अक्टूबर में दो चुनावों से 2027 की तैयारी परखेंगे बीजेपी-सपा
अक्टूबर में होने वाले राज्यसभा और विधान परिषद चुनाव 2027 से पहले BJP और SP की रणनीति की परीक्षा हैं. संख्या बल, क्रॉस-वोटिंग, गठबंधन प्रबंधन, सामाजिक समीकरण और संगठन की जमीनी ताकत पर सबकी नजर रहेगी

अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ (फाइल फोटो)
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अक्टूबर के दो चुनाव राजनीतिक दलों के लिए सिर्फ सदन की सीटों का हिसाब नहीं हैं. 16 अक्टूबर को राज्यसभा की 10 सीटों और उसके ठीक एक सप्ताह बाद 23 अक्टूबर को विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की 11 सीटों के लिए मतदान होगा.
इन दोनों चुनावों की प्रकृति अलग है, मतदाता अलग हैं और जीत का गणित भी अलग है. फिर भी दोनों मिलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (सपा) को अपने संगठन, सहयोगियों, रणनीति और आंतरिक एकजुटता को परखने का मौका देंगे.
चुनाव आयोग ने राज्यसभा की 10 सीटों के लिए 16 अक्टूबर की तारीख तय की है जबकि 11 एमएलसी सीटों पर मतदान 23 अक्टूबर को होगा.
मौजूदा विधानसभा संख्या के हिसाब से राज्यसभा में BJP नेतृत्व वाले NDA के सामने आठ सीटें हासिल करने की स्थिति है. यूपी में BJP के 256 विधायक हैं और सहयोगियों के साथ NDA की संख्या 292 बताई जाती है. जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के दो विधायकों के समर्थन से यह संख्या 294 तक पहुंचती है.
दूसरी तरफ SP के 101 और कांग्रेस के दो विधायक हैं. यानी SP-कांग्रेस के पास 103 का संख्या बल है. इस गणित में राज्यसभा की दो सीटें SP के खाते में जाती दिखती हैं जबकि आठ सीटों पर NDA की स्थिति मजबूत है.
हालांकि क्रॉस-वोटिंग, अनुपस्थिति और उम्मीदवार चयन जैसे कारक अंतिम गणित को प्रभावित कर सकते हैं. विधान परिषद में तस्वीर अलग है.
BJP के गठबंधन प्रबंधन की परीक्षा
राज्यसभा चुनाव का गणित पहली नजर में BJP के पक्ष में साफ दिखाई देता है. उत्तर प्रदेश की जिन 10 सीटों पर चुनाव होना है, उनमें अभी आठ BJP, एक SP और एक BSP के पास है. इन सीटों पर कार्यकाल पूरा होने जा रहा है.
इस चुनाव में विधायकों के जरिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व और सिंगल ट्रांसफरेबल वोट प्रणाली लागू होती है. यही वजह है कि BJP के लिए चुनौती केवल आठ सीटों के संभावित आंकड़े तक सीमित नहीं है. उसे अपने सहयोगी दलों के विधायकों को एकजुट रखना होगा.
यूपी राज्य सभा चुनाव में एक सीट जीतने के लिए 37 विधायकों के वोट की जरूरत होगी. BJP के पास 256 विधायक हैं. उसके सहयोगी निषाद पार्टी के पांच और सुभासपा के छह विधायक हैं. इसके अलावा मनोज पांडेय, राकेश सिंह और अभय सिंह जैसे निर्दलीय या असंबद्ध विधायकों का समर्थन भी BJP को बताया जा रहा है.
जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के दो विधायक भी BJP के साथ हैं. इस तरह BJP के समर्थन में करीब 294 विधायक माने जा रहे हैं. आठ सीटों के लिए 296 वोट चाहिए होंगे यानी BJP को आठवीं सीट के लिए कुछ अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा.
