यूपी में 100 विधायकों के टिकट काटेगी बीजेपी! पार्टी के सर्वे से क्या पता चला?

करीब 100 मौजूदा विधायकों के खिलाफ स्थानीय असंतोष के संकेत मिलने के बाद BJP टिकटों की नए सिरे से समीक्षा कर रही है. सर्वे में जनता, संगठन और संभावित उम्मीदवारों के बीच तुलना की जा रही है

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ यूपी BJP अध्यक्ष पंकज चौधरी (फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से करीब पांच महीने पहले BJP ने अपने मौजूदा विधायकों की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा शुरू कर दी है. पार्टी के आंतरिक आकलन में 255 मौजूदा BJP विधायकों में से करीब 100 के खिलाफ स्थानीय स्तर पर सत्ता-विरोधी माहौल सामने आने की खबर है. इनमें से बड़ी संख्या में विधायकों का टिकट कट सकता है. 

हालांकि अभी किसी विधायक के टिकट काटे जाने का अंतिम फैसला नहीं हुआ है. यह कवायद केवल विधायकों की लोकप्रियता नापने तक सीमित नहीं है. स्थानीय संगठन के साथ तालमेल, कार्यकर्ताओं में पकड़, जनता के बीच पहुंच, क्षेत्र में सक्रियता, सरकार की योजनाओं का असर और विधायक के खिलाफ स्थानीय नाराजगी को भी जांचा जा रहा है. 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी मौजूदा विधायकों और संभावित प्रत्याशियों को लेकर फीडबैक लिए जाने की बात सामने आई है. दरअसल, BJP के सामने इस बार चुनौती सिर्फ योगी आदित्यनाथ सरकार के खिलाफ किसी संभावित सत्ता-विरोधी लहर को रोकने की नहीं है. 

पार्टी को यह भी तय करना है कि दस साल से सत्ता में रहने के बाद स्थानीय स्तर पर पैदा हुई नाराजगी का ठीकरा सरकार पर पड़ने से पहले उसे विधायकों के स्तर पर कैसे नियंत्रित किया जाए. BJP के भीतर यह आकलन है कि कई क्षेत्रों में सरकार की योजनाओं को लेकर संतोष के बावजूद स्थानीय विधायक के प्रति नाराजगी चुनावी नतीजे बदल सकती है.

BJP सर्वे के मुताबिक लाभार्थी सरकार से खुश लेकिन विधायकों से नाराज हैं (सांकेतिक तस्वीर)

विधायकों की दूसरे पैमानों पर भी जांच

BJP केवल यह नहीं देख रही कि विधायक के खिलाफ जनता में नाराजगी है या नहीं, बल्कि यह भी देखा जा रहा है कि विधायक और स्थानीय संगठन के रिश्ते कैसे हैं. अगर विधायक का संगठन के प्रमुख नेताओं और कार्यकर्ताओं से लगातार टकराव है, तो इसे भी टिकट के फैसले में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. यानी BJP के लिए विधायक का सिर्फ चुनाव जीतना पर्याप्त नहीं होगा. उसे संगठन के साथ चलने वाला, जनता के बीच उपलब्ध और चुनाव के समय पार्टी के लिए वोट में बदल सकने वाला चेहरा भी साबित होना पड़ेगा. 

इसी वजह से वरिष्ठता, राजनीतिक कद या लगातार चुनाव जीतने का रिकॉर्ड इस बार टिकट की गारंटी नहीं माना जा रहा है. सर्वे में अगर यह संकेत मिलता है कि किसी पुराने चेहरे के मुकाबले कोई नया उम्मीदवार ज्यादा वोट हासिल कर सकता है तो पार्टी पुराने विधायक को हटाने का जोखिम ले सकती है. दो या तीन बार चुनाव जीत चुके विधायक भी समीक्षा के दायरे में हैं. 

इसके उलट अगर किसी लंबे समय से विधायक के खिलाफ कोई मजबूत स्थानीय नाराजगी नहीं है और सर्वे उसकी जीत की स्पष्ट संभावना दिखाता है तो उसे बरकरार रखा जा सकता है. सितंबर में सामने आई BJP की संभावित चुनावी रणनीति में भी मौजूदा विधायकों के बड़े पैमाने पर टिकट काटने और युवा, महिला तथा पार्टी के सामान्य कैडर से नए चेहरों को मौका देने की चर्चा थी. एक आकलन के मुताबिक 2022 में BJP ने करीब 30 प्रतिशत मौजूदा विधायकों को दोबारा टिकट नहीं दिया था जबकि 2027 में यह अनुपात और बढ़ सकता है. 

