BSP के लिए 2027 में कितनी मददगार साबित होगी कांशीराम की विरासत?
छह चुनावी हार, घटता दलित वोट बैंक और कमजोर संगठन के बीच BSP 2027 से पहले कांशीराम की विरासत के सहारे अपना आधार और कैडर फिर मजबूत करने की कोशिश में है

BSP प्रमुख मायावती (फाइल फोटो)
बहुजन समाज पार्टी (BSP) 9 अक्टूबर को लखनऊ में अपने संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर शक्ति प्रदर्शन की तैयारी में है. मायावती ने प्रदेश भर के नेताओं और कार्यकर्ताओं को लखनऊ के कांशीराम स्मारक पहुंचने और पार्टी संस्थापक को श्रद्धांजलि देने का निर्देश दिया है.
यह आयोजन महज श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले BSP के लिए अपने बिखरते संगठन और कमजोर होते जनाधार को समेटने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है. सवाल यह है कि क्या कांशीराम की विरासत के सहारे मायावती 2027 में BSP को फिर चुनावी मुकाबले में खड़ा कर पाएंगी?
BSP को इस बार राजनीतिक अस्तित्व, वोट बैंक और संगठन तीनों बचाने हैं. लगातार छह चुनावी हार के बाद पार्टी उत्तर प्रदेश विधानसभा और लोकसभा में शून्य पर है. राज्यसभा में उसका एकमात्र सदस्य भी नवंबर में कार्यकाल पूरा कर रहा है. ऐसे में 9 अक्टूबर का शक्ति प्रदर्शन यह परखने का मौका भी होगा कि कांशीराम के नाम पर अब भी पार्टी का मूल कैडर कितनी मजबूती से लामबंद हो सकता है.
2007 की सफलता के बाद गिरावट
कांशीराम ने जिस बहुजन राजनीति की नींव रखी थी उसका सबसे बड़ा राजनीतिक विस्तार मायावती के नेतृत्व में हुआ. जून 1995 में पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती देश की पहली दलित महिला मुख्यमंत्री बनीं. इसके बाद BSP ने दलित राजनीति को सत्ता की राजनीति से जोड़ने की कोशिश तेज की.
2007 में इसका सबसे बड़ा चुनावी परिणाम सामने आया जब पार्टी ने दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण मतदाताओं को साथ लाकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई. उस चुनाव में BSP को 30.43 फीसदी वोट मिले थे. यह आंकड़ा बताता है कि कांशीराम की बहुजन अवधारणा को मायावती ने किस तरह व्यापक सामाजिक गठबंधन में बदल दिया था.
लेकिन इसके बाद तस्वीर लगातार बदली. 2012 में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी विधानसभा में सरकार बनाने की स्थिति में नहीं लौट सकी. 2017 में भी BSP सत्ता से दूर रही और 2022 में उसका प्रदर्शन और कमजोर हुआ. लोकसभा चुनावों में भी यही गिरावट दिखाई दी.
2014 और 2019 के बाद 2024 में पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी. उसका वोट शेयर 2007 के विधानसभा चुनाव के 30.43 फीसदी से घटकर 2024 के लोकसभा चुनाव में 9.39 फीसदी रह गया. यानी लगभग डेढ़ दशक में पार्टी के चुनावी आधार का बड़ा हिस्सा उससे दूर हो चुका है. यह गिरावट केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है. BSP का सबसे मजबूत सामाजिक आधार माने जाने वाले जाटव और व्यापक दलित वोट में भी दूसरी पार्टियों की पैठ बढ़ी है.
BJP ने दलितों के बीच गैर-जाटव समूहों पर लंबे समय से काम किया है. वहीं समाजवादी पार्टी ने पीडीए की राजनीति के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समूहों को जोड़ने की कोशिश की है. इसके अलावा आजाद समाज पार्टी, अपनी जनता पार्टी और एआईएमआईएम जैसे दल भी दलित और वंचित तबकों के बीच जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं. यानी जिस सामाजिक आधार को कभी BSP अपनी सबसे बड़ी चुनावी पूंजी मानती थी, अब उसी आधार पर कई राजनीतिक दावेदार खड़े हैं.
आकाश आनंद की वापसी
BSP की मौजूदा रणनीति में कांशीराम की विरासत के साथ आकाश आनंद की वापसी को भी अहम माना जा रहा है. मायावती ने अपने 31 वर्षीय भतीजे आकाश आनंद को दोबारा राष्ट्रीय समन्वयक बनाया है. दिसंबर 2023 में उन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया गया था लेकिन बाद में उन्हें पद से हटाने के साथ पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था.
मायावती ने उस समय उनके राजनीतिक फैसलों और उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ के प्रभाव को लेकर नाराजगी जताई थी. अब आकाश की वापसी ऐसे समय हुई है जब पार्टी को सबसे ज्यादा जरूरत संगठन में नई ऊर्जा और युवाओं तक पहुंच की है. ऐसा अनुमान है कि उन्हें युवाओं के बीच पार्टी का विस्तार और राज्य स्तर के अभियानों की जिम्मेदारी दी जा सकती है.
मायावती ने यह भी स्पष्ट किया है कि 403 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों के चयन और टिकट वितरण का अंतिम अधिकार उनके पास ही रहेगा. यहीं BSP की नई रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा है. आकाश आनंद संगठन में व्यापक बदलाव चाहते थे. उनकी कोशिश पार्टी को सोशल मीडिया के सभी प्रमुख प्लेटफॉर्म पर सक्रिय करने, चुनावी नैरेटिव तैयार करने के लिए सोशल मीडिया सेल बनाने और पुराने ढर्रे पर काम कर रहे नेताओं की जगह युवा कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाने की थी.
