कैसे बीजेपी केरल में भी वामपंथी पार्टियों को कर सकती है सत्ता से बाहर?
केरल में 2026 में विधानसभा चुनाव हैं और उससे पहले सत्तारूढ़ सीपीआई(एम) की उठापटक बीजेपी को एक बड़ा मौका देती लग रही है

केरल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) या सीपीआई (एम) जिला समिति के संगठनात्मक चुनावों के दौरान असंतोष की बढ़ती लहर से जूझ रही है. यह चुनाव एक बड़ी बहुस्तरीय प्रक्रिया का हिस्सा है जिसकी वजह से जमीनी स्तर पर विरोध के बीज पनपे हैं. यह विरोध पार्टी के पारंपरिक रूप से एकजुट ढांचे में बदलाव का संकेत देता है. राज्य समिति की ओर से तैयार की गई प्रस्तावित क्षेत्रीय समितियों का कई कई जगह भारी विरोध हो रहा है.
इस विरोध में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब तिरुवनंतपुरम में मंगलापुरम क्षेत्र समिति के पूर्व सचिव मधु मुल्लासेरी को निष्कासित कर दिया गया. वे सीपीआई(एम) से निकाले जाने के ठीक एक दिन बाद 4 दिसंबर को बीजेपी में शामिल हो गए थे. मुल्लास्सेरी बताते हैं, "मैंने 42 साल तक सीपीआई(एम) के साथ काम किया और पार्टी के तिरुवनंतपुरम जिला सचिव वी. जॉय के एजेंडे के कारण मुझे हटा दिया. मैं झुकने को तैयार नहीं था, इसलिए बीजेपी में शामिल हो गया."
वर्कला से विधायक जॉय ने आरोपों का खंडन किया और दूसरी ओर दावा किया कि मुल्लास्सेरी को इसलिए हटाया गया क्योंकि उन्होंने वित्तीय अनियमितताएं की थीं.
यह घटना एक और हाई-प्रोफाइल दलबदल के बाद हुई है. 30 नवंबर को अलपुझा क्षेत्र समिति के सदस्य बिपिन सी. बाबू ने बीजेपी में शामिल होने के लिए सीपीआई(एम) से इस्तीफा दे दिया. मुल्लास्सेरी की तरह बाबू का जाना भी कथित तौर पर पार्टी के जिला नेतृत्व में भ्रष्टाचार के आरोपों से जुड़ा था. इन इस्तीफों ने सीपीआई(एम) को झकझोर दिया है. पार्टी का ऐतिहासिक रूप से केरल में राजनीतिक दबदबा रहा है और अब इन इस्तीफों के बाद पार्टी के आंतरिक संगठन के बारे में सवाल खड़े हो रहे हैं.
जीमॉन जैकब इंडिया टुडे की अपनी एक रिपोर्ट में बताते हैं, "सीपीआई(एम) केरल में पांच-स्तरीय संगठनात्मक ढांचे के तहत काम करती है, जिसमें शाखा, स्थानीय, क्षेत्र, जिला और राज्य स्तर पर समितियां हैं. मौजूदा संगठनात्मक चुनाव जिला स्तर पर हो रहे हैं, जिसमें शाखा और स्थानीय समितियों के लिए मतदान पहले ही पूरा हो चुका है. नवंबर में क्षेत्रीय समितियों को अंतिम रूप दिया गया था और अब जिला समिति के चुनाव चल रहे हैं. ये चुनाव पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये राज्य सम्मेलन की ओर ले जाते हैं, जो फरवरी में कोल्लम में आयोजित होने वाला है."
केरल में माकपा की 38,000 शाखा समितियां हैं. 2,444 स्थानीय समितियों के लिए मतदान अक्टूबर में और 214 क्षेत्रीय समितियों के लिए नवंबर में पूरा हुआ था. फिलहाल 14 जिला समितियों के लिए प्रक्रिया चल रही है.
