कांग्रेस मांग रही 200 सीटें लेकिन सपा का अपना गणित, कैसे होगा सीट बंटवारा?

सपा की जीत की संभावना वाले उम्मीदवारों को प्राथमिकता देने की शर्त के बीच कांग्रेस 150 से 200 सीटों की मांग कर रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद दोनों दल गठबंधन में अपनी-अपनी ताकत के हिसाब से हिस्सेदारी चाहते हैं

akhilesh yadav rahul gandhi
अखिलेश यादव और राहुल गांधी (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से करीब आते ही समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीटों के तालमेल को लेकर दबाव और जवाबी दबाव का दौर तेज हो गया है. दोनों दल सार्वजनिक तौर पर गठबंधन को मजबूत बताते हैं लेकिन उनके नेताओं के लगातार सामने आ रहे बयान खींचतान का इशारा कर रहे हैं. 

कांग्रेस जहां 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली छह सीटों को अपनी वापसी की जमीन मानकर विधानसभा चुनाव में अधिक हिस्सेदारी चाहती है वहीं 37 लोकसभा सीटें जीतकर प्रदेश में विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत बनी सपा सीटों का बंटवारा जीतने की क्षमता के आधार पर करने की बात कह रही है. 

कांग्रेस के सामने चुनौती है कि वह लोकसभा के प्रदर्शन को विधानसभा सीटों में कैसे तब्दील करे. सपा के सामने सवाल है कि गठबंधन बचाए रखते हुए कांग्रेस को कितनी सीटें दी जाएं ताकि उसके अपने मजबूत क्षेत्रों पर असर न पड़े. 

सार्वजनिक बयानों में भले ही दोनों दल इसे सामान्य राजनीतिक गतिविधि बता रहे हों लेकिन पिछले कुछ दिनों की घटनाओं को जोड़कर देखें तो दोनों पक्ष बातचीत की मेज पर पहुंचने से पहले अपनी-अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटे हैं.

कांग्रेस की दावेदारी 200 सीटों तक

सीटों के बंटवारे पर कांग्रेस की तरफ से सबसे बड़ा दबाव उसके प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के बयानों से सामने आया है. पहले कांग्रेस की तरफ से करीब 150 सीटों की मांग की चर्चा थी. इसके बाद गौतम ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि उन्होंने तो 200 सीटों की बात की थी. साथ ही उन्होंने ‘बराबर सम्मान और बराबर हिस्सेदारी’ की बात कही. 

कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने 200 सीटें मांगी हैं (फाइल फोटो)

कांग्रेस के इस रुख के पीछे सिर्फ ज्यादा सीटें हासिल करने की रणनीति नहीं है. पार्टी उत्तर प्रदेश में अपने संगठन को दोबारा खड़ा करने के लिए पर्याप्त राजनीतिक स्पेस चाहती है. विधानसभा में उसके पास इस समय केवल दो विधायक हैं लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसने छह सीटें जीतकर यह संकेत दिया कि सपा के साथ तालमेल होने पर उसका वोट ट्रांसफर संभव है. यही कांग्रेस का सबसे बड़ा तर्क है. 

उसका कहना है कि 2024 में गठबंधन को मिले जनसमर्थन को विधानसभा चुनाव में भी विस्तार दिया जा सकता है. इसके लिए उसे ऐसी सीटें चाहिए जहां उसका संगठन, सामाजिक आधार और स्थानीय नेतृत्व सक्रिय है. सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद का 21 सितंबर का बयान इसी दबाव की राजनीति का हिस्सा माना जा सकता है. 

उन्होंने अखिलेश यादव से गठबंधन को जल्द अंतिम रूप देने की अपील की और कहा कि अगर गठबंधन करना है तो उसे फाइनल किया जाए. साथ ही उन्होंने अखिलेश को संकेत दिया कि नेतृत्व करना है तो ‘दिल भी बड़ा’ करना होगा. 

इसके कुछ ही दिन बाद 2 अक्टूबर को कांग्रेस ने मसूद को उत्तर प्रदेश कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया. यह नियुक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कांग्रेस आने वाले चुनाव में पश्चिमी यूपी के मुस्लिम मतदाताओं और अन्य पिछड़ा वर्ग के समीकरण पर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकती है. 

मसूद के बढ़े राजनीतिक कद का सीधा असर सीटों की बातचीत पर पड़ना तय माना जा रहा है. सहारनपुर और पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं. ऐसे में कांग्रेस की कोशिश उन सीटों पर हिस्सेदारी लेने की होगी जहां वह अपने सामाजिक आधार और 2024 के प्रदर्शन के आधार पर मजबूत दावा कर सकती है. 

