बाड़े में पले चूजे अब जंगल में भरेंगे उड़ान! गोडावण बचाने की पहल में सबसे बड़ी परीक्षा
राजस्थान में एक बाड़े के भीतर पाले गए गोडावण के दो चूजों को पहली बार जंगल में छोड़ा गया है. अब निगरानी के जरिए यह समझने की कोशिश होगी कि इंसानों की देखरेख में पले ये पक्षी प्राकृतिक माहौल में खुद को बचाकर रह सकते हैं या नहीं

गोडावण (फाइल फोटो)
राजस्थान ने संरक्षण की ऐसी पहल शुरू की है जो बेहद संकटग्रस्त ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) यानी गोडावण को बचाने की कोशिश का अगला अध्याय तय कर सकती है. 4 अक्टूबर को अधिकारियों ने जैसलमेर जिले के सुदासरी में डेजर्ट नेशनल पार्क के एक जंगली लेकिन बाड़े वाले इलाके में पाले गए गोडावण के दो चूजों को छोड़ा.
यह रणनीति में उस बदलाव का संकेत है जिसमें पक्षियों को पिंजरे में पालने से आगे बढ़कर उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में जीवित रहना सिखाया जा रहा है. छोड़े गए पक्षी इलाके में उड़ सकते हैं लेकिन कुत्ते जैसे शिकारी और चरने वाले जानवर इस क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकते.
दांव असाधारण रूप से बड़ा है. ताजा आधिकारिक आकलन के मुताबिक भारत के जंगलों में गोडावण की संख्या करीब 130-150 है. इनमें से बड़ी संख्या राजस्थान में है. इस प्रजाति को बेहद संकटग्रस्त श्रेणी में रखा गया है. यानी यह दुनिया के सबसे ज्यादा संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल है.
अंडों से जंगल तक
गोडावण के संरक्षण और प्रजनन का कार्यक्रम 2019 में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, राजस्थान सरकार और देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की साझेदारी में शुरू हुआ था. अबू धाबी स्थित इंटरनेशनल फंड फॉर हौबारा कंजर्वेशन (IFHC) इस पहल में सक्रिय रूप से सहयोग कर रहा है.
जैसलमेर के पास सुदासरी में गोडावण केंद्र स्थापित किया गया. इसके बाद रामदेवरा में भी एक केंद्र शुरू हुआ. शुरुआत में यह कार्यक्रम जंगल में गोडावण के घोंसले तलाशने, उनके अंडे एकत्र करने और उन्हें कृत्रिम तरीके से सेने पर निर्भर था. इसका मकसद शिकारियों और दूसरे खतरों से होने वाले नुकसान को कम करना था.
मार्च 2023 में बाड़े के भीतर पाला गया पहला गोडावण चूजा पैदा हुआ. यह एक बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि उसके दोनों माता-पिता भी कृत्रिम तरीके से अंडे से निकाले गए थे और बाड़े में ही पले थे. इसके बाद बाड़े में रखे गए पक्षियों के बीच प्राकृतिक प्रजनन शुरू हुआ. प्रजनन बढ़ाने के लिए कृत्रिम गर्भाधान जैसी सहायक प्रजनन तकनीकों का भी इस्तेमाल किया गया.
राजस्थान के इन केंद्रों में रखे गए गोडावणों की संख्या अब 90 से ज्यादा हो गई है. अब कार्यक्रम अगले लक्ष्य की ओर निर्णायक रूप से बढ़ चुका है. यह लक्ष्य गोडावण को फिर से जंगल में बसाना है. इसलिए 4 अक्टूबर को छोड़े गए पक्षी थार के जंगल में कुछ अनोखा लेकर गए हैं. उनके जीन जंगली गोडावण से आए हैं लेकिन जीवित रहने की उनकी प्रवृत्ति प्रजनन केंद्र में बिताए जीवन पर आधारित है.
गुजरात का प्रयोग
पड़ोसी गुजरात गोडावण को बचाने के लिए अलग रणनीति पर काम कर रहा है. इसे ‘जंपस्टार्ट’ तकनीक कहा जाता है. गुजरात के कच्छ में जंगल में अब केवल तीन मादा गोडावण बची हैं. वहां प्रजनन करने वाले नर न होने के कारण प्राकृतिक प्रजनन की लगभग कोई संभावना नहीं है.
‘जंपस्टार्ट’ के तहत संरक्षणकर्मी जंगली मादा द्वारा दिए गए बांझ (इनफर्टाइल) अंडे की जगह राजस्थान से लाया गया उर्वर (फर्टाइल) और आंशिक रूप से सेया गया अंडा रख देते हैं. इसमें समय बेहद अहम होता है. जब मैदानी टीम किसी मादा की ओर से अंडा दिए जाने की पहचान कर लेती है तो वह अंडे को सेने की अवधि का बड़ा हिस्सा बीतने का इंतजार करते हैं. इसके बाद बांझ अंडे की जगह ऐसा फर्टाइल अंडा रखा जाता है जिसके फूटने में ज्यादा समय नहीं बचा हो. इससे दूसरे स्थान से लाए गए अंडे के शिकारियों की चपेट में आने की अवधि काफी कम हो जाती है.
