी ज्यादा ध्यान दे रही है कि वह कैसी हवा में सांस ले रही है. वायु गुणवत्ता की निगरानी करने वाले स्टेशनों (CAAQMS) की संख्या 47 से बढ़ाकर 60 की जा रही है. इसके अलावा निगरानी और नियमों का पालन कराने के लिए 334 स्टेशन स्थापित किए जा रहे हैं. इनके साथ AI आधारित कमांड एंड कंट्रोल सेंटर भी बनाया जा रहा है.
दिल्ली के पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने शहर के प्रदूषण निगरानी नेटवर्क को देश के बड़े शहरों में सबसे मजबूत बताया है. इस दावे के पीछे कुछ आधार जरूर है. 46 स्टेशनों के साथ दिल्ली पहले से ही लगातार वायु गुणवत्ता की निगरानी करने वाले स्टेशनों की संख्या के मामले में सबसे आगे है. CAAQMS की संख्या बढ़ाकर 60 करने का लक्ष्य हर 25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के लिए एक मॉनिटर उपलब्ध कराने का है.
हालांकि इन मॉनिटरों की जगह को लेकर सवाल भी उठे हैं. आकलन से पता चला है कि राष्ट्रीय राजधानी के मध्य और दक्षिणी हिस्सों में इनकी संख्या जरूरत से ज्यादा है जबकि बाहरी इलाकों में इनकी मौजूदगी कम है. प्रस्तावित विस्तार से निगरानी में मौजूद इन कमियों को कुछ हद तक दूर करने में मदद मिल सकती है.
दिल्ली की हवा सुधारने के लिए वर्षों से निर्माण पर रोक, वाहनों पर पाबंदियां, पानी का छिड़काव, एंटी-स्मॉग गन और ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) जैसे कई कदम उठाए गए हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या हवा वास्तव में साफ हो रही है. जवाब है, हां. लेकिन सुधार बहुत असमान और धीमा है और सर्दियों के महीनों में तस्वीर काफी अलग नजर आती है.
दिल्ली का सालाना औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 2018 में 225 और 2019 में 215 था. कोविड महामारी से प्रभावित 2020 को छोड़ दें तो यह 2021 में 209, 2022 में भी 209 और 2023 में घटकर 204 रहा. 2024 में यह फिर बढ़कर 209 हो गया और 2025 में 201 पर पहुंचा, जो 2018 के बाद सबसे बेहतर सालाना आंकड़ा है.
कण प्रदूषण यानी पार्टिकुलेट मैटर (PM) के मामले में भी यही रुझान दिखता है. 2018 में PM2.5 का सालाना औसत 113 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था. यह 2019 में घटकर 107, 2021 में 105, 2022 में 98, 2023 में 100, 2024 में 104 और 2025 में 96 रहा. PM2.5 बेहद महीन कण होते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा करते हैं. PM10 का स्तर भी 2018 के 241 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से घटकर 2025 में 197 हो गया.
इसके कुछ और फायदे भी दिखे हैं. 2018 में दिल्ली में ‘अच्छी’ या ‘संतोषजनक’ हवा वाले 53 दिन थे. 2019 में यह संख्या बढ़कर 61, 2021 में 73 हो गई. 2022 में 68, 2023 में 61, 2024 में 66 और पिछले साल 79 दिन ऐसे रहे. ‘गंभीर’ और ‘अति गंभीर’ श्रेणी वाले दिनों की संख्या 2018 में 20, 2019 में 24 और 2021 में भी 24 थी. 2025 में ऐसे सिर्फ आठ दिन रहे.
सिर्फ इन आंकड़ों को देखें तो लगता है कि वर्षों से किए जा रहे उपायों का असर पड़ रहा है. लेकिन सर्दियों के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर इतनी उत्साहजनक नहीं रहती. नवंबर का औसत AQI 2018 में 335 और 2019 में 312 था. 2021 में यह 377, 2022 में 321, 2023 में 373, 2024 में 374 और पिछले साल 354 रहा.
