बृजभूषण शरण सिंह की वापसी से बदलेगा अवध का सियासी खेल?

महिला पहलवानों के कथित यौन शोषण मामले में अदालत से बरी होने के बाद बृजभूषण शरण सिंह की सक्रिय राजनीति में वापसी की चर्चा तेज है

भाजपा के पूर्व सांसद बृज भूषण शरण सिंह को मिली राजनीतिक राहत
बृजभूषण शरण सिंह (फोटो-आइटीजी)

अगस्त के तीसरे दिन की सुबह के करीब सवा दस बजे थे. लखनऊ से 120 किलोमीटर दूर गोंडा शहर की रफ्तार रोज की तरह ही चल रही थी लेकिन सवा दस बजते ही माहौल पूरी तरह बदल गया. डिजिटल मीडिया पर जैसे ही यह खबर आई कि दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न मामले में कैसरगंज के पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह और भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन सहायक सचिव विनोद तोमर को बरी कर दिया है, गोंडा जश्न में डूब गया. 

सिविल लाइन स्थित गोनार्द लॉन पटाखों की आवाज से गूंज उठा. डीजे की धुन पर समर्थक नाचने लगे. कोई एक-दूसरे को फूलों की माला पहना रहा था तो कोई लड्डू खिलाकर खुशी जता रहा था. नवाबगंज के विश्नोहरपुर गांव में पूर्व सांसद और बृजभूषण की पत्नी केतकी सिंह ने रामजानकी मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना की. 

सदर विधायक प्रतीक भूषण सिंह की पत्नी डॉ. राजश्री सिंह ने भी समर्थकों के साथ मिठाई बांटी. यह केवल अदालत के एक फैसले का उत्सव नहीं था. इस जश्न में एक राजनीतिक संदेश भी छिपा था. तीन साल से अधिक समय तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद बृजभूषण शरण सिंह केवल आरोपों से बरी नहीं हुए हैं, बल्कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी संभावित वापसी का भी संकेत दे दिया है. 

अदालत के फैसले के कुछ ही घंटों बाद सबसे बड़ा सवाल यही बन गया कि क्या भारतीय जनता पार्टी (BJP) अब उन्हें फिर से सक्रिय भूमिका में लाएगी? और यदि ऐसा हुआ तो क्या अवध की राजनीति के समीकरण बदल जाएंगे?

बृजभूषण सिंह अभी-भी अवध की राजनीति के एक शक्ति केंद्र हैं

अदालत का फैसला ऐसे समय आया है जब उत्तर प्रदेश की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट चुकी हैं. BJP यूपी में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही है, जबकि समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में बदलने की कोशिश कर रही हैं. ऐसे समय में अदालत से मिली राहत ने बृजभूषण शरण सिंह को फिर से राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है. 

बृजभूषण का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वे छह बार सांसद रहे हैं. उनकी असली ताकत अवध के उस राजनीतिक भूगोल में है, जहां गोंडा, कैसरगंज, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर और आसपास के जिलों में उनका व्यक्तिगत प्रभाव लंबे समय से माना जाता रहा है. 

इन जिलों में BJP का संगठन मजबूत होने के बावजूद स्थानीय चुनावों में बृजभूषण का नेटवर्क अलग पहचान रखता है. सहकारिता संस्थाओं से लेकर पंचायत राजनीति, शिक्षा संस्थानों से लेकर खेल संगठनों तक उन्होंने तीन दशकों में ऐसा राजनीतिक आधार तैयार किया है, जो किसी भी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है. 

यही कारण है कि अदालत के फैसले के बाद गोंडा में जिस तरह का जश्न देखने को मिला, उसे राजनीतिक जानकार केवल समर्थकों की भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं मान रहे. उनके अनुसार यह शक्ति प्रदर्शन भी था, जिससे यह संदेश दिया गया कि बृजभूषण आज भी अवध की राजनीति के बड़े शक्ति केंद्र हैं. 

राजनीतिक विश्लेषक और गोंडा के शि‍क्षक अजय प्रकाश कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में कुछ नेता ऐसे हैं जिनकी ताकत केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है. वे संगठन खड़ा करते हैं, स्थानीय नेतृत्व तैयार करते हैं और चुनावी माहौल को प्रभावित करते हैं. बृजभूषण शरण सिंह उन्हीं नेताओं में गिने जाते हैं. अदालत से राहत मिलने के बाद उनका राजनीतिक महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा."

