कांवड़ यात्रा से पहले मुजफ्फरनगर पुलिस के आदेश पर विवाद, क्या हैं विपक्ष के आरोप और बीजेपी की दलील?
मुजफ्फरनगर पुलिस ने शहर के दुकानदारों के लिए कांवड़ यात्रा से पहले एक आदेश जारी किया. इस पर अखिलेश यादव, असदुद्दीन ओवैसी से लेकर जावेद अख्तर तक भड़क उठे

“कांवड़ यात्रा में जो लोग आएंगे वो फल नहीं खरीदेंगे. देखेंगे मुसलमान नाम लिखा है. इसीलिए ये लगवाया गया है. पहले तो ऐसा नहीं होता था, पहली बार हुआ है. अब नाम देखकर फल खरीदेंगे. कहेंगे कि मुसलमान है, नाम निसार है इनका.”
मुजफ्फरनगर के निसार एक ठेले पर आम बेचते हैं. आज तक उनके ठेले पर कोई नाम या पोस्टर नहीं लगा था. लेकिन जिला प्रशासन के आदेश के बाद एक दफ्ती टंगी है जिस पर लिखा है- ‘निसार फल.’
मुजफ्फरनगर पुलिस ने 15 जुलाई को एक आदेश जारी किया. इसमें कहा गया कि सभी दुकानों पर मालिक का नाम स्पष्ट तौर पर लिखा होना चाहिए. ठेले-खोमचे वालों से भी नाम लिखने के लिए कहा गया. आज तक संवाददाता संदीप सैनी से बातचीत में निसार कहते हैं, “प्रशासन ने बोर्ड लगाने के लिए कहा था. कांवड़ की वजह से ही ये लगवाया होगा. ये नाम देखकर आदमी समझ जाएगा कि ये मुसलमान है. फिर तय करेगा कि किससे फल खरीदना है और किससे नहीं.”
प्रशासन का तर्क है, “श्रावण के पवित्र माह में कई लोग ख़ासकर कांवड़िये अपने खानपान में कुछ खाद्य सामग्री से परहेज़ करते हैं. पूर्व में ऐसे दृष्टान्त प्रकाश में आये हैं जहां कांवड़ मार्ग पर हर प्रकार की खाद्य सामग्री बेचने वाले कुछ दुकानदारों द्वारा अपनी दुकानों के नाम इस प्रकार से रखे गए जिससे कांवड़ियों में भ्रम की स्थिति उत्पन्न होकर कानून व्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हुई. इस प्रकार की पुनरावृत्ति रोकने एवं श्रद्धालुओं की आस्था के दृष्टिगत कांवड़ मार्ग पर पड़ने वाले होटल, ढाबे एवं खानपान की सामग्री बेचने वाले दुकानदारों से अनुरोध किया गया है कि वे स्वेच्छा से अपने मालिक और काम करने वालों का नाम प्रदर्शित करें.”
क्या इसका असर कांवड़ यात्रा के दौरान कमाई पर पड़ेगा? निसार जवाब देते हैं, “नाम देखकर लोग नहीं खरीदेंगे तो नुकसान ही होगा. वैसे कांवड़ यात्रा के दौरान ठेला नहीं ही लगता है. पुलिस लगाने नहीं देती ठेला.” मुजफ्फरनगर पुलिस ने अपने आदेश में कहा है, “यह व्यवस्था पूर्व में भी प्रचलित रही है.” निसार इससे इनकार करते हैं, “ये पहले कभी नहीं हुआ. हम तो पहली ही बार ऐसा देख रहे हैं.”
जाहिर है पुलिस के लिखित आदेश या फिर एसएसपी अभिषेक सिंह का बयान, दोनों में कही किसी धर्म का ज़िक्र नहीं है. एसएसपी अभिषेक सिंह ने ये जरूर कहा, “नाम लिखना इसलिए जरूरी है कि कहीं भी किसी तरह का कन्फ्यूजन किसी कांवड़िए को ना हो. ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न ना हो कि बाद में आरोप-प्रत्यारोप हो.” हालांकि वो खुलकर नहीं बताते कि दुकानों पर लिखे नाम से क्या ‘कन्फ्यूजन’ पैदा होता है.