लाभार्थी खुश, विधायक से नाराजगी क्यों?

यूपी BJP के सामने सबसे दिलचस्प विरोधाभास यही है. सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों का बड़ा आधार पार्टी के पक्ष में बना हुआ है लेकिन स्थानीय विधायक को लेकर वही संतोष दिखाई नहीं दे रहा. गोरखपुर क्षेत्र से सामने आए आंतरिक सर्वे के संकेत इस अंतर को समझने में मदद करते हैं. 

गोरखपुर क्षेत्र के 62 विधानसभा क्षेत्रों में 2022 में BJP को 42 सीटों पर जीत मिली थी. ताजा आंतरिक आकलन में इन 42 मौजूदा विधायकों में 15 से ज्यादा का रिपोर्ट कार्ड संतोषजनक नहीं मिलने की बात सामने आई है. बताया गया कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है लेकिन विधायकों की कार्यशैली और क्षेत्र में उनकी सक्रियता को लेकर लोगों में असंतोष है.

विधायकों को कार्यकर्ताओं से तालमेल पर भी परखा जा रहा है (सांकेतिक तस्वीर)

इसका सीधा राजनीतिक अर्थ है कि मतदाता सरकार और विधायक के प्रदर्शन में अंतर कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम पर वोट देने वाला मतदाता अपने विधानसभा क्षेत्र में सड़क, बिजली, रोजगार, पुलिस-प्रशासन, स्थानीय अधिकारियों तक पहुंच और विधायक की उपलब्धता जैसे मुद्दों पर अलग राय बना सकता है. 

यूपी में BJP के लंबे शासन के कारण यह अंतर और महत्वपूर्ण हो गया है. 2017 से लगातार सत्ता में रहने के बाद स्थानीय जनप्रतिनिधियों के खिलाफ स्वाभाविक थकान पैदा होना BJP के लिए चिंता का विषय है. BJP संगठन के भीतर भी यह शिकायत सामने आई है कि कई जगह पार्टी के कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की बात प्रशासन में नहीं सुनी जाती. यह शिकायत 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद भी सामने आई थी और अब 2027 की तैयारी के दौरान फिर उभर रही है. 

राजनीतिक विश्लेषण के लिहाज से देखें तो यह BJP के लिए इसलिए गंभीर है क्योंकि विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार का स्थानीय नेटवर्क और व्यक्तिगत छवि लोकसभा की तुलना में कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है. लोकसभा में मोदी-योगी का व्यापक प्रभाव किसी कमजोर स्थानीय उम्मीदवार की कमी को कुछ हद तक ढक सकता है लेकिन विधानसभा में मतदाता उम्मीदवार को अपने रोजमर्रा के अनुभव से आंकता है.

बूथ से बिरादरी तक फीडबैक

टिकट के लिए चल रही कवायद को केवल एक सर्वे समझना भी सही नहीं होगा. BJP करीब तीन महीने के अंतराल पर अलग-अलग स्तरों पर फीडबैक ले रही है. जनवरी में पहला सर्वे, मार्च के अंतिम सप्ताह में दूसरा और जून में तीसरा सर्वे होने के बाद अक्टूबर में चौथे सर्वे की शुरुआत की गई है. 

इस बार दायरा और ज्यादा व्यापक रखा गया है. हर विधानसभा क्षेत्र में बूथ और वार्ड स्तर तक जाकर फीडबैक लेने की तैयारी है. कई स्थानों पर 15-15 टीमों के काम करने की बात सामने आई है. ये टीमें मतदाताओं के अलग-अलग वर्गों और बिरादरियों के बीच जाकर विधायक तथा संभावित दावेदारों की स्थिति समझेंगी. सर्वे में यह भी पूछा जा रहा है कि क्षेत्र में विधायक या दावेदार कितना सक्रिय है, जनता और कार्यकर्ताओं में उसकी पकड़ कैसी है, संगठन के साथ उसका तालमेल कैसा है और उसके खिलाफ स्थानीय नाराजगी कितनी है. 