लेकिन पार्टी प्रमुख की नाराजगी के बाद सोशल मीडिया सेल को भंग करना पड़ा. यह प्रकरण BSP के सामने मौजूद मूल समस्या की ओर इशारा करता है. पार्टी को नई पीढ़ी और डिजिटल राजनीति की जरूरत है लेकिन संगठन पर मायावती का केंद्रीय नियंत्रण कायम है.
मेरठ के दीवान इंस्टीट्यूट के सहायक प्रोफेसर संदीप कुमार वर्मा बताते हैं, “ उत्तर प्रदेश की राजनीति में BSP के अलावा BJP, एसपी-कांग्रेस गठबंधन और एक उभरता हुआ गठबंधन भी मौजूद है, जिसमें एएसपी, अपनी जनता पार्टी और एआईएमआईएम जैसे दल शामिल हैं. उनके आकलन में कांशीराम का दलित और ओबीसी गठबंधन, जिसे बहुजन समाज के रूप में विकसित किया गया था, ओबीसी और विभिन्न दलित समुदायों के BSP से अलग होने के कारण कमजोर हुआ है. यही वह बिंदु है जहां सिर्फ कांशीराम की विरासत के सहारे चुनावी वापसी की सीमा दिखाई देती है.”
2027 की नई सामाजिक जमीन
BSP के लिए कांशीराम अब भी सबसे बड़ा वैचारिक और संगठनात्मक प्रतीक हैं. लेकिन 2027 का चुनाव 1990 या 2000 के दशक की सामाजिक परिस्थितियों में नहीं लड़ा जाएगा. मतदाताओं की राजनीतिक पसंद बदल चुकी है. दलित समाज के भीतर भी एकरूपता पहले जैसी नहीं रही. गैर-जाटव दलितों के बीच BJP ने अपना आधार बनाया है, जबकि जाटव वोट को लेकर भी BSP के सामने पहले जैसी चुनावी निश्चितता नहीं है.
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने पीडीए के जरिए दलित और पिछड़े मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश की है. 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन के प्रदर्शन ने भी BSP के लिए चुनौती बढ़ाई. अब उसे यह तय करना होगा कि वह केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक पर निर्भर रहेगी या बहुजन की पुरानी अवधारणा को नए सामाजिक गठबंधन में बदलने की कोशिश करेगी.
पार्टी के सामने संगठनात्मक संकट भी उतना ही गंभीर है. लगातार छह चुनावी हार के बाद कई वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ चुके हैं. विधानसभा और लोकसभा में प्रतिनिधित्व नहीं है. राज्यसभा की एकमात्र सीट भी नवंबर में खत्म हो जाएगी. इसके अलावा राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बनाए रखने को लेकर भी BSP पर संकट है.
निर्वाचन आयोग के मौजूदा मानकों के तहत राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता के लिए तय चुनावी प्रदर्शन जरूरी है और 2024 के नतीजों के बाद BSP उन मानकों को पूरा नहीं करती दिख रही है. अब पार्टी निर्वाचन आयोग की औपचारिक समीक्षा का इंतजार कर रही है. ऐसे में 9 अक्टूबर की रैली का महत्व बढ़ जाता है. अगर कांशीराम स्मारक पर बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक जुटते हैं तो मायावती इसे संगठन की सक्रियता और कैडर के अब भी कायम रहने के संकेत के रूप में पेश कर सकती हैं. लेकिन किसी रैली में भीड़ जुटना और उसे वोट में बदलना दो अलग बातें हैं.
संदीप कुमार वर्मा बताते हैं, “2027 में BSP के सामने असली सवाल यही होगा कि क्या वह कांशीराम की बहुजन राजनीति को मौजूदा सामाजिक समीकरणों के मुताबिक फिर से गढ़ सकती है या नहीं. मायावती के पास अब भी एक मजबूत राजनीतिक पहचान, अपना समर्पित कैडर और दलित राजनीति की सबसे बड़ी विरासत है. लेकिन 2024 के 9.39 फीसदी वोट शेयर ने यह साफ कर दिया है कि विरासत अपने आप वोट में नहीं बदलती.कांशीराम ने जिस राजनीति में सामाजिक समूहों को सत्ता में हिस्सेदारी के लिए एकजुट किया था, उसकी ताकत संगठन, सामाजिक विस्तार और चुनावी रणनीति के मेल में थी. 2027 में BSP को इसी त्रिकोण को फिर से खड़ा करना होगा. केवल स्मारक, श्रद्धांजलि और कांशीराम के नाम पर जुटी भीड़ से यह काम नहीं होगा.”
वर्मा के मुताबिक आकाश आनंद की वापसी इस दिशा में एक नई शुरुआत हो सकती है लेकिन उन्हें कितनी राजनीतिक और संगठनात्मक स्वतंत्रता मिलती है, यह भी निर्णायक होगा. मायावती का केंद्रीय नेतृत्व और आकाश की युवा, डिजिटल और आक्रामक राजनीति किस तरह साथ चलती है, इसका असर पार्टी के भविष्य पर पड़ेगा. इसलिए 9 अक्टूबर का शक्ति प्रदर्शन BSP के लिए एक प्रतीकात्मक परीक्षा जरूर है लेकिन 2027 की असली परीक्षा उसके बाद शुरू होगी.