हिंदू संगठन ने की थी मांग
बघरा के योग साधना केंद्र के संस्थापक स्वामी यशवीर ने प्रशासन से मांग की थी कि कांवड़ मार्ग पर पड़ने वाले दुकानों पर उनके मालिकों का नाम लिखा होना चाहिए. ऐसा नहीं होने पर आंदोलन की बात भी कही थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि कई मुसलमान दुकानदारों ने इस रास्ते पर हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर होटल खोल रखे हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस आरोप के बाद जिला प्रशासन ने जांच की तो ऐसे 8 होटल मिले जिनके नाम हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर थे. लेकिन मालिक मुसलमान थे. इसके बाद प्रशासन ने मालिकों का नाम भी लिखने का आदेश जारी किया.
विपक्ष का आरोप, बीजेपी की दलील
आदेश सामने आने और दुकानों पर नाम चस्पा होने के बाद इस मामले पर राजनीति भी जोर पकड़ने लगी है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा है, “…और जिसका नाम गुड्डू, मुन्ना, छोटू या फत्ते है, उसके नाम से क्या पता चलेगा? माननीय न्यायालय स्वत: संज्ञान ले और ऐसे प्रशासन के पीछे के शासन तक की मंशा की जांच करवाकर, उचित दंडात्मक कार्रवाई करे. ऐसे आदेश सामाजिक अपराध हैं, जो सौहार्द के शांतिपूर्ण वातावरण को बिगाड़ना चाहते हैं.”
AIMIM प्रमुख और लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने मुजफ्फरनगर के एसएसपी अभिषेक सिंह का एक वीडियो रि-पोस्ट करते हुए लिखा है, “उत्तर प्रदेश पुलिस के आदेश के अनुसार अब हर खाने वाली दुकान या ठेले के मालिक को अपना नाम बोर्ड पर लगाना होगा ताकि कोई कांवड़िया गलती से मुसलमान की दुकान से कुछ न खरीद ले. इसे दक्षिण अफ्रीका में अपारथाइड (Apartheid) कहा जाता था और हिटलर की जर्मनी में इसका नाम 'Judenboycott' था.” बता दें कि Apartheid का अर्थ है रंगभेद. वहीं, जर्मनी में नाजी नेताओं ने 1933 में यहूदियों के बिजनेस का जब बहिष्कार किया तो उसे 'Judenboycott' कहा गया.
इस मामले पर फिल्म लेखक और गीतकार जावेद अख्तर ने भी एक्स पर पोस्ट किया है. उन्होंने लिखा, “मुजफ्फरनगर, यूपी पुलिस ने निर्देश दिए हैं कि निकट भविष्य में किसी विशेष धार्मिक जुलूस के रास्ते पर सभी दुकानों, रेस्तरां और यहां तक कि वाहनों पर मालिक का नाम प्रमुखता और स्पष्ट रूप से दिखाया जाना चाहिए. क्यों? नाज़ी जर्मनी में वो केवल विशेष दुकानों और घरों पर निशान बनाते थे.”
सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण ने लिखा है, “यह आदेश पूरी तरह से अवैध और असंवैधानिक है. सुप्रीम कोर्ट को इस पर स्वतः संज्ञान लेना चाहिए.”
मुद्दा उठा तो यूपी में सरकार चला रही बीजेपी की ओर से भी जवाब आया. पार्टी के राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा, "ये एक प्रशासनिक विषय है. सुरक्षा और संवेदनशीलता का विषय है. कहीं पर भी सिक्योरिटी से जुड़ी कोई चीज़ होती है तो सरकार अपने हिसाब से काम करती है. लेकिन मुझे एक चीज़ समझ नहीं आती कि विषय कोई भी हो, हमारे विरोधी नाम और पहचान छिपाने वालों के साथ क्यों खड़े हो जाते हैं?"
इस साल 22 जुलाई से सावन महीने की शुरुआत हो रही है. हिंदू परंपराओं के मुताबिक सावन की शुरुआत के साथ ही कांवड़ यात्रा शुरू हो जाती है. मुजफ्फरनगर एसएसपी के मुताबिक जिले में करीब 240 किलोमीटर लंबा कांवड़ मार्ग है. पूरे एक महीने इस रूट से कांवड़िए गुजरेंगे. मुजफ्फरनगर होते हुए कांवड़िए उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के अलग-अलग ज़िलों तक जाते हैं. ये कांवड़िए हरिद्वार से गंगा जल लेकर यात्रा पर निकलते हैं.