पार्टी के स्थापित संगठनात्मक ढांचे के बावजूद, इन चुनावों को बढ़ते प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है. पलक्कड़ जिले में अशांति सबसे अधिक रही जहां कई कार्यकर्ताओं ने क्षेत्रीय समिति स्तर पर की गई नियुक्तियों पर असंतोष व्यक्त किया है. कोझिनजम्पारा में एक पूर्व कांग्रेस नेता, जो पिछले साल ही सीपीआई (एम) में शामिल हुए थे, के क्षेत्रीय समिति में चुने जाने के बाद खूब विरोध हुआ. इस फैसले के विरोध में लगभग 250 सीपीआई (एम) कार्यकर्ता पार्टी सम्मेलन से बाहर चले गए. ये घटनाएं पार्टी में बढ़ते असंतोष को दिखा रही हैं.
परंपरागत रूप से, सीपीआई (एम) के अनुशासित और एकजुट संगठनात्मक ढांचे की तारीफ की जाती है. यहां स्थानीय स्तर पर चुनाव आम तौर पर सर्वसम्मति से होते हैं और असहमति दुर्लभ रही है. हालांकि ताजा विरोध प्रदर्शनों से ऐसा लग रहा है कि कहीं पार्टी की यह खासियत बीते दिनों की बात न बन जाए.
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह बदलाव पार्टी के भीतर गहराते एक संकट का संकेत है: नेतृत्व और आम कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती दूरी. पूर्व मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन के निजी सचिव रह चुके के.एम. शाहजहां के मुताबिक बढ़ती अशांति पार्टी के नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच अलगाव का नतीजा है. वे कहते हैं, "नेतृत्व के खिलाफ कैडर का विद्रोह अब कोई हैरानी की बात नहीं है. निरंकुश सत्ता ने नेतृत्व को कमजोर कर दिया है और शीर्ष और मध्यम स्तर के नेताओं को कार्यकर्ताओं से दूर कर दिया है, जो जब भी मौका मिलता है विरोध दर्ज कराते हैं. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही स्थिति का फायदा उठाएंगे. हालांकि, सीपीआई(एम) को राजनीतिक जमीन खोने की जरा भी चिंता नहीं है." इस वामपंथी पार्टी में कभी पदाधिकारी रह चुके एक पार्टी समर्थक बताते हैं, "सीपीआई (एम) में नौकरशाही व्यवस्था से कार्यकर्ता निराश महसूस करते हैं, क्योंकि मध्यम स्तर के नेता पहुंच से बाहर हैं. दक्षिणी जिलों में यह और भी स्पष्ट है. सीपीआई (एम) को मध्य नेतृत्व स्तर पर सुधार की सख्त जरूरत है."
सीपीआई (एम) की इस आंतरिक खलबली की टाइमिंग काफी अहम है, क्योंकि यह केरल में बीजेपी की बढ़ती उपस्थिति के साथ मेल खाती है. पार्टी नेताओं का मानना है कि सीपीआई (एम) के भीतर बढ़ता असंतोष त्रिपुरा जैसा माहौल तैयार कर सकता है, जहां दशकों के प्रभुत्व के बाद बीजेपी ने सफलतापूर्वक वामपंथियों को सत्ता से बाहर कर दिया.
इधर बीजेपी को उम्मीद है कि मुस्लिम वोटों के टूटने के साथ ही राज्य की 18 फीसद ईसाई आबादी का समर्थन उसे 2026 के विधानसभा चुनावों में मजबूती दे सकता है. केरल में अगले साल स्थानीय निकाय के चुनाव होने जा रहे हैं. ये इस वामपंथी गढ़ के राजनीतिक परिदृश्य की दिशा के बारे में और जानकारी मुहैया करवाएंगे.
अगर सीपीआई (एम) के भीतर आंतरिक अशांति बढ़ती रहती है, तो यह केरल के राजनीतिक संतुलन में बदलाव की शुरुआत का संकेत होगा जिसका फायदा उठाने के लिए बीजेपी तैयार है. आने वाले महीनों में पता चलेगा कि क्या सीपीआई (एम) अपने कार्यकर्ताओं की चिंताओं को दूर कर अपनी पुरानी एकता हासिल कर सकती है, या बढ़ते असंतोष से राज्य की राजनीति में कोई स्थायी बदलाव आ जाएगा.