यहीं यह चुनाव 2027 से पहले BJP के लिए संगठनात्मक अभ्यास बन जाता है. दिसंबर 2025 में पंकज चौधरी के प्रदेश अध्यक्ष बनने और जून 2026 में नई प्रदेश टीम के गठन के बाद यह पहली बड़ी परीक्षा है.
राज्यसभा चुनाव का एक संदेश संख्या बल का होगा और दूसरा संदेश राजनीतिक प्रबंधन का. BJP के लिए सवाल यह रहेगा कि विधानसभा में मौजूद बड़ी ताकत को वह कितनी कुशलता से राज्यसभा के चुनावी गणित में बदलती है.
SP की रणनीति पर रहेंगी नजरें
SP के लिए राज्यसभा चुनाव का महत्व अलग है. विधानसभा में मौजूदा संख्या बल के हिसाब से समाजवादी पार्टी (सपा) दो सीटें जीतने की स्थिति में है. यूपी विधानसभा में सपा के पास 97 विधायक हैं लेकिन पार्टी अपने साथ 95 विधायकों को ही मानकर चल रही है. सपा से निष्कासित विधायक पूजा पाल और महाराजी देवी के इस चुनाव में पार्टी के साथ आने की संभावना नहीं मानी जा रही है.
पिछले राज्यसभा चुनाव में भी इन दोनों का समर्थन सपा को नहीं मिला था. इस गणित के मुताबिक, दो सीटें जीतने के बाद सपा के पास 21 वोट बचेंगे. तीसरी सीट जीतने के लिए उसे 16 और वोट चाहिए होंगे. सपा के रणनीतिकारों के मुताबिक मौजूदा परिस्थितियों में इतने अतिरिक्त वोट जुटाना मुश्किल है.
2024 के राज्यसभा चुनाव में भी सपा को क्रॉस-वोटिंग का सामना करना पड़ा था. मनोज पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी, राकेश पांडेय, पूजा पाल और आशुतोष मौर्य ने BJP उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया था. महाराजी देवी मतदान से गैरहाजिर रही थीं.
सपा की ओर से इस चुनाव में पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन और प्रो. रामगोपाल यादव को उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा है. रामगोपाल यादव का मौजूदा कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है. वहीं आलोक रंजन 2024 में भी सपा के उम्मीदवार थे लेकिन चुनाव हार गए थे.
पार्टी तीसरा उम्मीदवार भी उतार सकती है, जिसके दलित समाज से होने की चर्चा है. हालांकि कुछ वरिष्ठ नेता तीसरा उम्मीदवार उतारने के पक्ष में नहीं हैं. उनका मानना है कि अगर उम्मीदवार चुनाव हार गया तो विपक्ष इसे उस सामाजिक समूह के बीच सपा के खिलाफ मुद्दा बना सकता है.
राजनीतिक विश्लेषक और मेरठ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग के सहायक प्रोफेसर देवकी नंदन भट्ट कहते हैं, “यह चुनाव SP के लिए संख्या से अधिक अनुशासन का चुनाव है. दो सीटों को बचाए रखना पार्टी की मौजूदा स्थिति को बनाए रखेगा. इसके उलट क्रॉस-वोटिंग या अनुपस्थिति जैसी कोई घटना विपक्ष के भीतर राजनीतिक संदेश को बड़ा बना सकती है.”
विधान परिषद में SP के सामने बड़ी चुनौती
राज्यसभा के सात दिन बाद होने वाले विधान परिषद चुनाव SP के लिए शायद अधिक सीधा संस्थागत महत्व रखते हैं. 100 सदस्यीय विधान परिषद में SP के 10 सदस्य हैं. यही संख्या उसे नेता प्रतिपक्ष (LoP) के लिए जरूरी 10 प्रतिशत की सीमा पर बनाए हुए है.