इमरान मसूद को यूपी कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है (फाइल फोटो)

कांग्रेस की दलील सरल है: सीट तभी जीती जा सकती है जब लड़ने के लिए पर्याप्त सीटें मिलें. इमरान मसूद ने इसे इसी अंदाज में कहा, "सीट होगी तभी जीत होगी."

सपा का जवाब 

कांग्रेस की बढ़ती दावेदारी के सामने सपा ने अभी तक कोई औपचारिक सीट संख्या नहीं बताई है. अखिलेश यादव ने सीटों के बंटवारे को लेकर साफ संकेत दिया है कि फैसला जीतने की संभावना के आधार पर होगा. उनका कहना है, "हमारे लिए बात सिर्फ सीट की नहीं बल्कि जीतने वाली सीट की होगी. जो जीत सके, उसे सीट मिलनी चाहिए." इसी बिंदू पर दोनों दलों के बीच असली टकराव की संभावना बनती है. 

कांग्रेस अधिक सीटों को अपने संगठन के विस्तार और राजनीतिक पुनर्निर्माण के लिए जरूरी मान रही है जबकि सपा का तर्क है कि गठबंधन में सीटों का बंटवारा गणित और जीतने की क्षमता देखकर होना चाहिए. सपा सांसद शिवपाल सिंह पटेल की टिप्पणी ने इस मतभेद को और स्पष्ट किया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस को 50 सीटें देने का मतलब उन सीटों को गंवाना हो सकता है जिन्हें गठबंधन जीत सकता था. 

हालांकि यह सपा की आधिकारिक सीट-शेयरिंग नीति नहीं है लेकिन इससे पार्टी के भीतर मौजूद सोच का संकेत जरूर मिलता है. सपा की स्थिति को उसके 2024 के लोकसभा प्रदर्शन से भी समझा जा सकता है. 37 सीटें जीतने के बाद वह यूपी में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी है. 

अखिलेश यादव के पास प्रदेश में कांग्रेस की तुलना में कहीं बड़ा संगठन और व्यापक चुनावी आधार है. इसलिए वह गठबंधन में नेतृत्वकारी भूमिका छोड़ने के मूड में नहीं दिखती. सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने नेताओं के बयान को बातचीत से पहले का शोर बताया है. उनके मुताबिक गठबंधन में लोकतंत्र है और सीट-शेयरिंग पर अंतिम फैसला शीर्ष नेतृत्व करेगा. 

स्वामी प्रसाद मौर्य की पार्टी अब इंडिया गठबंधन में शामिल है (फाइल फोटो)

फखरूल हसन ने यह भी कहा कि दोनों दलों का राष्ट्रीय नेतृत्व लगातार संपर्क में है और वास्तविक समझौता दिल्ली और लखनऊ में होगा. यानी फिलहाल सार्वजनिक बयानबाजी को अंतिम स्थिति नहीं माना जा रहा. लेकिन यही बयान दोनों पक्षों की शुरुआती सौदेबाजी की सीमा जरूर तय कर रहे हैं.

मुस्लिम-OBC समीकरण पर खींचतान 

सीटों की लड़ाई सिर्फ संख्या की लड़ाई नहीं है. इसके पीछे उत्तर प्रदेश के सामाजिक समीकरण को लेकर दोनों दलों की अलग-अलग रणनीति भी दिखाई दे रही है. कांग्रेस इमरान मसूद को आगे बढ़ाने के साथ मुस्लिम नेतृत्व के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश कर रही है. 

वहीं स्वामी प्रसाद मौर्य की राहुल गांधी से मुलाकात और इसके बाद उनकी अपनी जनता पार्टी के इंडिया गठबंधन में शामिल होने की घोषणा ने OBC राजनीति को भी इस खींचतान में ला दिया है. मौर्य लंबे समय तक OBC राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं. 

वे पहले BSP और BJP के साथ रहे और 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले सपा में शामिल हुए थे. बाद में सपा से उनके रिश्ते खराब हो गए. 3 अक्टूबर को राहुल गांधी से मुलाकात के बाद उनका इंडिया गठबंधन में आना कांग्रेस के लिए सामाजिक विस्तार की कोशिश के रूप में देखा गया. 