दिसंबर में स्थिति और ज्यादा अड़ियल थी. 2018 में औसत AQI 360, 2019 में 337, 2021 में 336, 2022 में 319, 2023 में 348, 2024 में 294 और 2025 में 351 रहा. यानी तमाम योजनाओं और उपायों के बावजूद पिछले दिसंबर में दिल्ली का औसत AQI दिसंबर 2018 के मुकाबले सिर्फ नौ अंक कम था.
सरकार का कहना है कि दिसंबर 2025 में हवा की रफ्तार असामान्य रूप से कम रहने और प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों की वजह से औसत AQI इतना ज्यादा रहा.
जनवरी 2024 में भी औसत AQI 355 था और उस समय हवा की रफ्तार बहुत कम थी. सरकार का तर्क है कि दिल्ली अकेले इस समस्या का समाधान नहीं कर सकती.
शहर में प्रदूषण कम करने के आकलन के मुताबिक, दिल्ली की सीमाओं के भीतर पैदा होने वाले प्रदूषण की हिस्सेदारी करीब 30 फीसदी है. वहीं 60-65 फीसदी प्रदूषण शहर के बाहर से आता है और कुछ फीसदी हिस्सा बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित होता है.
ये सरकार के अनुमान हैं. इन्हें दिल्ली के प्रदूषण के स्रोतों का कोई स्थाई बंटवारा नहीं माना जा सकता क्योंकि अलग-अलग मौसम में प्रदूषण के स्रोतों की हिस्सेदारी में काफी बदलाव आता है.
दिल्ली सरकार की ओर से 28 सितंबर को जारी बयान में सिरसा ने कहा, “वायु प्रदूषण की कोई सीमा नहीं होती.” उन्होंने कहा कि दिल्ली अपने प्रदूषण के सभी स्रोतों पर काम कर रही है लेकिन वायु प्रदूषण का एक बड़ा हिस्सा आसपास के इलाकों से आता है.
इस साल की योजना में एक और बदलाव किया गया है. सरकार हर साल प्रदूषण बढ़ने के बाद उठाए जाने वाले कदमों के बजाय एक ‘पूर्वानुमान योग्य कैलेंडर’ तैयार करने की कोशिश कर रही है.
अब प्रदूषण को हर साल पहले से कम करने के उपाय किए जा रहे हैं बजाय इसके कि स्थिति इतनी खराब होने का इंतजार किया जाए कि सुविधाओं को बंद करने, पाबंदियां लगाने या रोक लगाने की जरूरत पड़े. GRAP लागू रहेगा और AQI बढ़ने के साथ-साथ पाबंदियां भी कड़ी होती जाएंगी.
सिरसा का कहना है कि इस बार रणनीति पहले से तैयारी करने वाली होगी. उन्होंने कहा है कि सरकारी विभागों को अपने काम के लिए जवाबदेह बनाया जाएगा और वे खुद इन उपायों के अमल की निगरानी करेंगे.
उन्होंने लोगों से सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने, अपने वाहनों की प्रदूषण जांच कराने, कचरा न जलाने और नियमों के उल्लंघन की सूचना देने की भी अपील की है.
और इस तरह हर साल की यह कवायद शुरू हो जाती है. गर्मियों में पानी का छिड़काव करने वाली मशीनें तैयार थीं. सर्दियों में हीटिंग स्पॉट होंगे. 60 मॉनिटर हवा की गुणवत्ता जांचेंगे और 334 टीमें नियमों के पालन पर नजर रखेंगी.
बढ़ा हुआ पार्किंग शुल्क सड़कों पर वाहनों की आवाजाही को कम करने में मदद कर सकता है. वर्क फ्रॉम होम से आने-जाने वाले लोगों की संख्या घटेगी और कई हफ्तों तक दिल्ली में निर्माण और तोड़फोड़ का काम बंद रहेगा.
और जब यह सब खत्म होगा तो शायद 15 सड़क मार्गों पर ट्रैफिक सिग्नल कम हो चुके होंगे. वाहन चालकों के लिए यह एक ऐसा बदलाव होगा जिसका फायदा लंबे समय तक मिल सकता है. लेकिन क्या इससे दिल्ली की हवा भी लंबे समय तक सांस लेने लायक बनेगी, यह अब भी बड़ा सवाल है.