अगर चुनाव के बाद पार्टी की संख्या इस सीमा से नीचे जाती है तो विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष (LoP) पद को लेकर सवाल खड़ा हो सकता है. इन 11 सीटों के चुनाव में पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं. लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ और इलाहाबाद-झांसी स्नातक सीटें हैं, जबकि लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ, बरेली-मुरादाबाद और गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीटों पर चुनाव होना है.
इन सीटों का चुनाव विधानसभा या राज्यसभा से बिल्कुल अलग है. यहां मतदाता शिक्षक और स्नातक हैं. चुनाव पार्टी के चुनाव चिह्न पर नहीं लड़े जाते लेकिन निर्वाचित सदस्य विधान परिषद में संबंधित राजनीतिक दल की संख्या में गिने जाते हैं. SP के मौजूदा 10 सदस्यों में तीन इसी चुनावी प्रक्रिया से आए हैं और तीनों को फिर उम्मीदवार बनाया गया है.
इलाहाबाद-झांसी स्नातक से मान सिंह यादव, वाराणसी स्नातक से आशुतोष सिन्हा और वाराणसी शिक्षक सीट से लाल बिहारी यादव फिर मैदान में हैं. SP ने गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट से कमलेश यादव और लखनऊ स्नातक से पूर्व MLC और प्रतापगढ़ से सपा सांसद एस. पी. सिंह की पत्नी कांति सिंह को भी उम्मीदवार बनाया है.
इस चुनाव में SP का प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उसे अपनी मौजूदा संख्या बनाए रखने के साथ शिक्षक और स्नातक मतदाताओं के बीच संगठन की मौजूदगी दिखानी होगी. BJP के नेतृत्व वाले NDA के पास विधान परिषद में 83 सदस्य हैं, जिनमें BJP के 79 और उसके चार सहयोगी दलों के एक-एक सदस्य शामिल हैं. यानी सदन में सत्ता पक्ष के पास स्पष्ट बहुमत है.
2020 में इन 11 सीटों में BJP ने छह, SP ने तीन और निर्दलीयों ने दो सीटें जीती थीं. इस बार वही परिणाम दोनों दलों के संगठनात्मक प्रदर्शन के लिए एक संदर्भ बिंदु रहेगा.
तैयारी की परख
इन दोनों चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इनके परिणामों को सीधे 2027 विधानसभा चुनाव का पूर्वानुमान नहीं माना जा सकता. राज्यसभा में मतदाता विधायक हैं जबकि MLC की इन सीटों पर शिक्षक और स्नातक मतदाता हैं. इसलिए दोनों चुनावों का सामाजिक और राजनीतिक आधार विधानसभा चुनाव से अलग है.
हालांकि 2027 से कुछ महीने पहले इनका राजनीतिक महत्व कम नहीं है. BJP के लिए राज्यसभा चुनाव विधानसभा में मौजूद बहुमत, सहयोगी दलों और समर्थक विधायकों को एक साथ रखने की परीक्षा है. वहीं MLC चुनाव स्थानीय संगठन और शिक्षक-स्नातक मतदाताओं के बीच पार्टी की सक्रियता की परीक्षा है.
SP के लिए राज्यसभा में अपनी दो सीटें बनाए रखना और विधान परिषद में 10 सदस्यों की सीमा बचाए रखना दो अलग लेकिन जुड़े हुए लक्ष्य हैं. विपक्षी एकजुटता भी इन चुनावों में कसौटी पर होगी.
कांग्रेस की विधान परिषद में अभी कोई सदस्य नहीं है और उसने पांच निर्वाचन क्षेत्रों में समन्वयकों की नियुक्ति कर चुनाव लड़ने की इच्छा जताई है. ऐसे में MLC चुनाव SP-कांग्रेस संबंधों के जमीनी स्वरूप के भी संकेत दे सकते हैं.
यही वजह है कि विधानसभा चुनाव से पहले ये दोनों चुनाव सीटों से कहीं अधिक, संगठन, गठबंधन और राजनीतिक प्रबंधन की परीक्षा बन गए हैं.