मौर्य की सक्रियता का एक और राजनीतिक पहलू है. राहुल गांधी से मुलाकात के अगले दिन उन्होंने जेल में बंद सपा नेता आजम खान की पत्नी तजीन फातमा से मुलाकात की. पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस नेताओं के आजम खान के राजनीतिक दायरे में संपर्क बढ़ाने की चर्चा भी रही है. मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े विवाद के बीच यह संपर्क सपा के लिए संवेदनशील माना जा सकता है. 

सपा ने लगातार यह संकेत दिया है कि आजम खान उसके साथ हैं. ऐसे में मुस्लिम राजनीति के जिस हिस्से को सपा लंबे समय से अपना मजबूत आधार मानती रही है वहां कांग्रेस की सक्रियता दोनों दलों के बीच सीटों की बातचीत को और पेचीदा कर सकती है. 

दूसरी तरफ सपा ने भी अपने विकल्प पूरी तरह बंद नहीं किए हैं. आम आदमी पार्टी (AAP) के संजय सिंह की अखिलेश यादव से मुलाकातें इसका संकेत हैं. AAP अब इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है और उत्तर प्रदेश में चुनाव की तैयारी कर रही है. 

इसके बावजूद सपा और AAP के नेताओं के बीच राजनीतिक संपर्क जारी हैं. सपा सांसद जावेद अली ने AAP से संपर्क को सामान्य राजनीतिक संबंध बताते हुए भविष्य के विकल्प खुले रखे हैं. यह स्थिति कांग्रेस के लिए एक संदेश भी है कि सपा के पास केवल एक ही गठबंधन विकल्प नहीं है.

सपा ने NDA में शामिल कुछ पुराने और मौजूदा सहयोगियों के साथ भी संपर्क की संभावनाएं खुली रखी हैं. निषाद पार्टी के संजय निषाद और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर को लेकर अखिलेश यादव के हालिया बयान इसी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं. 

उन्होंने कहा कि चुनावी माहौल में कड़वाहट भूलकर पुराने सहयोगियों और साथ आना चाहने वालों के लिए रास्ता खोला जा सकता है. हालांकि न संजय निषाद ने NDA छोड़ने का संकेत दिया है और न ओम प्रकाश राजभर ने. इसलिए फिलहाल इन संपर्कों को किसी नए गठबंधन की घोषणा के बजाय राजनीतिक विकल्प खुले रखने की रणनीति के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा.

दोनों पक्ष ताकत आजमा रहे

राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ में अवध गर्ल्स डिग्री कालेज की प्राचार्य बीना राय कहती हैं, “सपा-कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे की वास्तविक बातचीत अभी शुरू होने से पहले ही दोनों पक्ष अपनी-अपनी सौदेबाजी की स्थिति मजबूत करने में जुटे हैं. कांग्रेस अधिक सीटों की मांग के साथ यह संदेश देना चाहती है कि वह 2024 के प्रदर्शन के बाद केवल छोटे सहयोगी की भूमिका स्वीकार नहीं करेगी. सपा दूसरी तरफ अपने 37 लोकसभा सीटों के प्रदर्शन और प्रदेश में बड़े संगठन के आधार पर नेतृत्वकारी भूमिका बनाए रखना चाहती है.” 

यहीं सबसे बड़ा सवाल है कि कांग्रेस की 150 से 200 सीटों की सार्वजनिक दावेदारी और सपा की ‘जीतने वाली सीट’ की शर्त के बीच समझौता कहां होगा. 

यूपी विधानसभा चुनाव में 403 सीटें हैं. ऐसे में कांग्रेस की 200 सीटों की दावेदारी लगभग आधी विधानसभा पर हिस्सेदारी की मांग है. दूसरी ओर सपा के लिए इतनी बड़ी संख्या में सीटें छोड़ना केवल सीटों का सवाल नहीं होगा बल्कि उसके अपने संगठन और संभावित उम्मीदवारों के टिकट पर भी असर पड़ेगा. 

फिलहाल दोनों दल एक-दूसरे पर दबाव बना रहे हैं लेकिन गठबंधन से बाहर जाने की स्थिति में नहीं हैं. कांग्रेस के पास अकेले लड़कर प्रदेश में अपनी स्थिति बदलने की सीमित क्षमता है जबकि सपा के लिए कांग्रेस का साथ 2024 में बने BJP वोटरों से अलग वोटबैंक के व्यापक गठजोड़ को बनाए रखने में उपयोगी है. 

अनुमान यही है कि सार्वजनिक तौर पर चाहे जितनी बड़ी संख्या सामने आए अंतिम समझौता वास्तविक रूप से मजबूत सीटों, सामाजिक समीकरण, पिछले चुनाव के वोट और स्थानीय संगठन की क्षमता के आधार पर होगा.

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