बृजभूषण सिंह का राजनीतिक सफर

गोंडा के कांग्रेसी नेता चंद्रभान शरण सिंह के बेटे बृजभूषण ने छात्र राजनीति से शुरुआत की. अवध विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई की और साकेत महाविद्यालय छात्रसंघ चुनाव जीतकर राजनीति में पहचान बनाई. 1987 में गन्ना समिति के चेयरमैन बने. 1988 में BJP में शामिल हुए और राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख चेहरों में शामिल हो गए. 

बाबरी ढांचा ढहाए जाने के मामले में सीबीआई ने जिन नेताओं को शुरुआत में गिरफ्तार किया, उनमें वे भी शामिल थे. 1991 में वे पहली बार सांसद बने और उसके बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगातार प्रभावशाली बने रहे. उनका राजनीतिक सफर विवादों से भी भरा रहा. 1993 में दाऊद इब्राहिम के सहयोगियों को शरण देने के आरोप में टाडा के तहत गिरफ्तार हुए लेकिन इससे उनका राजनीतिक आधार कमजोर नहीं पड़ा. 

1996 में जेल में रहते हुए बृजभूषण सिंह ने अपनी पत्नी केतकी सिंह को लोकसभा चुनाव जिताया. बाद के वर्षों में वे लगातार चुनाव जीतते रहे और धीरे-धीरे अवध क्षेत्र में BJP के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने लगे. 

अवध क्षेत्र में BJP के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं बृजभूषण सिंह

राजनीति के साथ-साथ उन्होंने कुश्ती प्रशासन में भी मजबूत पकड़ बनाई. 2012 में भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बने और गोंडा के नंदिनीनगर में विश्वस्तरीय कुश्ती अकादमी स्थापित की. लेकिन 2023 में देश की शीर्ष महिला पहलवानों द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों ने उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा संकट खड़ा कर दिया था. जंतर-मंतर पर चले आंदोलन ने इस मामले को राष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा बना दिया. 

पिछले साढ़े तीन वर्षों में बृजभूषण कई बार सार्वजनिक मंचों से यह कहते रहे कि उन्हें राजनीति से ‘जबरन रिटायर’ किया गया है. उन्होंने यह भी संकेत दिए कि उन्हें अपनी बात रखने का पूरा अवसर नहीं मिला. लेकिन अदालत से बरी होने के बाद उनका आत्मविश्वास लौटता दिखाई दे रहा है. 

फैसले के बाद उन्होंने कहा कि उन्होंने शुरू से दावा किया था कि यदि आरोप साबित हुए तो वे फांसी पर चढ़ जाएंगे. हालांकि उन्होंने अपनी अगली राजनीतिक भूमिका पर सीधा जवाब देने से बचते हुए केवल रामचरितमानस की चौपाई ‘होइहि सोइ जो राम रचि राखा’ दोहराई. यहीं से राजनीतिक विश्लेषण शुरू होता है. 

अदालत से मिली राहत ने कानूनी संकट तो काफी हद तक कम कर दिया है, लेकिन राजनीतिक पुनर्वास का फैसला BJP नेतृत्व को करना है. पार्टी के सामने एक तरफ अवध का दबंग व प्रभावशाली नेता है, जिसका मजबूत जनाधार और संगठनात्मक नेटवर्क है तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर महिला पहलवानों के आंदोलन की स्मृति भी है.

बृजभूषण शरण सिंह की राजनीतिक वापसी का सबसे बड़ा असर BJP के भीतर दिखाई दे सकता है. पिछले तीन वर्षों में पार्टी ने उनके मामले पर बेहद संतुलित रणनीति अपनाई. एक ओर उसने उन्हें सार्वजनिक तौर पर पूरी तरह खारिज नहीं किया, वहीं दूसरी ओर महिला पहलवानों के आंदोलन के दौरान उनसे दूरी भी बनाए रखी. 

2024 के लोकसभा चुनाव में कैसरगंज सीट से उनका टिकट काटकर बेटे करण भूषण सिंह को उम्मीदवार बनाया गया. पार्टी का संदेश साफ था कि वह कानूनी विवाद के बीच राजनीतिक जोखिम नहीं उठाना चाहती. अब अदालत से राहत मिलने के बाद परिस्थितियां बदल चुकी हैं. ऐसे में सवाल यह है कि BJP बृजभूषण शरण सिंह के साथ कैसा तालमेल बिठाएगी? 