अंतरराज्यीय ‘जंपस्टार्ट’ के पहले प्रयोग में 26 मार्च को नलिया में एक चूजा पैदा हुआ. इसके लिए राजस्थान से करीब 770 किलोमीटर दूर फर्टाइल अंडा पहुंचाया गया था. लेकिन अप्रैल में यह चूजा गायब हो गया. इससे निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठे. अधिकारियों को शिकार होने की आशंका थी. हालांकि इसके गायब होने से यह भी पता चला कि खुले घास के मैदान में घूमने और उड़ने लगने के बाद एक छोटे पक्षी पर नजर रखना कितना मुश्किल है.
गुजरात का दूसरा प्रयास बेहतर रहा है. 21 मई को पैदा हुआ एक चूजा 40 दिनों की महत्वपूर्ण जीवित रहने की अवधि पार कर गया. इससे वैज्ञानिकों को नया सबूत मिला कि ‘जंपस्टार्ट’ तकनीक काम कर सकती है. राजस्थान में गोडावण को फिर से जंगल में बसाने की कोशिश सफल रहने के बाद कुछ गोडावणों को गुजरात में सुरक्षित लेकिन खुले इलाकों में छोड़ा जाएगा.
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि गोडावण का चूजा पैदा करना एक चुनौती है और उसे जंगल में जिंदा रखना दूसरी. यही संरक्षण कार्यक्रम के सामने सबसे बड़ी चुनौती है. थार में गोडावण सिर्फ इसलिए खत्म नहीं हुआ कि पर्याप्त चूजे पैदा नहीं हो रहे थे. उसके आवास का भी लगातार बंटवारा हुआ है और वह खराब हुआ है.
ताजा आकलन में पाया गया कि राजस्थान में यह प्रजाति अपने संभावित आवास के सिर्फ एक हिस्से में ही बची है. बिजली की लाइनें, खासकर सौर ऊर्जा के ट्रांसमिशन का बुनियादी ढांचा, आवास का नुकसान और बढ़ता विकास अब भी बड़े खतरे हैं.
2025 में सुप्रीम कोर्ट ने गोडावण संरक्षण और बुनियादी ढांचे के विकास के बीच टकराव को देखते हुए राजस्थान में इस पक्षी के के ‘नो-गो’ आवास क्षेत्र को 14,013 वर्ग किलोमीटर और गुजरात में 740 वर्ग किलोमीटर तक सीमित किया. इसमें अपने प्राकृतिक आवास में संरक्षण और प्राकृतिक आवास से बाहर संरक्षण के लिए विशेष उपाय भी शामिल हैं. इससे पहले 99,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में व्यापक पाबंदी लागू थी.
अदालत ने बिजली गलियारों और ट्रांसमिशन ढांचे से गोडावण को होने वाले खतरों को कम करने से जुड़ी सिफारिशों को भी स्वीकार किया. इसका मतलब है कि कैद में प्रजनन कार्यक्रम की सफलता प्रजनन केंद्रों के बाहर होने वाली गतिविधियों से भी जुड़ी हुई है.
उम्मीद की उड़ान
WII के निदेशक गोबिंद सागर भारद्वाज 4 अक्टूबर को किए गए इस प्रयोग को तत्काल बड़े पैमाने पर पक्षियों को फिर से जंगल में बसाने की प्रक्रिया के बजाय सीखने के एक प्रयास के तौर पर देखते हैं. वे बताते हैं, “हम यह तय करने से पहले दोनों चूजों के व्यवहार पर नजर रखेंगे कि राजस्थान या गुजरात में और कितने पक्षियों को छोड़ा जाए. हम इसे एक प्रशिक्षण प्रक्रिया के तौर पर देख रहे हैं. इससे हम सीखेंगे कि कैद में पाले गए पक्षी खुले वातावरण में कैसे व्यवहार करते हैं. साथ ही यह भी सुनिश्चित करेंगे कि हम उनकी बेहतर सुरक्षा कैसे कर सकते हैं.”
यह परियोजना यह समझने की कोशिश कर रही है कि इंसानों की देखरेख में पली गोडावण की एक पीढ़ी उस वातावरण में जीवित रहने के लिए जरूरी व्यवहारिक कौशल हासिल कर सकती है या नहीं जहां घोंसले बनाने में सफलता, शिकारी, भोजन की उपलब्धता, इंसानी दखल और बिजली की लाइनें खतरा पैदा करती हैं.
इसलिए 4 अक्टूबर को किए गए इस प्रयोग को भारत में गोडावण संरक्षण की कहानी के सबसे अहम क्षणों में से एक माना जा सकता है. इससे तय होगा कि बाड़े के भीतर पैदा हुआ एक पक्षी उसके बाहर रहना सीख सकता है या नहीं. साथ ही यह भी पता चलेगा कि थार और बाद में कच्छ में इसके लिए पर्याप्त सुरक्षित घास के मैदान बचे हैं या नहीं.