इसके अलावा केंद्र सरकार की योजनाओं के प्रति जनता की राय, प्रदेश सरकार के कामकाज की छवि और विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी चुनने का सबसे महत्वपूर्ण आधार क्या होना चाहिए, जैसे सवाल भी पूछे जा रहे हैं. संभावित उम्मीदवार के विकल्प के तौर पर दूसरे नाम भी पूछे जा रहे हैं. यानी BJP सिर्फ मौजूदा विधायक की रेटिंग नहीं कर रही, बल्कि यह भी पता लगा रही है कि उसे हटाने की स्थिति में कौन सा चेहरा चुनाव को पार्टी के पक्ष में मोड़ सकता है. 

इस बार खास फोकस पहली बार वोट देने वाले युवाओं पर है. Gen Z के साथ डॉक्टर, वकील, व्यापारी, निर्यातक, नौकरीपेशा और छोटे कारोबार से जुड़े लोगों को भी सैंपल में शामिल करने की कोशिश है. यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि युवा मतदाता रोजगार, परीक्षा, भर्ती और अवसरों से जुड़े मुद्दों पर पुराने राजनीतिक समीकरणों से अलग प्रतिक्रिया दे सकता है.

सितंबर में सामने आई BJP की चार-स्तरीय सर्वे रणनीति में भी संगठनात्मक प्रदर्शन, सरकार से जुड़ाव, केंद्रीय नेतृत्व का स्वतंत्र आकलन और संघ की जमीनी रिपोर्ट को जोड़कर उम्मीदवारों का 360 डिग्री आकलन करने की बात सामने आई थी. 

रिपोर्ट में Gen Z की नौकरियों को लेकर नाराजगी, कैडर की थकान और कुछ सामाजिक समूहों में असंतोष को भी संभावित चुनावी चुनौती बताया गया था. इसमें संघ की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती जा रही है. रिपोर्टों के मुताबिक संघ से जुड़े कार्यकर्ता विधानसभा स्तर पर मौजूदा विधायकों की छवि, स्थानीय राजनीतिक समीकरण, संभावित दावेदारों, स्थानीय मुद्दों तथा सामाजिक और जातीय समीकरणों पर फीडबैक जुटा रहे हैं. 

2024 का सबक 

उत्तर प्रदेश में 2019 में 62 लोकसभा सीट जीतने वाली BJP 2024 में 33 सीटों पर सिमट गई. पार्टी ने 49 मौजूदा सांसदों को दोबारा टिकट दिया था जिनमें से 27 चुनाव हार गए. इस प्रदर्शन ने BJP को यह सोचने पर मजबूर किया कि सिर्फ पुराने और स्थापित चेहरों के भरोसे चुनाव लड़ना हमेशा सुरक्षित रणनीति नहीं है. 

विधानसभा चुनाव में BJP अब इसी गलती को दोहराने से बचना चाहती है. फर्क यह है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी के सामने विपक्ष का PDA सामाजिक समीकरण भी था जबकि विधानसभा में स्थानीय उम्मीदवार के खिलाफ असंतोष सीधे चुनावी नतीजे को प्रभावित कर सकता है. 

यही वजह है कि BJP का संभावित फॉर्मूला अब साफ दिखाई दे रहा है. सरकार की योजनाएं अपनी जगह, संगठन अपनी जगह और उम्मीदवार की जीतने की क्षमता अपनी जगह. इनमें से किसी एक को दूसरे का विकल्प नहीं माना जा रहा. राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर इसे BJP की चुनावी रणनीति में एक अहम बदलाव माना जा सकता है. 

पार्टी पहली बार बड़े पैमाने पर यह स्वीकार कर रही है कि सत्ता में लंबा समय बिताने के बाद मुख्यमंत्री की लोकप्रियता और संगठन की ताकत हर सीट पर कमजोर स्थानीय उम्मीदवार की भरपाई नहीं कर सकती. इसलिए टिकट वितरण को स्थानीय चुनावी गणित के ज्यादा करीब लाने की कोशिश है. 

यह रणनीति BJP के लिए दोधारी तलवार भी है. एक तरफ खराब छवि वाले विधायकों को हटाकर जनता की नाराजगी कम की जा सकती है. दूसरी तरफ पुराने विधायकों के टिकट काटने से उनके समर्थकों और स्थानीय संगठन में असंतोष पैदा होने का जोखिम रहेगा. इसलिए टिकट बदलना अपने आप में समाधान नहीं है. नए उम्मीदवार को संगठन, जातीय समीकरण, व्यक्तिगत स्वीकार्यता और चुनावी संसाधनों की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा. यही कारण है कि अक्टूबर से शुरू हुआ चौथा सर्वे निर्णायक महत्व रखता है.

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