अदालती फैसले के बाद कैसे बदल सकती है राजनीति

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में किसी एक चेहरे या प्रदेश संगठन के भरोसे चुनाव नहीं जीते जाते. हर क्षेत्र में कुछ ऐसे स्थानीय शक्ति केंद्र होते हैं, जिनकी अपनी सामाजिक स्वीकार्यता और संगठनात्मक पकड़ होती है. अवध में बृजभूषण शरण सिंह लंबे समय तक ऐसे ही शक्ति केंद्र रहे हैं. गोंडा, कैसरगंज, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर और डुमरियागंज तक उनका प्रभाव माना जाता रहा है. 

टिकट वितरण से लेकर चुनाव प्रबंधन और बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की उनकी क्षमता BJP के लिए हमेशा उपयोगी रही है. राजनीतिक विश्लेषक अजय प्रकाश कहते हैं, "बृजभूषण शरण सिंह का महत्व केवल उनके चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है. वे उन नेताओं में हैं जो अपने क्षेत्र में राजनीतिक माहौल बनाने की क्षमता रखते हैं. अदालत से राहत मिलने के बाद उनका मनोबल बढ़ा है और BJP भी इस तथ्य से अनजान नहीं होगी. हालांकि अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व को राजनीतिक लाभ और संभावित नुकसान दोनों को ध्यान में रखकर करना होगा."

बृजभूषण शरण सिंह ठाकुर समाज के प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं, लेकिन उनकी राजनीति केवल जातीय आधार तक सीमित नहीं रही. सहकारिता संस्थाओं, शिक्षा संस्थानों, खेल संगठनों और स्थानीय सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से उन्होंने अलग सामाजिक नेटवर्क तैयार किया. यही कारण है कि उनके समर्थकों में केवल एक जाति के लोग नहीं, बल्कि अलग-अलग वर्गों के कार्यकर्ता भी दिखाई देते हैं. 

गोंडा के वरिष्ठ वकील राम उग्रह का कहना है, "उत्तर प्रदेश में व्यक्तिगत जनाधार वाले नेताओं की संख्या लगातार कम हुई है. बृजभूषण उन्हीं नेताओं में हैं जिनकी पहचान केवल पार्टी से नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक नेटवर्क से भी बनती है. यही वजह है कि उनकी सक्रियता चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है." 

बृजभूषण शरण सिंह की राजनीतिक शैली भी उन्हें दूसरे नेताओं से अलग बनाती है. वे कई बार पार्टी की आधिकारिक लाइन से हटकर बयान देते रहे हैं. बुलडोजर कार्रवाई से जुड़े कुछ मामलों में उन्होंने अप्रत्यक्ष असहमति जताई. स्थानीय प्रशासन की कार्यशैली पर भी समय-समय पर सवाल उठाए. यही वजह है कि उन्हें BJP के भीतर स्वतंत्र राजनीतिक व्यक्तित्व वाला नेता माना जाता है. राजनीतिक गलियारों में लंबे समय से यह चर्चा रही है कि उनका प्रदेश नेतृत्व से रिश्ता हमेशा सहज नहीं रहा. हालांकि उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से पार्टी के खिलाफ विद्रोह का रास्ता नहीं अपनाया.

समाजवादी पार्टी भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है. 2027 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव की कोशिश अवध क्षेत्र में BJP की बढ़त को चुनौती देने की होगी. राजनीतिक हलकों में लंबे समय से यह चर्चा होती रही है कि बृजभूषण शरण सिंह और अखिलेश यादव के व्यक्तिगत संबंध सौहार्दपूर्ण रहे हैं हालांकि दोनों अलग राजनीतिक ध्रुवों का प्रतिनिधित्व करते हैं. 

विश्लेषकों का मानना है कि अगर बृजभूषण पूरी सक्रियता के साथ BJP के चुनाव अभियान में उतरते हैं तो समाजवादी पार्टी को भी अवध में अपनी रणनीति नए सिरे से बनानी पड़ेगी. हालांकि उनकी वापसी का दूसरा पक्ष भी है. महिला पहलवानों का आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बना था. ओलंपियन खिलाड़ियों के जंतर-मंतर पर धरने ने पूरे देश का ध्यान खींचा था. 

अदालत से बरी होने के बावजूद शिकायतकर्ता पहलवानों ने फैसले को उच्च अदालत में चुनौती देने का निर्णय लिया है. ऐसे में विपक्ष इस पूरे प्रकरण को राजनीतिक मुद्दा बनाए रखने की कोशिश करेगा. BJP के सामने चुनौती यह होगी कि वह अदालत के फैसले का सम्मान करते हुए राजनीतिक संतुलन कैसे बनाए रखती है. 

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